Gulabkothari's Blog

मई 26, 2013

व्यवस्था में विघ्न

ईश्वर ने अपनी सृष्टि में इतनी सूक्ष्म व्यवस्था रखी है कि ग्रहों,नक्षत्रों,उपग्रहों आदि की स्थिति और गति में अंश मात्र का परिवर्तन भी नहीं होता। सौर मण्डल तो अभी मनुष्य की पहुंच से बाहर है,इसलिए वहां सृष्टि के नियमों में छेड़छाड़ मनुष्य के वश की बात नहीं है।

उसका वश पृथ्वी पर ही चलता है और यहीं उसकी छेड़छाड़ चलती रहती है। इसी छेड़छाड़ के परिणाम भूकम्प,सुनामी,अकाल,अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आते रहते हैं। इन आपदाओं के कारणों की व्याख्या वैज्ञानिक अपने ढंग से करते हैं और पर्यावरणविद् अपने ढंग से। वैदिक विज्ञान जैसी गहराई कहीं दिखाई नहीं देती।

मौसम या ऋतु चक्र में सारी व्यवस्थाएं “वैश्वानर” अग्निA और उसके कारण अन्तरिक्ष में चलने वाले यज्ञ की उपज हैं। मनुष्य के शरीर से लेकर परमेष्ठि मण्डल तक यह वैश्वानर यज्ञ अलग-अलग आयाम में चलता रहता है। इसमें किसी तरह का विघ्न डालने का अर्थ है,प्रकृति की व्यवस्था से छेड़खानी करना। इस छेड़खानी से शरीर के स्तर पर स्वास्थ्य प्रभावित होता है और विश्व के स्तर पर ऋतु चक्र। अग्निA-वायु-आदित्य रूप प्राणगिAयां क्रमश: पृथ्वी,अन्तरिक्ष एवं सूर्य मण्डल की अग्निAयां हैं।

स्वरूप से ये घन-तरल-विरल हैं। इन तीनों के संघर्ष से चौथी “वैश्वानर” अग्निA उत्पन्न होती है। शरीर में अपान-व्यान-प्राण अग्निAयों के संघर्ष से जो भौतिक ताप धर्मा अग्निA पैदा होता है,वही वैश्वानर अग्निA है। यह जठर स्थान में रहता हुआ सर्वाग शरीर में व्याप्त है।

कान-नाक बंद करने पर जो धक्-धक् सुनाई देती है,वह वैश्वानर की ध्वनि है। अन्तरिक्ष में भी वैश्वानर का यही स्वरूप है। वहां वैश्वानर के दूसरे तीन विवर्त हो जाते हैं। विराट्-हिरण्यगर्भ-सर्वज्ञ।

अग्निA में जब वायु और आदित्य की आहुति होती है,तब विराट् अग्निA पैदा होती है। वायु में अग्निA और आदित्य की आहुति से हिरण्यगर्भ तथा आदित्य में अग्निA,वायु की आहुति सर्वज्ञ कहलाती है। अग्निA प्रधान विराट् अर्थ प्रधान है। वायु प्रधान हिरण्यगर्भ क्रियाशक्ति का तथा आदित्य प्रधान सर्वज्ञ ज्ञानशक्ति का उद्गम है।

ज्ञान-क्रिया-अर्थ भावों का प्रवर्तक बनता हुआ वैश्वानर अग्निA अधिदैवत तथा अध्यात्म का संचालन कर रहा है। विराट् का प्रवग्र्याश ही अध्यात्म का वैश्वानर है। वायु प्रधान हिरण्यगर्भ ही तैजस है।

सर्वज्ञ का प्रवग्र्याश ही प्राज्ञ कहलाता है। विराट-हिरण्यगर्भ-सर्वज्ञ ही जीव का ईश्वर है। वैश्वानर-तैजस-प्राज्ञ (अग्निAत्रयमूर्ति देवसत्य) ईश्वर का प्रवग्र्य जीव है। यही गति-आगति और स्थिति है। इसी प्रसंग में संवत्सर का विवेचन है।

संवत्सर दो प्रकार का होता है-चक्रात्मक और यज्ञात्मक। पृथ्वी अपने क्रान्तिवृत्त पर घूमती हुई एक बिन्दु से चलकर फिर उसी बिन्दु पर पहुंचती है,तो इसे चक्रात्मक संवत्सर कहते हैं। यह पृथ्वी की परिक्रमा से बनता है। काल की यह अवधि एक आयतन (पात्र) है।

