Gulabkothari's Blog

जून 11, 2013

धत् तेरे की

लालकृष्ण आडवाणी कितने होशियार और चालाक हैं यह इस बात से ही समझ में आ जाता है कि उन्होंने केवल भाजपा के तीन पदों से ही इस्तीफा दिया है। 1-2-3 । न तो एनडीए के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और न ही राजनीति छोड़ने की घोषणा ही की। भाजपा तो उनकी घर की मुर्गी है। सारा दिन हो गया उनको मनाते हुए।

मनाना और न मनाना कोई अर्थ नहीं रखते। सब कुछ एक बड़े नाटक का अध्याय बनकर रह जाएगा। जो भाजपा और संघ, तीन दिन से आडवाणी को बाहर निकाल कर प्रसन्न थे, आज वे ही उनको मनाने में लगे हैं। वे पहले झूठ बोल रहे थे अथवा आज झूठ बोल रहे हैं? उपप्रधानमंत्री रहते हुए आडवाणी ने यह भी साबित कर दिया था कि वे अपनी बात को ही सही ठहराने की जिद करते रहने वाले हैं।

संघ के प्रतिनिधि के रूप में उच्च पदासीन होकर सदा संघ के विरोध में बोले। वाजपेयी जी तक को भ्रमित करते रहे, यह तो इतिहास की साक्षी में हुआ है। शकुनि मामा की तरह शतरंज की चालें चलना आता है। ये कभी सत्ता को छोड़ने वाले नहीं हैं। यह तो निश्चित है। इनका बस चलता तो अंतिम भारत यात्रा में ये अपनी पुत्री को भी नेता बना चुके होते। यात्रा भी तो इन्होंने अपनी हठ से ही की थी।

पाठकों को याद होगा कि एनडीए के सहसंयोजक बनने के लिए और संसद भवन में उसका कक्ष पाने के लिए आडवाणी ने एक तरह की जिहाद छेड़ दी थी। उसी समय सुषमा ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तथा अरूण जेटली ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष की मांग पर शोर मचाया था। कुछ दिन पूर्व तीनों ही नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध एक हो गए थे। आज अरूण जेटली मौन होकर राजनाथ के घर गए। साथ में वेंकैया नायडू।

अब यदि सुषमा के कहने पर, गुरूमूर्ति के मनाने पर आडवाणी अपना इस्तीफा वापस ले लेते हैं, तो उसका अर्थ क्या लगाया जाए? शुद्ध नाटक! देशवासियों को ब्लैकमेल करने का पुराना तरीका। क्योंकि इस्तीफा देने की इनकी नीयत ही नहीं दिखाई देती। इनका दोहरा चेहरा स्पष्ट हो गया। नरेन्द्र मोदी प्रकरण से देश में लोकतंत्र के दूसरे बड़े प्रहरी का अधिवेशन राष्ट्रचिंतन के स्थान पर गृहक्लेश की भेंट चढ़कर रह गया।

नरेन्द्र मोदी अपने अभियान में कितने सफल होंगे, ये तो इनके सितारे ही समझाएंगे। किन्तु इनका यह कहना कि उन्हें आडवाणी ने आशीर्वाद दिया है, झूठा साबित हो गया। यह तो पहला दिन था। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी में भी अड़चनें कम नहीं हैं। एनडीए के घटक इनको स्वीकार करेंगे या नहीं? क्या इनके अलावा अन्य नेता इस पद के लिए सपना नहीं देख रहे होंगे? स्वयं राजनाथ सिंह इस अवसर को गंवाना नहीं चाहेंगे।

अरूण जेटली भी लाइन में हैं। इनके झगड़े में भारी पड़ेंगी सुषमा स्वराज। वरिष्ठ भी हैं, लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता भी हैं, महिला हैं, घटक दलों के नेताओं को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। आडवाणी भी बाहर रहकर इनके लिए माहौल बनाएंगे अवश्य।

उधर मोहन भागवत जी गुजरात चुनाव में मोदी के विरूद्ध डटे रहे, स्वयं को राजनीति से बाहर बताते रहे। अचानक अधिवेशन के बीच मोदी को चुनाव प्रभारी नियुक्त करने का आह्वान करते रहे। आज मीडिया को कह रहे हैं कि मोदी इनके प्रिय व्यक्ति एवं पहली पसंद हैं।

देशवासी इन सब आचरण के पहलुओं का क्या अर्थ लगाएं? क्या यह थूककर चाट जाना नहीं है? सूत्र कहते हैं कि सुषमा स्वराज भी इस्तीफे की धमकी दे गई हैं। तब क्या मोदी जी बने रहेंगे? भागवत जी राजनाथ सिंह को सलाह दे चुके हैं कि यदि सुषमा या अन्य के इस्तीफे आते हैं तब तुरंत मोदी से इस्तीफा मांग लेना। यानी भागवत हों अथवा भाजपा का सामूहिक निर्णय, चौबीस घंटे आगे की भी नहीं सोच सकते। न अपने निर्णय पर स्थिर रहने की क्षमता ही दिखा पाए। राष्ट्रीय मुद्दों पर इनके फैसले क्या रंग लाएंगे!

इन सबसे ऊपर संघ में सुरेश सोनी का दबदबा! भाजपा के सारे “फंड रेजर” उनकी फौज में। दादाओं और माफियाओं की सेना। पता नहीं कब किसको उठा दें। कमाऊ पूत भी हैं संघ के। प्रत्यक्ष में कहीं चर्चा में नहीं, किन्तु प्रत्येक महत्वपूर्ण फैसले को प्रभावित करते हैं। सूत्र स्वीकार करते हैं कि इस बार भी इनकी अहम भूमिका थी। नागपुर से पिछले वर्ष 5-6 बार प्रचारित कराया गया कि इनको किनारे किया जा रहा है। वह भी झूठ ही साबित होता रहा है। संघ की पकड़ पर स्वयं में एक प्रश्न बन गया है।
नरेन्द्र मोदी का सपना इन्द्रासन था। विधाता ने निद्रासन थमा दिया। यदि सुषमा का इस्तीफा आ जाता है, तो यह भी गया। सब कुछ मिलाकर यह राष्ट्रीय स्तर के उत्तरदायित्व बोध की सूचना नहीं है। प्राथमिक शाला के बच्चों की खिलौनों को लेकर की गई लड़ाई ही कही जाएगी।

जो हो रहा है, वह संघ, भाजपा, देश सबके लिए शर्म की बात है।
आडवाणी के राजनीति छोड़ने से क्या तो भाजपा की हानि होगी और क्या देश की राजनीति में अपूरणीय क्षति होने वाली है। भाजपा को इनका इस्तीफा स्वीकार कर लेना चाहिए ताकि पूरे अध्याय का पटाक्षेप हो सके। साथ ही देश को एक अनुभवी राजनेता सलाहकार के रूप में उपलब्ध हो सकेंगे। राजनीति से ऊपर उठ कर।

गुलाब कोठारी

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