Gulabkothari's Blog

जून 12, 2013

आपु तो कही भीतर रही…

रहीम दास जी का एक दोहा है…
“”रहिमन जिव्हा बावरी, कह गई स्वर्ग पाताल।
आपु तो कही भीतर रही, जूती खात कपाल।।””

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के ताजा इस्तीफा प्रकरण पर यह दोहा सटीक बैठता है। यदि यह सही है कि जब भाजपा शीर्ष ने आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने की गारण्टी देने से मना कर दिया था। नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार का प्रभारी हटाने या आडवाणी के अधीन कार्य करने की शर्त नहीं मानी थी। तब अगले ही दिन आडवाणी ने अपना इस्तीफा राजनाथ सिंह को सौंप दिया था। अपनी होनहार पुत्री की सलाह पर। उसके बाद गोवा अधिवेशन में स्वास्थ्य के झूठे बहाने से नहीं जाना क्या ब्लैकमेल की परिभाषा में नहीं आता? स्वास्थ्य कितना खराब था यह तो पूरे देश ने जयपुर की वीडियो कान्फ्रेंसिंग में देख ही लिया। स्वयं को इतना बड़ा नेता मानने वाले, इतना घटिया व्यवहार करके प्रधानमंत्री बनना चाहे तो इनसे बड़ा शातिर कौन? धत् तेरे की।

दिन में जैसे ही आडवाणी की यह शर्त बाहर फैली, भाजपा और आडवाणी अपना-अपना चेहरा साफ करने में जुट गए। इतना नीचे गिरने का उदाहरण आजादी के बाद देखने को नहीं मिला। वैसे भी इस्तीफा दे-देकर ब्लैकमेल पहले भी करते रहे हैं आडवाणी। दिन में फिर चर्चा चली कि मुद्दे पर पर्दा कैसे डाला जाए। तब सुझाव आया कि छह राज्यों के चुनाव की बागडोर एक समिति को सौंप दी जाए।

मोदी लोकसभा के चुनाव का संयोजन करें। यह प्रस्ताव भी कूड़ेदान में गया। दिनभर राजनाथ सिंह कहते रहे कि संघ सारे घटनाक्रम से बाहर है। और फोन पर सम्पर्क में भी बने रहे। आडवाणी के सामने बचाव का मार्ग ही नहीं था। सबकी नजरों में गिर चुके थे। मानो एवरेस्ट से लुढ़क कर तराई में धराशायी हो गए हों। फिर भी कुर्सी का मोह, वाह रे जिन्दगी! सबसे अच्छा परिणाम इस पूरे छात्रसंघ चुनाव का यह रहा कि पार्टी की हैसियत से भाजपा सशक्त बनकर उभरी या नहीं लेकिन उस पर संघ की पकड़ मजबूत ही हुई है।

भले ही मोहन भागवत के सहयोग से यह उपलब्घि हासिल हुई हो। आडवाणी और मोदी दोनों की बोलती बंद कर दी। न मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया और न ही आडवाणी की शर्ते स्वीकार कीं। बाद में जिन शर्तो पर आडवाणी ने इस्तीफा वापस लेना स्वीकार किया, वे तो पूर्णत: अर्थहीन एवं बचकानी हैं। प्रधानमंत्री उम्मीदवार का निर्णय राजग करे। इसमें शर्त क्या है, सिवाय शर्म छिपाने के। सुरेश सोनी को हटाया जाए। वे तो संघ के आदमी हैं। भाजपा कैसे हटाए। कुछ पदाधिकारी बदले जाएं। यह शर्ते प्रधानमंत्री के दावेदार ने रखी!!! इतनी बेइज्ाती करवाकर भी रिटायर नहीं हुए। बल्कि यह भी कहा कि निवृत्ति की बात ज्यादा न उछालें। इस्तीफा वापस लेते ही नाटक का पटाक्षेप हो गया।

चौबे जी, छब्बे जी बनने चले थे, दुब्बे जी बनकर लौटे। अब आडवाणी भले ही तीनों समितियों में बने रहें, किन्तु उनके चेहरे की यह कालिख मिटने वाली नहीं है। भले ही मोहन भागवत ने उन्हें कह दिया हो कि वे भाजपा का मार्गदर्शन करते रहें, किन्तु भाजपा पर नए सिरे से अविश्वास जताकर वे मिट्टी में मिल गए। उन्होंने इस्तीफा वापस लेने से पहले यह कहा था कि मुझे भाजपा का नहीं भागवत जी का आश्वासन चाहिए। पर्दा गिरने से पहले भाजपा ने उनकी यह अन्तिम इच्छा भी पूरी की। अब वे भाजपा के भरोसे भाजपा में नहीं रहना चाहते!

गुलाब कोठारी

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