Gulabkothari's Blog

मई 27, 2013

क्रिकेट का कैंसर

जीवन एक खेल है, प्रेरणा है, उत्साह है, जीत का सपना भी है, किन्तु हार-जीत नहीं है। किसी भी खेल में सब नहीं जीत सकते। हार-जीत की अवधारणा खेल को जुआ बना देती है। इससे खेल का मूल उद्देश्य ही खो जाता है। आईपीएल के मैच फिक्सिंग के समाचारों ने पूरे देश के विश्वास को हिलाकर रख दिया।

इने-गिने खिलाड़ी, चन्द कागज के टुकड़े और सवा अरब लोगों का विश्वास। डूबकर मर जाना चाहिए इन खेलने और खिलाने वालों को, जो खेल के नाम पर माफिया की तरह हावी हो रहे हैं। राज्य सरकारें और केन्द्र क्या अनभिज्ञ हैं इन गतिविधियों से? क्या इतना बड़ा जुआघर बिना बड़े नेताओं की स्वीकृति के चल सकता है? क्या राजीव शुक्ला स्वयं की ताकत से वहां बैठे हैं? क्या खेलों में राजनीति का प्रवेश वांछित है या शुभ लक्षण है? आज जो कुछ मीडिया में आ रहा है, वह कोलगेट से कम है क्या? कानून और देश की इज्जत दोनों हाथों उछाली जा रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय भी मौन है, उच्चतम न्यायालय भी प्रसंज्ञान लेने को उत्सुक नहीं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और राज्यों के क्रिकेट संघों पर बड़े-बड़े राजनेता कब्जा जमाए बैठे हैं।

संसद में तो अनेक भागीदार स्वयं बैठे रहते हैं। केन्द्रीय मंत्री सी.पी. जोशी राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। इनको मालूम है कि राजस्थान रॉयल्स में इक्के-दुक्के राजस्थानी खिलाड़ी हैं।

जो फिक्सिंग में पकड़े गए, इसी टीम के हैं। कितना फर्जी मामला है। काम कोई और कर गया, काला टीका राजस्थान के माथे और वह भी जोशी जी के नेतृत्व में! इन्होंने तो राजस्थान का नाम हटा देने की चर्चा भी नहीं की। जाहिर है कि इनकी भी पूरी रूचि इन खेलों से जुड़ी है।

जब प्रदेश बाहरी लोगों से कलंकित हो रहा है, तब आरसीए अध्यक्ष को स्पष्टीकरण देना चाहिए कि क्यों वे इस्तीफा नहीं देंगे? क्या उनकी स्वीकृति इसमें शामिल नहीं है? क्या उन पर दागी लोगों को ठेके देने के आरोप नहीं हैं? अभी तक तो इनके खिलाफ जांच चल रही है। दोहरे भुगतान को लेकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच जारी है। साढ़े तीन करोड़ के घोटाले की जांच के लिए 15 दिन का समय मांगा है।

हो सकता है कि केन्द्रीय मंत्री होने के नाते ये जांच में निर्दोष साबित हो जाएं। जो कुछ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में हो रहा है, क्या उससे अनजान हैं? क्या कोई भी टीम सट्टे के दाग से बच सकती है? क्या किसी भी प्रदेश के क्रिकेट संघ का अध्यक्ष दूध का धुला हो सकता है। चेन्नई सुपर किंग्स का नाम तो सामने आ भी चुका है।

जिस खेल में दाऊद जैसे गिरोह अपना शिकंजा जमाए बैठे हों, वहां सब कुछ कानूनी दायरे में हो रहा होगा! अथवा, इस देश के मंत्री, नेता माफिया के कठपुतली का मुखौटा पहने होंगे। क्या इन्हें देशभक्तकहा जाना चाहिए या और कुछ। जहां अकेले एशियाई देशों में सट्टे का आकार 40 हजार करोड़ रूपए से भी अधिक हो, वहां आईपीएल के अधिकारियों को शीर्ष पुरूष नहीं माना जाए इस सट्टे का? क्या श्रीनिवासन के बयान से कि “फिçक्ंसग साबित करना अब पुलिस की जिम्मेदारी है” भीतर के तूफान की सूचना नहीं थी? उनके दामाद की भूमिका ही प्रत्येक टीम को कठघरे में खड़ा कर देती है।

राजीव शुक्ला की उपस्थिति इसे सार्वजनिक जुआघर बना रही है। तब इसकी आंच कहां तक जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। फिर भी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अध्यक्ष के साथ कार्यकारिणी के सभी सदस्यों के विरूद्ध मुकदमा चलना चाहिए। प्रान्तीय अध्यक्ष, विशेषकर राजस्थान के, इससे बाहर रह ही नहीं सकते, जिन्होंने प्रदेश की इज्जत माफिया के हवाले कर दी जिनके राज्य के नाम पर बनी टीम के सदस्यों पर दाऊद से जुड़ने तक के आरोप हैं।

पाठकों को याद होगा कि जयपुर में ही सन् 2008 के आईपीएल मैच में सार्वजनिक रूप से अतिथियों को शराब परोसी गई थी और लोगों ने तिरंगे पर रखकर पी थी।
जब से दाऊद देश के बाहर गया तब नब्बे के दशक से वह क्रिकेट से, वनडे से, सट्टे से जुड़ा रहा है। चालीस हजार करोड़ का बंटवारा छोटा होता है क्या? किसका ईमान नहीं डोलेगा। यही कारण है क्रिकेट में राजनीति घुस गई।

एक और अंग्रेजों की गुलामी का भग्नावशेष्ा क्रिकेट आज सट्टे और फिक्सिंग के कारण देश के लिए नासूर बन गया है। सवा अरब लोगों का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है? बस, टीवी खोलकर इनकी नटबाजी देखते रहो, कथा वचन करते रहो। मानो पूरा देश निठल्ला बैठा हो। कोई मंत्रालय ठोस कदम नहीं उठा पाएगा, किन्तु प्रधानमंत्री चाहें तो इस माफिया नेटवर्क को देश निकाला दे सकते हैं। माफिया बाहर और भ्रष्ट नेता, अधिकारी सब अन्दर!

गुलाब कोठारी

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