Gulabkothari's Blog

जून 9, 2013

मेरा और उसका

जीवन के सारे संघर्ष, द्वंद्व और तनावों के मूल में एक ही दृष्टिकोण कार्य करता है। क्या मेरा है और क्या मेरा नहीं है। आसक्ति का ममकार या राग, प्रियता सभी का आधार “मेरा” है। यह अलग बात है कि स्वयं को समझे बिना मैं “मेरा” कह देता हूं। तब होता यह है कि कहने के बाद भी वह “मेरा” नहीं होता। और मैं फिर भी उसे अपना मानकर जीता रहता हूं। कई बार कई लोग मेरे दिखाई पड़ते हैं, मेरे हों ही, यह जरूरी नहीं हैं।

जरूरी नहीं मेरे विचार भी मेरे हों। किसी महापुरूष के विचारों को भी मैं मेरे विचार मानकर जीता हूं। पेट भरने के लिए किसी की नौकरी करता हूं और उसकी बातों को मेरी मानकर खुद को समझता हूं। इन सबके बावजूद भी कुछ वास्तव में मेरा होता है। मेरा सपना, मेरा संकल्प, मेरी दिशा, मेरी गति एवं गंतव्य, मेरी पहचान यानी कि मेरा धर्म मेरा ही है। इसको कोई चुरा नहीं सकता। इसकी नकल नहीं कर सकता। इसका विकल्प भी नहीं है।

इन्फोसिस में नारायणमूर्ति की वापसी उनके शरीर नहीं, धर्म की है। आपको बुद्धिमान मिल जाएंगे, मेहनती मिल जाएंगे, प्रबंधक मिल जाएंगे, किन्तु संवदेनशील, धार्मिक संरक्षक नहीं मिलेंगे। मालिक मिलेंगे, माली नहीं मिलेंगे। मालिक की नजर धन पर होती है। सीईओ को भी धन चाहिए। परम्परा साख पर टिकी होती है। इसके लिए संस्कार, अनुशासन तथा उपभोक्ता का सम्मान होना जरूरी है। भावी पीढ़ी के धन काम नहीं आता। साख काम आती है। इसी से खानदान बनते हैं। इसके लिए तपना पड़ता है। व्यक्ति और संस्थान पर्यायवाची हो जाते हैं। आज के शिक्षित युवक को लक्ष्य बनाना आता ही नहीं। माली बगिया को, फूलों, तितलियों को सौरभयुक्त बयार को “मेरा” कहता है। इसी को जीवन व्यापार कहते हैं।

आज के युग में मालिक बनने के लिए “शिक्षित” होना पड़ता है। शिक्षित व्यक्ति कभी दूसरे के दर्द से दुखी नहीं हो सकता। माली के लिए अपने ही अपने हैं चारों ओर। दूसरा कोई नहीं। मालिक भोगवादी और माली भक्ति मार्गी होता है। दया, करूणा एवं वात्सल्य की मूर्ति। माली की तुलना मां से और मालिक की पिता से होती है। जहां मां है, वहां हरियाली है। जहां पिता है, वहां रूखापन है। इसका वृहद् रूप हम उद्योगों और व्यावसायिक घरानों में देख सकते हैं। मां के लिए प्रत्येक कर्मचारी संतान जैसा होगा।

न छोटा, न बड़ा। हर संतान मां के सपने को पूरा करने में ही व्यस्त दिखाई देगी। स्वयं स्फूर्त। पत्रिका में हर व्यक्ति मानकर जीता/जीती है कि “मैं पत्रिका हूं”। सी.ई.ओ. सबके साथ पद एवं भागीदारी को छोटी-बड़ी श्रेणियों में बांटकर, स्वयं को सर्वोच्च समझकर, अहंकार के साथ व्यवहार करेगा। जो पारिवारिक रूप से संचालित संस्थान हैं, जिन्होंने जड़ों को सींचा है, उन्हें पेड़ का दर्द सुनाई देता है। जो पत्तों, फूलों, फलों को गिनता है, उसे जड़ें अदृश्य जान पड़ती हैं। उसको सारे फल अपने लिए जान पड़ते हैं। मां सबको बराबर बांटती है। वही आत्मा सब में एकाकार रहती है। वही नारायण मूर्ति है।

