Gulabkothari's Blog

जून 18, 2013

वाह, मेरे दत्तक पुत्र!

मेरा गोद लिया बच्चा मेरे ही शरीर को नौंचे, मेरा ही खून पीए, मेरे घर को लूटकर अपना अलग महल बनाए, तब लोकतंत्र में उसे आप क्या कहेंगे-जनप्रतिनिधि-सांसद, विधायक, पार्षद, सरपंच? कल-परसों पढ़ा था, उत्तराखण्ड के एक विधायक राजेश शुक्ला की सम्पत्ति जो सन् 2007 में 87 लाख रूपए थी, सन् 2012 में 26 करोड़ रूपए (2900 प्रतिशत) हो गई। केन्द्र के घोटाले, खनन-खेल-रेल के घोटाले करने वाले सभी जनता के निर्लज्ज दत्तक पुत्र ही हैं। गीता-कुरूआन की कसमें खा कर संविधान से ही बलात्कार करते हैं।

संसद में कबूतरबाज, धन लेकर सवाल पूछने वाले, ठेकों के जरिए अरबों-खरबों के वारे-न्यारे करने वाले, शराब-चरस-गांजा-हथियार-सेक्स आदि का धंधा करने वाले अनेक मेरे जनप्रतिनिधि ही हैं। पुलिस की छत्रछाया में जमीनों पर कब्जे करना, चहेते अपराधियों की रक्षा करना, विरोधी दलों से सांठ-गांठ करके राज करते रहना ही आज इनकी विशेष्ाज्ञता हो गई है।

विधायिका हमारे संविधान का पहला पाया है। संविधान को देशहित में लागू करना, देशवासियों की मदद से, सामाजिक बहस के जरिए इसमें आवश्यकतानुसार संशोधन या बदलाव करना, सदन में विकास के मुद्दों पर जनता का पक्ष रखते हुए बहस करना, अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण करने के उपक्रम करना इनका कार्य है। आज तो यह कलियुगी पुत्र पांच साल लौटता ही नहीं। अधिकांश जनप्रतिनिधि झूठ पर झूठ बोलकर संविधान का चीरहरण करते रहते हैं।

विधायिका शक्ति सम्पन्न पाया है। आज देश के हालात कह रहे हैं कि हमने “बंदर के हाथ उस्तरा” दे दिया है। स्वयं को ही लहूलुहान कर दिया है। कार्यपालिका में धीरे-धीरे सब के मोल तय होने लग गए हैं। वे सलाहकार के स्थान पर चापलूसी करने लगे हैं। ऊपर से कितने दबंग दिखाई पड़ें, भीतर खोखले हैं। देश के श्रेष्ठतम शिक्षित वर्ग के लोग नेताओं की स्वार्थ सिद्धि में जुड़कर अपना पेट भर रहे हैं। धत् ऎसी जिन्दगी की! सरकारों को देखो। तब राजनीति का सही चित्र और करिश्मा नजर आएगा।

हर सरकार को लगता है कि धरती और आकाश पर उसका ही मालिकाना हक है। भूल जाएगी जनता तो पांच साल में। जिसे चाहो बेच डालो, तोड़ डालो, जेल में ठूंस दो, न्यायाधीशों को खरीद लो, मर्जी हमारी। पिछली पीढियां माली थीं, राजनीति की नई पीढ़ी स्वयं को मालिक मानती है। सब खा जाना चाहती हैं। उसी के साथ भारतीय जो मिलकर साथ चले। भले ही विपक्ष का हो।

कानून इन पर लागू कौन करे? संसद या विधानसभा कितने फरार लोग बैठे होते हैं। किसी कमिश्नर या डीजीपी की मां ने दूध पिलाया है, जो इनको उठा ले? देश में होने वाली अवैध गतिविधियों का इतिहास नेताओं के नाम से अटा पड़ा है। कालाधन और माफिया का चोली-दामन का साथ है। इतना पैसा अन्यत्र कहां लग सकता है! इसीलिए ऎसे नेताओं एवं अधिकारियों के सम्बंधी भी अपराधी हो जाते हैं।

