Gulabkothari's Blog

मई 25, 2013

नया इतिहास रचें

परिवर्तन नित्य है। बिना बदले जीवन ठहर जाता है। ठहरा हुआ पानी सड़ जाता है। रोटी जल जाती है। राष्ट्र भ्रष्टाचार और भोगों में डूब जाता है। आजकल चारों ओर यही सब तो हो रहा है। सत्ता की निश्चिन्तता ही इसका एकमात्र कारण होता है। आज कांग्रेस और भाजपा दोनों आश्वस्त हैं कि दोनों में से एक सत्ता में रहेगा ही रहेगा। दूसरा छद्म रूप से सहयोग करता रहेगा। आज विपक्ष की भूमिका भी एक मुखौटा ही रह गया है।

केन्द्र मे तो स्पष्ट रूप से विपक्ष का नाटक टीवी पर देखा जा सकता है (लोकसभा/राज्यसभा में)। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विपक्ष खुलेआम लोकतंत्र की धçज्जयां उड़ा रहा है। सत्ता पक्ष की झोली में बैठे नजर आते हैं। साथ में यह उम्मीद भी पाले हुए है कि अगले चुनाव में इनकी पार्टी सत्ता में अवश्य आएगी और आज का सत्ता पक्ष विपक्ष में बैठेगा।

देश में यह नजारा पहली बार देखने को मिला हो, ऎसा भी नहीं है। पहले भ्रष्ट नेता को भी लज्जा तो आती ही थी। आज नेता निर्लज्ज एवं दु:साहसी हो गए, अपराधी होने से भी नहीं डरते। अफसरों को भी साथ जोड़ लिया। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है और सरकार में हर व्यक्ति बहरा हो गया है।

इधर जनता मजबूर है। जाए तो कहां जाए? इधर पड़ो कुआं, उधर पड़ो खाई। मौत दोनों तरफ से आई। विकल्प नहीं सूझ रहा। सभी नेता अपने-अपने दलों में चिपके बैठे, अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं। दल की, राष्ट्रहित की चिन्ता कहीं दिखाई नहीं देती। फिर कौन से लोकतंत्र के लिए संविधान की सौगंध खा रहे हैं। पिछले 65 सालों में पूरे देश को निचोड़ कर रख दिया, विकास के नाम पर! आज तो लोकतंत्र की शुरूआती अवधारण ही खो गई। जातिवाद, कट्टरवाद, क्षेत्रवाद, वंशवाद, आरक्षण आदि सब तरफ से हावी होने लगे हैं।

देश की चिन्ता देश करे। देश ने ऎसे अवसरों पर पहले भी परिवर्तन देखें हैं। आज दोनों दलों में न केवल भ्रष्ट, बल्कि बाहुबली, आंखें दिखाने वाले, बूढ़े (जो नए युग की भाषा और आवश्यकता पहचानते भी नहीं) अपनी पकड़ ढीली करने को तैयार ही नहीं हैं। दोनों ही दलों में अधिकांश नेता, बिना बाहुबल के, जीतने की स्थिति में नहीं हंै। फिर पार्टी की लाचारी है कि पहले उन्हें ही टिकट दे अथवा उनके बेटे-बहू को। मतदाता किंकर्तव्यविमूढ़ है। युवा अंधेरे में अपना भविष्य टटोल रहा है, किन्तु अभी कमर कसने को तैयार नहीं हुआ है। आजादी के बाद पहली बार उसके सामने अवसर आया है, कुछ कर डालने का।

आगे कब आएगा, मालूम नहीं। इस चुनाव में बहुमत युवा मतदाताओं का होगा और बूढ़े-भ्रष्ट-ऎय्याशों को बाहर करना उनकी प्रथम मूल आवश्यकता है। फिर प्रतीक्षा किसकी? क्या आज कांग्रेस वही है, जो स्थापना के दिन थी? क्या इन्दिरा गांधी ने समय की धार देखकर इसको कांग्रेस (आई) नहीं बना दिया था? आज कांग्रेस (ओ) कहां है! क्या भाजपा के गर्भ से, जनसंघ को छोड़कर नई पार्टी नहीं बनीं?

क्या आज के युवा नेता नई कांगे्रस और नई भाजपा नहीं दे सकते देश को? जब संघ से सन् 1951 में जनसंघ और आगे चलकर भाजपा बन सकती है तो आज के युवा चाहे नरेन्द्र मोदी हों या वसुन्धरा, नया नेतृत्व क्यों नहीं देना चाहते?

क्या अर्थ रह जाएगा राहुल गाधी के युवा नेता होने का? समय की ललकार है कि नया युवा-दल तैयार हो, देश को नई दिशा, विकास का मार्ग और जीने का विश्वास दे। राजनीति में भी रहने की अधिकतम उम्र तय करें, ताकि राजनीति सदा युवा, ऊर्जावान और समय के साथ चलने वाली रहे।

जितने कीड़े लग चुके हैं, उन्हें बेरहमी से निकाल बाहर करें। एक भी काली छाया का व्यक्ति चुनाव न लड़ जाए! लोकतंत्र फिर स्वस्थ हो जाएगा। यदि ऎसा नहीं कर सकते, तो नेता स्वयं को युवा कहना, संवेदनशील कहना छोड़ दें। भविष्य निश्चित ही इनको माफ नहीं करेगा! समय रहते केटर पिल्लर का तितली बन जाना ही जीवन का प्राकृतिक स्वरूप भी है और सुन्दर भी। युवा काल लौटता नहीं है। आओ, पुराना खोल झाड़कर फेंक दें। तितली बनकर आकाश में नई उड़ान भरें! ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो स्वयं कुछ करते हैं।

गुलाब कोठारी

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1 टिप्पणी »

  1. आदरणीय श्रीमान गुलाब कोठारी जी,
    सादर प्रणाम ,

    १६ जून का आपका सम्पादकीय बहुत ही प्रशंसनीय एवं प्रेरणा से ओतप्रोत था | आपके लेख का मै नियमित पाठक हूँ | आपका विज़न २०२५ की ये पहल बहुत ही प्रशंसनीय है | आपसे एक प्रार्थना है कि इस युग के एक महापुरुष जो कि बाबा जयगुरुदेव के नाम से जाने जाते हैं , उन्होंने कहा है कि जबतक लोग शाकाहारी नहीं होंगे तब तक मनुष्य सुख-शांति का अनुभव नहीं कर पाएगा ,शाकाहारी यानी कि मांस, मछली, अंडा, शराब का सेवन पूर्णतया बंद हो जाना चाहिए क्योंकि “जैसा खाए अन्न वैसा होए मन” “जैसा पीवे पानी वैसी होवे बानी” इसलिए आपसे निवेदन है कि आपकी पत्रिका में शाकाहारी होने के लिए कुछ न कुछ जरुर देते रहें, आपसे बहुत कुछ कहना है इसलिए आपसे मिलने का इच्छुक हूँ और आपके इस महान कार्य विज़न २०२५ को मैंने इन पंक्तियों में संजोया है –

    देशवालों नया एक संदेशा सुनो, इस धरा पर ही सतयुग उतर आएगा |
    है नहीं वक्त ज्यादा कुछ ही वर्षो में, देश दुनियां का नक्शा बदल जाएगा |
    “पत्रिका” की ये ऐसी पहल है के जो, देश को एक नया जोश दे जाएगी |
    चल पड़ी है ये सरिता जो परिवर्तन की, न रुकेगी ये अब काम हो जाएगा |

    ऐ युवाओं उठो थाम लो हाथ में, देश का नाम दुनियां में हो जाएगा |
    उखाड़ फेंको ये भ्रष्टाचार की अब जड़ें, नए तने में सदाचार खिल जाएगा |
    ऋषियों-मुनियों का ये सनातन भारतवर्ष , पूरी दुनियां को सतपाठ पढ्वायेगा |
    देशवालों नया एक संदेशा सुनो, इस धरा पर ही सतयुग उतर आएगा ……………………………………………

    – अम्बिका शरण निगम
    अंकलेश्वर, जिला – भरूच-३९३००२-गुजरात
    दूरभाष- ८६९००२०२८०, ८०००७८००५४

    टिप्पणी द्वारा Ambika Sharan Nigam — जून 18, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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