हमारे देश के बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को शिक्षित लोगों ने स्थापित नहीं किया। बड़े सपने देखने वालों, बड़ा और दृढ़ निpय करने वालों ने स्थापित किए थे। उनके संकल्पित श्रम, बौद्धिक कौशल ने स्वयं को ही संस्थान के रूप में विकसित किया। दोनों सदा एक रहे, दम्पत्ति की तरह। पूरा संस्थान परिवार हो गया। हर व्यक्ति अंग-प्रत्यंग हो गया। प्रत्येक का स्वस्थ रहना ही संस्थान के स्वस्थ होने का प्रमाण है। कठिन समय में व्यक्ति संस्थान को बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देगा। अधिकारी नहीं करेगा।

अपना मकान, पत्नी के गहने बेचने के बजाए हो सकता है कि वह संस्थान छोड़ जाए। सरकार में क्लर्क को बाबू कहते हैं और बिड़ला के यहां मालिक को। श्रीमती सरला बिड़ला (90 वर्ष) को आज भी पूरा कोलकाता “बींदणी” के नाम से पुकारता है। ये सेंस ऑफ बिलांगिंगनेस ही प्रत्येक संस्थान की आत्मा होती है। परम्परागत संस्थानों में पुरानी पीढ़ी नीतियां बनाती है तथा नई पीढ़ी इनको लागू करती है। उनके समक्ष परिवर्तन रहता है। पुरानी पीढ़ी स्वयं का इतिहास, उद्योग के उतार-चढ़ाव, बैंक, बाजार के डीलर्स आदि का अनुभव लिए होती है। उसकी तीसरी आंख भी उपभोक्ता को अलग से देखती है। उससे बात करती है।

परम्परागत घरानों में जल्दी ही नई पीढ़ी कामकाज में जुड़ने लगती है। एक विशेष वातावरण में तैयार की जाती है। संस्थान को भी वह अपने भविष्य की तरह देखने लगती है। अधिकारी अपने वेतन के आधार पर टिकता है या चला जाता है। घर वाले उसके साथ गुप्त बातें भी नहीं करते। उसे बाहरी ही माना जाता है। आज हर बड़े संस्थान में कई-कई विशेष्ाज्ञ काम कर रहे हैं। स्पर्द्धा बढ़ी और संस्थान क्षमता से अधिक बढ़ने को भी मजबूर हो गए। माली अपने पौधों, फूलों और फलों को समझता है। मालिक स्पर्द्धा के चश्मे से देखता है। स्वयं के अनुभव पर या इतिहास पर विश्वास नहीं करता।

सरकारों को देखें। वे अक्सर फेल क्यों होती हैं। इसको आसानी से समझा जा सकता हैं। अधिकांश अफसर बाहरी होते हैं। जमीन से उनका जुड़ाव नहीं होता। लोगों के प्रति उनमें दर्द नहीं होता। जो राजनेता कहते हैं, उसको कई गुणा ज्यादा नुकसान की नीतियां बना देते हैं। उदाहरण के लिए लगभग सारी योजनाएं देर से पूरी होती हैं। एक तो योजना की मूल लागत ही कई गुणा ज्यादा होती है। दूसरे देरी के कारण उसकी लागत कई गुणा बढ़ जाती है। क्यों? क्योंकि सबका ध्यान अपने-अपने कमीशन पर होता है। जनता का धन तो बोरियों में भरी गुलाल है, मुçटयां भर-भर कर उड़ाते रहो। न नेता का कोई संकल्प जनता के प्रति, न ही अधिकारी का। जनता तो पूरी कार्यशैली में इनको दिखाई ही नहीं देती। तब सरकारें फेल क्यों नहीं होंगी?

