Gulabkothari's Blog

मई 19, 2013

रे मनवा मेरे!

रे मनवा मेरे
तीन माध्यम हैं
तेरे लिए जो
सहायक बन सकते हैं
ऊध्र्व यात्रा में-
धारणा-संकल्प
ध्यान-चिन्तन
और समाधि।
एक मार्ग से
तुझे रोकना है
नए विषयों को
चिपकने से,
न बढ़े भीड़
स्मृतियों की,
दूसरे मार्ग से
निकालना है बाहर
पुराने कचरे को
खूंटियों को ताकि
रह सके अन्त में
अकेला-स्वयं में।
पहला कदम है
धारणा-संकल्प
कि नहीं प्रवेश होगा
स्थायी भाव में
नए विचारों का,
विचार आएंगे
जाएंगे भी, किन्तु
कहीं ठहराव नहीं,
पकड़ने का प्रयास
नहीं होगा अब,
देखेंगे, एक
फिल्म की तरह।
साक्षी बनकर
सोचेंगे, समझेंगे,
करेंगे चिन्तन भी,
अस्पृश्य रहकर।
स्थूल में भी
व्यक्ति ले जाएगा
अपनी खूंटी
अपने ही साथ,
घटना के होंगे
दर्शक-साक्षी,
तब हट जाता है
मोह का पर्दा,
माया से बनती है
दूरी मन की,
मन बन जाता है
दृष्टा प्रकृति का।
दृष्टा होने का अर्थ
“अमन” हो जाना,
मन का निर्माण
हो नहीं सकता
कोई खंूटी
बना नहीं पाएगी
स्थान, बिना मन।
मन ही ग्रन्थि है
मन ही बन्धन है
मन ही प्राण होकर
बन जाता है
वाक्-पदार्थ।
इच्छा से बना मन
स्वीकृति की पड़ गई
गांठ,
खुल भी जाती है
पूर्णता के साथ
इच्छा की।
वेद कहते हैं
इस जगत को
“नाम-रूपात्मक”,
नाम का अर्थ
नहीं है वस्तु,
न ही रूप का अभिप्राय
वस्तु है।
गांठ भी ऎसी है
दिखाई देती है
बाधक होती है
सुलझ सकती है
और है कुछ भी नहीं।
गांठ नाम माया है।
ओशो कह गए हैं
“गांठ है मनुष्य भी
नाम-रूप की,
खोल दो इसे,
जो शेष बचे
वही परमात्मा।
न रूप ही बचे
और न नाम ही,
“मैं” चला गया
गांठों के साथ।”
क्या गांठ वस्तु है?
ओशो कहते हैं-
यदि वस्तु होती
तो रहती गांठ
बिना रस्सी के,
संभव नहीं अलग करना
रस्सी से, गांठ को।
मुक्त कर सकते हो
रस्सी को गांठ से,
किन्तु इसका विपरीत
संभव नहीं है।
आकृति है,
रूप है गांठ का,
किन्तु नहीं है
स्वतंत्र अस्तित्व,
भीतर कुछ नहीं,
केवल रस्सी है,
गांठ कुछ नहीं है
अपने-आप में।
तब देखो
खोलना है बस
ग्रन्थियों को
और मुक्त रस्सी।
मन भी नहीं होता
गांठ की तरह,
मन बनता है
चेतना के क्षोभ से,
इच्छा के कारण,
पर्दे की फिल्म
केवल रूप है जैसे।
रूप है मन भी,
जब भीतर का दृष्टा
भूल जाता है “मैं”
और खो जाता है
दृश्यों में,
रह जाते हैं जब
मात्र दृश्य
बंध जाती है गांठ।
गांठ भारी
और भारी
जन्म-जन्म से
बांधे जा रहे
गांठें, ढेर सारी
अपने मन पर,
समझा ना,
क्यों कहते हैं
पागल तुझको
मनवा मेरे!
“बाहर नहीं मनुष्य से
मनुष्य का बंधन,
उसने ही बनाया
अपने भीतर
कारागार और
बैठा है स्वयं उसमें।”
लगता ऎसा है
जैसे सब कुछ बाहर
सुख-दु:ख, उपलब्घि,
सफलता-पराजय,
किन्तु हैं सब भीतर।
दौड़ भीतर, लक्ष्य
पहुंचना, हार-जीत
सब कुछ भीतर,
पे्रमी बाहर, किन्तु
प्रेम-ग्रन्थि, भीतर,
टूट जाए भीतर
तो सब समाप्त
बाहर।
ध्यान क्या है
देखना ग्रन्थियों को,
नजदीक से
दत्तचित्त होकर
जागरूक रहकर,
वर्तमान में।
आपने देखा
झूठ की ग्रन्थि को
समझा क्यों बोला,
क्षमा मांगी और
ग्रन्थि गायब।
ग्रन्थि खोलना
यानी कि स्वीकारना
अपने स्वरूप को,
उस नाम के साथ,
नहीं करने पड़ते
प्रयास अलग से
खोलने के लिए।
इन्द्रियों की
हर इन्द्रिय के विषय
हर जन्म की ग्रन्थियां
आती जाती हैं
सामने आपके
ध्यान की स्थिति में,
काया नहीं है
वहां आपकी,
मन नहीं है
वहां पर
विचार नहीं है
बस स्वरूप है
पश्यन्ति में,
आ लौट चलें मनवा,
खोलने गांठें
ठहरकर ध्यान में।
गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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