Gulabkothari's Blog

मई 30, 2013

सवाल ही सवाल

आप कभी बस्तर जाकर देखें। आपको यह क्षेत्र स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक देश का अंग लगेगा ही नहीं। हर व्यक्ति हçaयों का ढंाचा लगेगा। जैसे दादा ईदी अमीन अथवा नक्रुम्हा के शासनकाल में अफ्रीका के देशों का हाल था। न सड़कें, न बिजली, न पानी। स्कूल और अस्पताल भी नहीं। यहां तक कि चुनाव में बूथ भी गांव में कम तथा मार्गो के किनारे अघिक बनाए जाते हैं। लोगों को क्या पड़ी है। इसी का परिणाम है कि बस्तर सम्भाग की 12 सीटों में से 11 सत्तासीन भाजपा को मिलीं। शेष राज्य में दोनों दल बराबर हैं। पिछले सप्ताह हुए जघन्य हत्याकाण्ड ने कई प्रश्न भी खड़े कर दिए और समीकरण बदलने के संकेत भी दिए।

 

बस्तर का आदिवासी क्षेत्र दण्डकारण्य का एक हिस्सा है। इस दण्डकारण्य की सीमा 6 प्रांतों को जोड़ती है। यह मुख्यतया माओवादी गतिविघियों का मूल केन्द्र है। सूत्रों के अनुसार जब भाजपा की यात्रा इस क्षेत्र से निकल रही थी, तब दण्डकारण्य का कमांडर गणेश था।

 

उसको भाजपा की विकास यात्रा पर हमला करना था, जो कि वह नहीं कर पाया। 15-20 दिन पहले ही उसे हटाकर रमन्ना को बागडोर सौंपी गई। उसका पहला ही शिकार कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा हो गई। कांग्रेस का आरोप है कि हमले से कुछ दिन पहले ही सीआरपीएफ को कांगेर घाटी इलाके से हटाकर कैम्पों में भेज दिया गया। इससे माओवादियों को बाधा-मुक्त मार्ग मिल गया। खुफिया एजेसियों को पता था। फिर भी सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई। उच्चस्तरीय बैठक भी हुई हो या क्षेत्र का हवाई सर्वे किया गया हो जायजा लेने को, इसकी कोई जानकारी नहीं है।

 

माओवादियों का आक्रोश ‘सलवा-जुड़ूम’ से जुड़ा था। इसकी शुरूआत महेन्द्र कर्मा ने की थी। बाद में राज्य सरकार ने इसे विशिष्ट अभियान बना लिया। इस अभियान के तहत आदिवासियों को ट्रकों में भरकर पहाड़ों में बसे गांवों से नीचे लाया जाता था। माओवादियों को इस बात का आक्रोश था कि जो लोग मना करते थे, उन्हें माओवादी (नक्सली) कहकर मार दिया जाता था। खाली जंगलों को बड़े औद्योगिक घरानों तथा मल्टीनेशनल्स को खनन/उद्योगों के लिए दिया जाना लक्षित था।

 

इस अभियान का जबर्दस्त विरोध हुआ। बाद में उच्चतम न्यायालय ने इस अभियान को गैर संवैधानिक बताकर बंद करवा दिया। किंतु माओवादियों की नजर में कर्मा तथा राज्य सरकार इनके निशाने पर बनी रही। बात बस अवसर की थी। बेकसूर आदिवासियों पर गोलियां तो पिछले सप्ताह तक चलती रहीं। मासूम बच्चे, महिलाएं भी शिकार होती रहीं हैं-नक्सली के नाम पर। कौन सीएम जाएगा उनको पूछने?

कांग्रेस परिवर्तन यात्रा में केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत और नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे का सुकमा न जाना चर्चा का विषय है। दोनों की ही रमन सिंह से घनिषता जगजाहिर है। इनका कार्यकाल भी इसकी गवाही देता है। इन्होंने उसी दिन रायपुर छोड़ा, अन्यत्र जाने के लिए। अजीत जोगी सुकमा तो गए लेकिन परिवर्तन यात्रा का काफिला छोड़ हेलीकॉप्टर से रायपुर लौट गए।

 

अजीत जोगी भी मुख्यमंत्री के खिलाफ अरसे से मुंह बंद किए हुए हैं। चर्चा बस यही है कि विधायक कवासी लखमा माओवादियों के सम्पर्क में रहता है। वह जोगी समर्थक है। माओवादियों ने उसे जिस तरह छोड़ा, उससे वह शक के दायरे में है। आज वह अस्पताल से बाहर आने को तैयार नहीं है।

 

माओवादियों ने अपने लक्षित शत्रुओं को नाम ले-लेकर पुकारा और तलाश करके नृशंसता से मारा। घटना के तुरंत बाद भी सरकारी अमला, मंत्री, मुख्यमंत्री घटनास्थल पर नहीं गए। पिछले सप्ताह के हत्याकाण्ड के स्थान पर भी मुख्यमंत्री आज तक नहीं गए। शायद उनको आदिवासी इंसान ही नहीं लगते।

 

इससे बड़ी बात यह है कि जब हत्याओं के बाद माओवादी लौट रहे थे तो उनको रोकने वाला भी कोई नहीं था। अब, जब सीमा पार चले गए, तब सीआरपीएफ के एक हजार जवान भेजे गए हैं। किसके लिए यह नाटक? क्या हवाई जहाज से पीछा नहीं कर सकते थे। छाताधारी छोड़कर। या कुछ करना ही नहीं चाहते थे? प्रश्न तो कई और भी उठ रहे हैं। शायद समय ही इनका उत्तर दे पाए।

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