सार्वजनिक संस्थानों में, पारम्परिक संस्थानों की तरह आत्मा नहीं होती है। शरीर होता है, बुद्धि होती है, ममकार होता है। ये सारे परिवर्तनशील हैं। कपड़ों की तरह विशेषज्ञ बदलते रहते हैं। वे इतने तेज होते हैं कि संवेदना उनके आस-पास नहीं टिकती। वे जीवन में बहु-विवाह को बुरा नहीं मानते। टाटा-बिड़ला तो ऎसा नहीं कर सकते। नया प्रबंधक अकेला पड़ जाता है।

घड़ी और कलैण्डर देखकर काम करता है। जबकि उसका कार्य कर्मचारियों को रूपान्तरित करते रहना होता है। वह कर्मचारियों के बीच जीने को उत्सुक ही नहीं होता। जब उसमें संस्थान के प्रति दर्द ही नहीं होगा, स्वयं टिककर काम नहीं करेगा, कर्मचारियों का आकलन केवल क्या किया से करेगा, तब अन्य कर्मचारियों में दक्षता कैसे फूंक पाएगा? कर्मचारियों में सुरक्षा का भाव कैसे भर पाएगा! संस्थान का धन-साधन उतने महत्वपूर्ण नहीं, जितने कि प्रबंधन की ऊर्जाएं, भावनाएं तथा कर्मियों के साथ एकरूपता महत्वपूर्ण हैं।

तब व्यक्ति आपके हो सकते हैं। शेष्ा प्रबंधन स्वत: हो जाता है। मेरे कार्यकाल में अनेक बड़े-बड़े आपातकाल आए, और सबने मिलकर हंसते-खेलते पार कर लिए। सदा बड़े बनकर ही निकले।

शिक्षित विशेषज्ञ गंभीर ही रहते हैं। उदारवादी भी नहीं और नाप-तोल कर निपटाने वाले होते हैं। विश्व के सभी साम्राज्य व्यक्ति के “दृष्टि विस्तार” और मिलनसारिता के कारण बने हैं। प्रबंधकों के कारण नहीं बने। जहां दो या तीन पीढियां दिन-रात एक ही दर्शन पर टिकी रहती हैं, वे ही विकास पाती हैं। ये पीढिया एक-दूसरे की शुभचिंतक भी होती हैं। उनकी भावी दृष्टि उनकी नीतियों के मूल में रहती हैं, मानों अगली पीढ़ी के लिए निर्णय कर रहे हों।
परम्परागत प्रबंधन पहले कर्मचारियों का विकास करता है। अन्त में स्वयं का।

श्रद्धेय बाबूसा. का संकल्प मैंने देखा है। जब तक उनके सहयोगियों के मकान नहीं बन गए, उन्होंने अपना मकान बनाने की सोची तक नहीं। कर्मचारियों के विकास में ही संस्थान विकास पाता है। तब कर्मचारी भी आपके सपने को अपने सपने की तरह स्वीकारता है। पूर्ण मनोयोग से उसे पूरा करने में जुट जाता है। अब धन उसका लक्ष्य नहीं रहता। आज पत्रिका में सौ से अधिक लोग अपने कार्य-काल की रजत जयन्ती मना चुके हैं। कई की दूसरी पीढियां साथ जुड़ चुकी हैं। सब पत्रिका के इतिहास के साक्षी है। ये सभी नई पीढ़ी से अधिक मूल्यवान हैं। नए प्रबंधक के खून में संस्थान का इतिहास नहीं हो सकता।

समय बदल गया। तकनीक ने बहुत कुछ बदल दिया, आदमी स्वयं बदल गया। भौतिकवाद, वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद, आतंकवाद, स्पर्द्धा-प्रतिस्पर्द्धा, मानव मूल्यों में गिरावट, नीतियों का राजनीतिकरण आदि न जाने क्या-क्या बदल गया। अर्थशास्त्र बदल गया, कानून बदल गए। भ्रष्टाचार आ गया। निश्चित तौर पर विशेषज्ञों की जरूरतें बढ़ेगी। एक नई समन्वित दृष्टि का विकास अनिवार्य हो गया।

कहां तो हम बचत के आधार पर व्यापार करते थे, कहां “उधार लो, खा-पीकर चल दो” आ गया। आदमी आज गौण हो गया। निर्णय करने की गति बढ़ गई। सोचने का समय किसके पास है। कोई मरता है, मरे। बला से। भावनात्मक धरातल तो जीवन-रेखा है, वटवृक्ष को हरा रखने की। नया सीईओ नहीं मानता यह सब। पेड़ को सूखने में क्या देर लगती है। हर संस्थान के पास नारायण मूर्ति नहीं है। वापस कौन लौटेगा?

गुलाब कोठारी

1 टिप्पणी »

  1. once again your view provides a moral booster…. 🙂

    simply thank you sir ,,,

    टिप्पणी द्वारा updesh — जून 13, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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