इस अवधि के भीतर सूर्य की जो शक्ति रश्मियों के द्वारा उस आयतन में भर जाती है,इससे ही सौरमण्डल की वस्तुओं के स्वरूप का निर्माण होता है। यह यज्ञात्मक संवत्सर है। पहला चक्रात्मक या कालात्मक संवत्सर तो प्रतीति मात्र है। अत: भाति सिद्ध है। यज्ञात्मक का रूप दृष्टिगोचर होता है। अत: सत्तासिद्ध है। अग्निA ही पृथ्वी की परिक्रमा का कारण है। गर्मी-सर्दी का मिथुन भाव ही ऋतु है। ऋतुओं के समूह को ही तो संवत्सर कहते हैं। यही सब भूतों को उत्पन्न करता है।

उनका नियन्ता भी है। संवत्सर से उत्पन्न पुरूष साक्षात् संवत्सर की प्रतिमा होता है। सूर्य किरणें साढ़े छह माह ऊर्वरक जल को रोके रहती हैं। आकाश में प्रतीक्षा करती रहती हैं-बारी आने की।
सप्तार्घ गर्भा: भुवनस्य रेतो
विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि
ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चित:
परिभुव: परिभवन्ति विश्वत:। ऋग/164.36
किरणें अंधेरे पथ (दक्षिण) से होकर जल के साथ ऊपर उठती हैं। पानी ऊपर जाकर ऋतु के अनुरूप नीचे आता है। अग्निA जल को ऊपर ले जाता है। पर्जन्य जल को नीचे लाता है।

किरणों को जल सोखने में लगभग 6 माह लगते हैं। सूर्य जब दक्षिणायन होता है,तब समुद्र से जल ग्रहण करते हैं। दक्षिण में ही ऋतागिA का स्थान है,जहां से वह निरन्तर उत्तर की ओर प्रवाहित होती रहती है। उत्तर में बर्फीला क्षेत्र सोम की उपस्थिति का प्रमाण है।

सोम नीचे की ओर बहता है,अग्निA ऊपर को। इनकी आपसी क्रिया ही ऋतु चक्र बनाती है। सूर्य का अन्तिम छोर (उत्तरायण) हिमालय ही है। अत: घाटी से टकराकर किरणें बरस पड़ती हैं। यहीं से सूर्य अपनी दिशा बदलकर दक्षिणायन हो जाता है। वर्षा के प्रमुख देवता अग्निA-वायु-आदित्य और सोम हैं। ये वर्षा के लिए इनसे प्रार्थना करते हैं-

हे वसव्य देव! अग्निA,सोम,सूर्य,हे शर्मण्यदेव! मित्र,वरूण,अर्यमन्,हे सपीति देव! अपांनपात्। आशु हेमन्
यह भी धारणा है कि पुरवाई वर्षा लाती है। आंथूणी (पश्चिमी) हवा वर्षा ले जाती है। देश में अनेक प्रकार के अनुष्ठान सोमयुक्त धुआं पैदा कर के बादलों को आकर्षित करते हैं,बरसने के लिए।

वायु की गति एवं दिशा बादलों की यात्रा तय करती हैं। उत्तरी (धराऊ) हवा बरसात लाती है। दक्षिणी (लंकाऊ) सूखा लाती है। दक्षिण-पश्चिम की हवाएं धूल भरी तथा गर्म होने से अच्छे शकुन वाली नहीं मानी जाती। आधुनिक विज्ञान ने वायु को श्रेणीबद्ध किया। भावक वायु तुरन्त वर्षा देने वाली,स्थापक वायु जंगलों को सींचने वाली है,ज्ञापक वायु परीक्षण काल को इंगित करता है। पवन धारणा का यही आधार है।

सारे मौसम तंत्र का विज्ञान यही है। पृथ्वी का अग्निA ऊपर उठता है। अन्तरिक्ष में तरल होकर वायु बन जाता है। अग्निA है,अत: ऊपर उठता जाता है। सूर्य क्षेत्र में विरल रूप आदित्य प्राण कहलाता है। सूर्य पृथ्वी से 21 स्तोम दूर है। इसके ऊपर 33 स्तोम पर परमेष्ठी मण्डल का,सोम मण्डल का,केन्द्र है। यहां आते-आते अग्निA शीतल होता हुआ सोम में रूपान्तरित हो जाता है। सोम बनते ही इसकी यात्रा नीचे की ओर फिर से शुरू हो जाती है।

पृथ्वी-अन्तरिक्ष-सूर्य के अग्निA प्राण अग्निA-वायु-आदित्य ही वैश्वानर रूप में सृष्टि का संचालन करते हैं। इनमें से किसी एक में भी यदि परिवर्तन होता है,तो शेष दो की गतिविधियों में भी परिवर्तन आएगा ही। हम देख रहे हैं कि पृथ्वी पर अग्निA बढ़ रही है,बर्फ पिघलकर समुद्र में पहुंच रही है। तब उत्तर से चलने वाला सोम कमजोर पड़ता ही जाएगा। पानी का स्तर समुद्र में ऊपर उठ रहा है। चन्द्रमा के गुरूत्वाकर्षण की मात्रा बदलेगी। गर्मी से वाष्प ज्यादा होगी। हवाओं के चक्रवात का क्रम अस्थिर होने लगेगा। तब पूरा संवत्सर ही प्रभावित होने लगेगा। भूत सृष्टि के निर्माण में भी परिवर्तन होने लग जाएंगे।

हम भी पर्यावरण की धज्जियां उड़ा रहे हैं। तेल-पानी-सोना-खनिज के नाम पर धरती को पोला कर रहे हैं। पेड़ काटकर एक ओर पक्षियों की प्रजातियों को नष्ट कर रहे हैं,वहीं दूसरी ओर सूखे की स्थिति को न्यौता दे रहे हैं। इतना ही नहीं,हम तो अनावश्यक वनस्पति,जैसे जंगली बबूल,यूक्लेप्टस आदि बो कर जल मात्रा का दुरूपयोग कर रहे हैं। हमारे अंग्रेजीदां वन अधिकारी इस हरियाली पर गर्व करते हैं।

यह हरियाली उनकी समझ की ही परिचायक है। पानी का दोहन भी राजनीति की चपेट में आ चुका है। पर्यावरण की परिभाषा भी प्रकृति के नियमों से मेल खाती हो,जरूरी नहीं है। तब क्या बचेगा भावी पीढ़ी के लिए! सड़े गले नोटों की गçaयां?

मौसम में अनियमित उतार-चढ़ाव का एक और कारण दिखाई देता है,विभिन्न कारणों से धरती के संतुलन में आ रहा परिवर्तन। समुद्र में एक तरफ रेत,लवण और कंकर-पत्थरों का जमावड़ा बढ़ रहा है,जिससे पृथ्वी का समुद्रीय भाग भारी होता जा रहा है। दूसरी ओर,खनन और पेड़ों की कटाई से जमीनी भाग हल्का हो रहा है। सूर्य की गर्मी भी पृथ्वी के केन्द्र तक जल्दी पहुंचने लगी है।

इसी तरह पृथ्वी की जो गर्मी चन्द्रमा और सूर्य तक पहुंचती है,उसमें भी अंतर आ रहा है। इससे इनके बीच चलने वाले विभिन्न आदान-प्रदान प्रभावित हो रहे हैं। इन सब कारणों का जो असर अभी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में दिखाई दे रहा है,वह तो मात्र शुरूआत है। हो सकता है पृथ्वी के जमीनी व समुद्रीय भार का असंतुलन पृथ्वी की धुरी का झुकाव ही बदल दे।

हो सकता है,वायुमंडल में ओजोन पर्त बिल्कुल छिन्न-भिन्न हो जाए। हमारा लालच,हमारी नासमझी आने वाले समय में पूरी पृथ्वी को कितने बड़े खतरे में डाल सकती है,अच्छा हो हम समय रहते समझ भी जाएं और चेत भी जाएं।

गुलाब कोठारी

1 टिप्पणी »

  1. res i am gov servants child so we have some limitations.this comment is not about ur this article but ek bhavna hai jo aap tak pahuchani hai .sir kya is kedarnath trasdi main aap nimnalikhit logo se appeal karna chahenge madad ki aam janta ki bhavna hai ki ve kewal kuch din 50000 packet dede
    1-parleji -biscits
    2 haldiram – namkin
    3 any company like whisper – sanetaRY NAPKINS
    4 sweaters
    5 bread-special packets
    6 anand -milk packets
    7 blenkets
    sir i dont like money giving wo paisa kahan jata hai pata bhi nahi chalta
    yadi sab se ek kambal maga jaye new sham tak puri ghati ke liya kambal aa jayenge.pl do some thing kam likha bahut samjhe.aap daily patrika maine hamara socha hi likh rahe hain.vishwas hai hamari ye bhawna bhi samajh jayenge k t

    टिप्पणी द्वारा dr kt — जून 27, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: