Gulabkothari's Blog

मई 19, 2013

युवा कृषक, जागो!

औषधि और वनस्पति ये दो प्रकार के अन्न होते हैं, जिसका पौधा फल लगने के बाद नष्ट हो जाए, उसे औषधि कहते हैं। यदि फल लगने के बाद भी पौधा या पेड़ बने रहते हैं, तो वे वनस्पति कहलाते हैं। हमारा धान-गेहूं-जौ-मक्का आदि औषधि रूप हैं। यह निर्जीव वस्तु नहीं है। इसीलिए देवता रूप होता है। जब तक धान में जीव नहीं पड़ जाता, इसे कच्चा मानते हैं। गर्भस्थ शिशु की तरह। पृथ्वी के गर्भ में ही धान पैदा होता है। हर दाने में जीव होता है। कीटनाशक यहां भी, मानव शुक्राणुओं की तरह, एक-एक जीव को मारकर उसे निर्जीव या नपुंसक बना देता है। कीटनाशक, रासायनिक खाद, प्रिजर्वेटर, अखाद्य रंग-गंध आदि भी औषधि और वनस्पति को विषैला कर देते हैं। धरती को भी विषाक्त बना देते हैं। पैदावार बढ़ाने का अर्थ भी विष बढ़ाना ही होगा। सरकार भी धन के लालच में विदेशी विष निर्माताओं का ही साथ देती है। हमारा आदमी मरता रहे, उनकी बला से।

दूसरी विडम्बना यह है कि अन्न की पैदावार बढ़ाने के साथ भण्डारण की व्यवस्था नहीं है। पिछले छह दशकों में तो तैयारी नहीं की। यदि कुछ की, तो वह भी अनाज के लिए पूरी उपलब्ध नहीं होती। फलों-दवाइयों आदि को ऊंचे भावों दे दी जाती है। अनाज को बाहर रखकर सड़ाया जाता है। खून-पसीने की कमाई को सड़ाने के लिए पkश्री सम्मान? ऎसे अधिकारियों को डूब मरना चाहिए। जिस देश में थाली को धोकर पीया जाता है, वहां अन्न की दुर्दशा? विदेशी चिन्तन संवेदनहीन होता है। अन्न सड़ेगा, तब तो आयात कर पाएंगे। मजा तो उसी में है। वहां के अन्न में वहां के भी कुछ नए रोग साथ आएंगे।
अनाज के बिना कोई जीवित भी नहीं रह सकता। दूध के बिना कौन बड़ा होता है? दोनों ही शहरों की देन नहीं हैं। दोनों कार्यो के लिए ही खुली जमीन चाहिए। जमीनें शहर वाले खा रहे हैं। मानो कई जन्मों के भूखे हों। दूसरी ओर, जनसंख्या बढ़ रही है। बढ़ती संख्या और घटता क्षेत्र। परिणाम प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने की अनिवार्यता। मरते-कटते पशु और खेती के परम्परागत कायदे-स्रोत। विकास के नाम पर यमलोक के खुलते द्वार।

पुराने मार्ग बंद, नए की शिक्षा शून्य। अशिक्षित कृषकों, पशु पालकों को परम्पराओं के विपरीत खींचते जटिल कानून। मौत की तरफ खींचती कानूनों की बेरहम अनुपालना। कृषकों की आत्म-हत्याओं से भी किसी का दिल नहीं पसीजता। इसके ठीक विपरीत अनाज में नए बीजों (घटती रोधक क्षमता), रासायनिक खाद और कीटनाशकों का ताण्डव। इनके कारण कैंसर का बढ़ता आतंक और उसका सारा दोष कृषकों-दुग्ध उत्पादकों के माथे।

जबकि इन (आत्म) हत्याओं तथा रोगों का सारा दोष सरकारी नीतियों तथा अधिकारियों द्वारा इनके क्रियान्वयन के माथे पड़ना चाहिए। इनकी सारी नीतियां पलायनवादी हैं। किसी भी विषय की जिम्मेदारी उठाने की क्षमता एवं मानसिकता इनमें नहीं हैं। ये अपने अहंकार की तुष्टि तथा निजी स्वार्थो को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं। नीतियां यदि सफल नहीं होतीं, तो सारा नुकसान तो जनता ही उठाती है। इनकी आंखों में तो मगरमच्छी आंसू भी अब नहीं बचे हैं।

परिवार नियोजन इसलिए चलाया गया कि ये जनसंख्या के अनुरूप व्यवस्था करने में निकम्मे साबित हुए। मनुष्यों के सकारात्मक रूप का सम्मान करना इनको अभी तक तो आया नहीं है। इनको ईश्वर भी नहीं समझा पाया कि गर्भनिरोधक अभियान के जरिए इन्होंने मानव सभ्यता का कितना अपमान किया है। चंद कागज के टुकड़ों की खातिर जन-जीवन में कितना जहर घोला है। क्या इसके बावजूद ये जनसंख्या नियंत्रित कर पाए? क्या बांग्लादेशियों को बुलाने के लिए भारतीयों की जनसंख्या घटाना चाहते थे? कैसे-कैसे बेशर्मी वाले उत्तर दे जाते हैं। इनके निकम्मेपन और इनकी भ्रष्ट मानसिकता का उदाहरण हर साल सड़ जाने वाला लाखों टन अनाज है।

क्या किसी को किसान के खून-पसीने का दर्द होता है? किसान पर तो खाद-बीज-कीटनाशक इस तरह थोप रखे हैं कि न वह स्वयं बच पाए, न खाने वाले ही बच पाएं। हत्यारे भी स्वयं किसान ही कहलाएं। अधिकारियों का नाम कहीं चर्चा तक में नहीं आता। इस सारी “विकासवादी” खेती में उलझने के कारण किसान कर्ज से बाहर भी नहीं आ सकता। उसे तो मरना ही है। उसके जीवन का सारा खून सहकारी बैंक चूस लेते हैं। आंकडे गवाह हैं कि कितने-कितने घोटाले और अरबों के घाटे हुए हैं इनमें। किसी की मौत और किसी का त्यौहार। वाह रे लोकतंत्र की विकास यात्रा। इसने प्रमाणित कर दिया कि इससे तो सामन्तशाही लाख गुणा सुखद थी। जनता की स्वीकृति से और मत से सत्ता में बैठकर जनता की हत्या पर अट्टहास करना यमराज को भी गवारा नहीं। चित्रगुप्त भी हिसाब तो करेगा।

जनता के नौकर स्वयं स्वामी की तर्ज पर बात करते हैं। जनता से कितना दुर्व्यवहार करते हैं, कैसे उसके सुख-दु:ख से आंखें मूंदे रहते हैं। इन्हें देखकर लोकतंत्र आज भी एक सपना ही लगता है। इनके चिन्तन में आज भी भारतीयता नहीं है। वरना, भारतीयों के दु:ख से इनके ह्वदय कभी के पिघल गए होते। ये तो उनकी मृत्यु के नियम-कायदों में भी अपनी जेब के बाहर सोचते नहीं जान पड़ते। तब किसानों को तो आत्महत्या करनी ही है।

बस मरने से पहले अनाज और दूध के जरिए सरकार द्वारा वितरित विष जनता के गले उतार जाएं। लगने लगा है कि किसानों की शायद नई पीढ़ी अभी तैयार (परिपक्व) नहीं हुई। यही पीढ़ी इस अपमानजनक व्यवहार के विरूद्ध खड़ी होगी। तब सही अर्थो में देश आजाद होगा।

गुलाब कोठारी

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: