Gulabkothari's Blog

जून 16, 2013

आगे बढ़ो देश गढ़ो

कितनी कीमत चुकाई थी इस देश ने आजादी के लिए। कितनी जानें न्यौछावर हुईं। उनके नाम पर आज कितने लोग बेशर्मी से, पेंशन ले रहे हैं। यह प्रमाण है कि 65 साल में हम “आजादी के मतवाले” देश को कहां से कहां ले आए। हर साल बेरोजगारी और भुखमरी का विकास हो रहा है। भ्रष्टाचार के परचम लहरा रहे हैं। नेता और अफसर स्वयं तो कानून से ऊपर जी रहे हैं। संविधान भारतीय लगता ही नहीं। इसमें इतने संशोधन हो चुके हैं विकास के नाम पर, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, तीनों पायों की सुरक्षा के नाम पर कि इसकी सूरत ही बिगड़ गई है। देश की एकता एवं अखण्डता का यह प्रतीक आज खण्डन-मण्डन (अल्पसंख्यक, आरक्षित वर्ग आदि) की मशाल हाथ में लिए खड़ा है। अखण्डता इतिहास में खो गई।

भारत ऋषि-मुनियों की, ध्यान-धारणा-समाधि, भक्ति, शौर्य की कर्म-स्थली रहा है। आज चोर-उचक्कों की, व्याभिचारी-भ्रष्टाचारियों, ईमान बेचकर परिवार पालने वालों की, बेरोजगारों, नशेडियों की भूमि बन गया है। हत्याएं, बलात्कार, अतिक्रमण, माफिया, लूट विकास के नारे बन गए। शायद स्वतंत्रता सेनानी आज यहां रखी अपनी तस्वीरें भी उठा ले जाएंगे। और हम, उनकी निकृष्ट संतानें मानवीय संवेदनाओं से दूर होकर एक-दूसरे के लिए ही यमदूत बन गए। अपने हित साधन में किसी का अहित भी हो तो होता रहे।

क्यों हुआ यह सब? अंग्रेज गए नहीं इस देश से। शरीर से जो भी अंग्रेज थे चले गए। दिमागी अंग्रेजों ने उनका स्थान ले लिया। भाषा के कारण नहीं, संस्कृति के कारण। आज भी वे भारतीय संस्कृति को दोनों पांवों से रौंद रहे हैं। शिक्षण, प्रशिक्षण और कानून पर उनका ही कब्जा है। वे संवेदनहीन भारतीय बनते जा रहे हैं। भारतीयों को वे साथ बैठने लायक भी नहीं मानते। अपनी बिरादरी को बचाने के लिए किसी भी सीमा तक कानून तोड़ सकते हैं। भारतीयता उनके लिए गर्व की बात नहीं। उनके जीवन से भारतीय मूल्यों की विदाई काफी हद तक हो चुकी है। अपनी संतानों को भी भारत से दूर रखकर गौरवान्वित होते रहते हैं।

दूसरा बड़ा कारण है शिक्षा। इसका उद्देश्य क्षमतावान तथा मूल्यवान इंसान तैयार करना था। आज “एजुकेट” किया जाता है। आठवीं तक परीक्षा नहीं। नौकरी में भी भारी छूट के मार्ग खुले हैं। मनरेगा में कर्महीन को भी धन मिल रहा है। सस्ता अनाज, मुफ्त इलाज और भारत दर्शन। कर्महीनता व अपेक्षा के साथ-साथ नए सिरे से परतंत्रता, आपराधिकरण सिर उठाने लगे। सब अंग्रेजीदां लोग देश को बेचते जा रहे हैं। बाजार पर विदेशी कब्जा करते जा रहे हैं। नीति-निर्माताओं का काला धन विदेश में जा रहा है। शिक्षा ने व्यक्ति को भी तोड़ डाला।

शरीर और बुद्धि शिक्षा के हवाले। मन और आत्मा धर्म के भरोसे, जो स्वयं शिक्षा से बड़ा व्यापार हो गया है। सुर्खियो में हैं धर्म गुरू। शिक्षा में आधा ही व्यक्तित्व बन पा रहा है। यही मानवता का ह्रास का आधारभूत कारण है। मूल्य और मानव तो शिक्षा में रहे ही नहीं। विषय रह गए-कैरियर रह गया-इंसान खो गया। टीवी-इंटरनेट, मोबाइल रह गया। पड़ोसी खो गया।

