Gulabkothari's Blog

मई 26, 2013

उदारता

उदार शब्द ही उदारता का प्रमाण है। इसमें ‘उ’ का अर्थ दूर भेजना, ‘दा’ का अर्थ पूर्ण रूप में देना और ‘र’ का अर्थ भी देना। यहां देना दो बार आने का अर्थ यह भी मान सकते हैं कि दिए हुए को वापस नहीं लेना है। ‘र’ अग्नि बीज है। जो भी आप दे रहे हैं, वह अग्नि में परिपाक होकर, रूपान्तरित होकर, जाना चाहिए। दही बन जाने के बाद फिर उसका दूध नहीं बन सकता।

 

 

उदारता का उद्देश्य आदान-प्रदान से नहीं है। क्योंकि उदारता का क्षेत्र केवल भौतिक पदार्थ ही नहीं है। विचार, भाव, नीयत जैसे सूक्ष्म विषय भी आते हैं। ईश्वर से बड़ा तो काई उदाहरण नहीं हो सकता, उदारता का। मनुष्य जीवन के पुरूषार्थ का लक्ष्य भी तो नारायण बन जाना ही है। तब देने के अलावा मार्ग क्या है!

एक ट्रक के पीछे लिखा था-

 

मालिक हो तो ऎसा

हिसाब मांगे न पैसा।

 

कोई मांगने वाला आ जाए तो देखो कैसे सिर ठनकता है। मानो जीव निकल रहा हो। कौन नहीं जानता कि भाग्य से अघिक नहीं मिल सकता। हम किसी का भाग्य बदल भी नहीं सकते। फिर भी विश्व की सारी स्पर्घाएं एक-दूसरे को पछाड़ने में लगी रहती हैं। अपने नुकसान के लिए, दु:खों के लिए, दूसरों को दोषी ठहराते रहते हैं। उनको मिटा देने तक की सोच बैठते हैं। स्वयं के कर्म की ओर ध्यान तक नहीं जाता। घर की महिला-खूंटा या स्वामिनी-जब स्वयं अहंकार से ग्रसित हो जाती है, तब न अपने पति को सही सलाह दे पाती है, न ही बच्चों को संस्कारित कर पाती है। परिवार में माधुर्य का अभाव आते ही बिखराव शुरू हो जाता है।

 

इन नकारात्मक भावों के कारण स्त्री सबसे पहले रोगग्रस्त होती है। हजारों उदाहरण मिलते हैं। विचारों के स्पन्दन ही रक्त को दूषित करते हैं। इन सब परिस्थितियों से मुक्त रहने के लिए ही उपासना, पूजा, जप आदि का सहारा लिया जाता है। उदारता भी एक तरह की उपासना ही है। इसका लक्ष्य ह्वदय में बैठे ईश्वर को प्रसन्न करना है ताकि व्यक्ति के आभामण्डल में प्रकाश का प्रवेश हो सके। उदारता और दान में अन्तर इतना ही है कि उदारता का भाव ही दान की प्रेरणा बनता है। परिणाम ही दान है। तन का, मन का, धन का। तीनों ही माध्यम बनते हैं-आत्मा की अभिव्यक्ति के। उदारता का सूत्र दो आत्माओं को जोड़ने का कार्य करता है।

 

उदारता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है। अनेक परम्पराएं समाज की पहचान होती हैं। कुछ परम्पराएं समय के साथ अपनी सार्थकता खोती जाती हैं। कट्टरपंथी विचार जहां इनसे चिपके रहना चाहते हैं, वहीं उदारमना लोग समय के साथ बने रहते हैं। लचीले होते हैं। यह फूल की उदारता ही है कि कोई भी भंवरा उसका पराग ले सकता है। कोई भी राहगीर उसकी सुगंध भीतर उतार सकता है। क्यों व्यक्ति अपने माधुर्य से सबको सींच नहीं सकता? क्योंकि उसका अहंकार उसे पूर्वाग्रह के जाल में बांधे रखता है।

 

वह दूसरों को भी वैसा ही मानता है। जबकि सामाजिक स्तर पर उदारता आपसी सौहाद्रü एवं सम्पर्को का विकास करती है। इसमें भी एक श्रेणी उन लोगों की होती है, जो उदारता का ढोंग करने वाले होते हैं। धर्म के क्षेत्र में उदारता दिखाने वालों की कमी किसी भी सम्प्रदाय में नहीं है। उदारता का पहला कदम ही मन को स्वत: स्फूर्त कर देता है। आप किसी से मीठा बोलकर देखिए, कड़ुवे बोल का उत्तर मत दीजिए अथवा ऎसा बोलने वालों के साथ भी आप तो मृदु बनकर देख लीजिए। कभी कोई आर्थिक सहायता मांगने आ जाए, संकट की घड़ी में, तब बिना परिचय पूछे उसकी मदद करके देख लीजिए। उसके चहरे की प्रसन्नता आपको अपने किए कार्य का महžव समझा देने वाली है।

 

सेवा और भक्ति के क्षेत्र में तो बिना उदारवादी दृष्टिकोण के प्रवेश ही असम्भव है। वह प्रसन्न आत्मा आपको अपना ही लगता है। पराएपन का भाव लुप्त हो जाता है। उदारतापूर्वक की गई सेवा में व्यक्ति स्वयं को पीडित का अंग मानकर कार्य करता है। अपने जीवन का महžवपूर्ण काल खर्च करता है। जो प्रत्युत्तर मिलता है, वह ईश्वर का आशीर्वाद ही होता है। व्यक्ति अपने भीतर भी ईश्वर की अनुभूति करने लगता है।