कैसी विडम्बना है कि ईश्वर ने इनको इतना सक्षम बनाया कि ये चाहें तो करोड़ों लोगों की जिंदगियों में खुशियां लाकर उनके दिलों में राज कर सकते हैं। इसके विपरीत यह मंदबुद्धि 5 साल के आगे सोचना ही नहीं चाहते। स्वयं स्वार्थ के आगे देखना ही नहीं जानते। सदन में राष्ट्रीय के मुद्दों पर बहस नहीं करते या मुद्दों को समझते ही नहीं। शोर-शराबा इसकी दक्षता में जुड़ गया। अत: राष्ट्रीय मुद्दों को बिना सार्थक बहस के अथवा नाटकीय अन्दाज में, शोर के आवरण में ही पास करवा देते हैं। देशवासी की प्रतिक्रिया क्या होगी, किसको खबर पड़ती है।

जिस तरह के कानून संसद पास कर रही है, उससे यह भी प्रतीत होता है कि विदेशी शक्तियां किस तरह से हमारे कानूनों को प्रभावित कर रही हैं और किस प्रकार हमारी मुटी से छीनकर देश पर काबिज होती जा रही हैं।

आज यही देश के विकास का मार्ग है। कल देश कहां पहुंचेगा, मीडिया चाहे तो तय कर सकता है। मीडिया ने मौन धारण करना उचित समझ लिया है। बिना टकराव के मलाई का मार्ग है। भले देश गर्त में चला जाए। युवा अपने भविष्य के लिए त्राहि-त्राहि करता रहे। तब यह डोर युवा पीढ़ी को सौंपी जाए। राष्ट्र चेतना की क्रांति की बयार बहने लगे। आज दोनों दलों में कोई भेद नहीं रह गया। आश्वासनों के वाहक रह गए।

तकलीफ की बात यह है कि हमारे नेता, नेत्रियां, माफिया से जुड़े हैं या उनके शिकंजे में हैं। कई नीतियां इस रिश्ते से प्रभावित होती रही हैं। अनेक घोटालों की जांच आगे नहीं बढ़ पाती। संविधान गूंगा, कानून अंधा और जनता परदेसी हो गई अपने ही देश में। आजादी की तो राख भी उड़ चुकी है। शहीदों के खून के धब्बे धुल चुके भ्रष्टाचार की शराब में। यह नए युग की विकासवादी दृष्टि के विस्तार की शुरूआत है।

हर दबंग किसी के भी धर में घुसकर शत्रु के सैनिक की तरह कुछ भी कर सकता है। इस स्थिति से लोकतंत्र भी नहीं बचा पाएगा। बच गए, तो रोटी भी छीन लेगा। इस गुलामी से आजाद होना है। युवा को कमर कसनी पड़ेगी। विधायिका के मुखौटे हटाने हैं या फिर उन्हीं को बदल डालना है। इसी में हमारे भविष्य और लोकतंत्र की सुरक्षा और सम्मान सुरक्षित रह पाएगा।

गुलाब कोठारी
प्रधान सम्पादक पत्रिका समूह

1 टिप्पणी »

  1. Kothariji, Every otherday or so We get wonderful thoughts and concepts highlighted by your noble-soul. I liked todays despatch named “Wah ,Mere Dattak Putra’.Your timely,effective and far-reaching concepts are like contributions to the National growth. I have an idea to further your thoughts and concepts to attain a workable Mental and Moral development plan say for new generation called youths. To me , by creating a “CIty debating club “in each city we can help future voters,youth and debaters who can gather on a pre-notified Topic of national or Developmental interest. Each saturday/sunday or after each fortnight such debate can take place under a “City coordinating fellow”(I offer myself for this noble Job).at a specified Patrika’s place/Hall.. We understand that Countryman’s patriotism and their practical prudence is to be refined by such excercises.Hence till our youth is made aware of needs or niceties of nation we will not progress in right directions. Each regional head-quarter district ,thus,can have such a beginning with this debate developmental activity.
    I am grateful to the service attitude continuing in almost all of your ink and pen sketches in bygone weeks. God bless you with longer years.!My phone number is “09460191021 for ready querries. Transparently yours govind Singh Gehlot

    टिप्पणी द्वारा Govind Singh Gehlot — जून 18, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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