रिश्तेदारी उजड़ गई। व्यक्ति अकेला रह गया। समाज उजड़ने के कगार पर है। कोई माली या नारायण मूर्ति लौटने को तैयार नहीं है। कहते हैं कि भय बिन होत न प्रीत। लोकतंत्र की स्थापना के साथ-साथ तीनों पायों पर अंकुश या नजर रखने को मीडिया (उस समय प्रेस) की अवधारणा लागू की थी। जनता और सरकार के मध्य सेतु रहेगा, सामाजिक शिक्षा में भूमिका भी निभाएगा।

मीडिया के घर से तीनों स्तम्भ भी सही रास्ते चलते रहेंगे। आज हो सब उल्टा गया। वह अपने आप को चौथा पाया बना बैठा। सेतु टूट गया। सरकार में चार पाए हो गए। चौपाए तो निरंकुश ही होंगे। मीडिया के खून मुंह लग गया। वह भी व्यापारी हो गया। पाठक के साथ न रह कर उसके सामने खड़ा हो गया। सत्ता सुख भोगने के कारण दंत-नखहीन हो गया। यदा-कदा ब्लैकमेल भी कर लेता है। सारे भ्रष्टाचार का, देश के गर्त में जाने, नारकीय जीवन का यही एकमात्र कारण है।

आज के अंक के साथ ही पत्रिका नया अभियान शुरू कर रहा है। आप “जागो जनमत” के साक्षी रहे हैं। अमृतम् जलम्, एक मुटी अनाज, करगिल शहीदों की सहायता जैसे कई सामाजिक सरोकारों में पत्रिका के साथ आपने भागीदारी की है। अब कल से आप और हम आकलन करेंगे, विषयवार कि हमने क्या सपना देखा था, क्या हुआ और क्यों, क्या ठीक हो सकता है, कैसे हम भागीदारी निभा सकते हैं।

“हमारी भागीदारी” सबसे महत्वपूर्ण निर्णय होगा-जनता के द्वारा। दैनिक रूप से किसी न किसी क्षेत्र की समीक्षा आपके समक्ष रखेंगे। एक नए संकल्प के साथ-हम करेगे नए भारत का निर्माण। जो साथ नहीं देंगे, उनसे भी जनता निपट लेगी। हर युवा को संकल्प करना है- बीज हूं, तो वृक्ष बनूंगा। ईश्वर मुझे वृक्ष बनाए। मेरे फल देश के काम आएं!

गुलाब कोठारी

3 टिप्पणियाँ »

  1. आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ, सच कहूँ तो पिछले कुछ दिनो से सिर्फ आपके लेख पढ़ रहा हूँ, और सच कहता हूँ बीज हूँ वृक्ष बनूंगा। ईश्वर मुझे वृक्ष बनाए। मेरे फल देश के काम आएं!

    टिप्पणी द्वारा rajasthan — जून 22, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. vision 2025 ki soch kabil e tareef h.1 ya 2 vyktiyo ke sudhar se kam nahi chal sakta.ab to aajadi ke samay ka jazaba paida karna hoga.desh apnno ka gulam ho raha h.marg kathin h kintu asambhav nahi. HUM BADLENGE TO YUG AVSHAY BADLEGA.

    टिप्पणी द्वारा madhu sharma — जून 17, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. yah bilkul sahi hai. aaj ke bharat ka har vyakti khud ki sochne mein laga hai. use desh ke halat se koi matlab nahi rah gaya hai. yah chaar khamb wali baat bahut kahi hai aapne. rajneeti to desh ko kha hi rahi thi par ye media bhi aaj brasht leaders ki gulam ho gayi hai. aaj har vyakti kuch rupyo ke liye apne imaan ke sath samjhota kar leta hai. humare desh premi saniko ke balidan ka sab galat upyog kar rahe hai. humara desh kaal gart mein ja raha hai. patrika ke aaj ke sunday jacket mein bharat ke vision 2025 bahut khoob bataya gaya hai. har vyakti ko apne star par bharat ke vikas ke liye sochna hoga. tabhi naveen bharat ka nermaan hoga.

    टिप्पणी द्वारा himanshubadjatya — जून 16, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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