 

उसका ध्यान ईश्वर की शक्तियों, ईश्वर की सृष्टि एवं भीतर की एकरूपता पर जाने लगता है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सबका प्रारब्ध भिन्न होने से सबकी आकृति और प्रकृति भिन्न दिखाई देती है। तब कौन मित्र और शत्रु कौन? सब अपने-अपने प्रारब्ध के कारण इस बड़े नाटक के पात्र बने हुए हैं। धन भी ईश्वर देता है, मांगने वाला हो या छीनने वाला, उसे भी ईश्वर ही भेजता है। मित्र भी वही भेजता है, शत्रु भी वही भेजता है। तब शत्रु का दोष क्या? हां आप उदारता के माध्यम से उसे मित्र बना सकते हो।

 

उदारता आदत नहीं संस्कार है। आत्मा के साथ जुड़ा है। इसमें नकारात्मकता नहीं होती, किन्तु हां, विशेष परिस्थितियों में लोग अर्थ नकारात्मक लगा सकते हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। संस्कारवान् लोग अपने ‘सर्व मंगल’ भाव से विशेष उदारता प्रकट करके उम्रभर के लिए अमिट छाप छोड़ देते हैं। कुमार्ग से गुजरता कोई आत्मा जब सामने आकर खींचता है, संस्कारवान व्यक्ति च्युत नहीं होते। सामने वाले आत्मा को भी सुमार्ग पर ले ले, तो उसका जीवन भी नर्क होने से बच जाता है। समय के साथ विश्वास स्वत: ही गहरा हो जाता है।

 

उदारता का यह श्रेष्ठ उदाहरण है। इससे बड़ा उदाहरण परिवार में ही मिल सकता है। मां का सन्तान के प्रति उदारता का भाव। किसी परिस्थिति में नहीं बदलता। यहां तक कि जिन जातियों में बूढ़ी मां को बेचने की प्रथा है, वहां भी नहीं बदलता। इसी प्रकार शिष्य के प्रति गुरू की उदारता कभी घटती नहीं। वात्सल्य यहां उदारता का पर्याय बनता है। सन्तान की माता-पिता के प्रति उदारता भी प्रकृति का अद्भुत उदाहरण है। माता-पिता से बात-बात में डांट खाते रहने के बाद भी उनकी हर गलती को क्षमा कर देना अद्भुत नहीं है क्या? प्रकृति में सामाजिक सम्बन्ध नहीं होते। नर-मादा-नपुंसक होते हैं। अपने-अपने कर्म भोगकर चले जाते हैं। उदारता में विस्तार अग्नि का ही धर्म है। संकोच सोम का धर्म है।

 

मन को सौम्य कहा है। क्योंकि इसका स्वामी चन्द्रमा है। सूर्य पत्नी रूप में। सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशमान् है। मन तीन प्रकार का है। चिदात्मक, प्राणात्मक और इन्द्रियात्मक। अव्यय पुरूष का मन-श्वोवसीयसमन-चिदात्मक है। जो स्वयं इन्द्रिय न होते हुए भी इन्द्रियों का प्रवर्तक है, वह प्राणात्मक मन है। सुख-दु:ख का अनुभव करना इन्द्रियात्मक मन का गुण है। ह्वदय इसका स्थान है। प्राणरूप मन प्रज्ञानात्मा है। वाणी में वही वाक् है। रसना में वही रस है। ह्वदय में वही मन है। यह मन जब आनन्द-विज्ञान की ओर उठता है, तब उदारता बढ़ जाती है। आसक्ति और उदारता विरोधाभासी भाव धाराएं हैं। आसक्ति के कारण संकुचन प्रभावी रहता है। विस्तार कभी भी संभव नहीं होगा। उदारता में व्यक्ति स्वयं को नित्य विस्तार पाते देखता है।

 

उदारता का मूल है देना। चाहे सामने वाले को अपनी बात कहने का अवसर ही हो। उदारवाद का अर्थ है सामने वाले को अघिक महžव देना। अहंकार मुक्त होकर देना। कर्ता भाव छोड़कर देना। सामने वाले के शरीर को नहीं, उसके आत्मा को देना। ताकि आपके अतिरिक्त किसी को पता भी न चल सके। वापिस नहीं मांगने के भाव से, सामने वाले का शुभचिन्तक बनकर देना। अपेक्षा भाव उदारवादी कर्मो में विष घोल देता है। जीवन को व्यापार बना देता है।

 

उदारवादी बनने पर व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुरूप सहजता से जीने लग जाता है। बीज बनकर अपने जीवन का मोह भूल जाता है। पेड़ बनकर फल और फूल देता है। कोई भी भोग ले। लोगों के साथ और लोगों के लिए जीने का मार्ग है उदारता। समय के साथ बदलते रहने को उदारता कहते हैं।

 

इस देश में प्राणी मात्र के प्रति उदारता का महžव है। गाय को चारा, पक्षियों को दाना एवं चींटियों को ‘कीड़ी नगरा’ जैसी परम्पराएं भले ही धर्म के नाम पर चलती हों, किन्तु व्यक्ति के मन में प्राणी मात्र के लिए सम्मान पैदा करने जैसा दुर्गम कार्य आसानी से हो जाता है। इन भावनाओं के स्पन्दन शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखते हैं। शरीर प्रसन्न एवं निरोग रहता है। व्यक्ति व्यष्टि से समष्टि भाव की ओर बढ़ता रहता है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: