Gulabkothari's Blog

जून 19, 2013

धक्कामार सेवक

आपने पढ़ा होगा कि किस दिलेरी से भोपाल के अफसरों ने लगभग तीन सौ दुकानों वाली मीनाल मॉल को बारूद से उड़ा दिया था। उनकी देख-रेख में ही सारा निर्माण भी हुआ था। उनको क्यों बख्श दिया गया? क्या कार्रवाई में कहीं इन्सानियत का दर्द था या मात्र सत्ता का अहंकार? क्या मुख्यमंत्री ने मौन स्वीकृति नहीं दी होगी?

छत्तीसगढ़ में पुलिस के द्वारा आदिवासियों के विरूद्ध “सलवा जुडुम” अभियान चलाया गया। कितने आदिवासी मारे गए, कितनों को घर छोड़ना पड़ा, कितने माओवादियों से मिल गए, क्योंकि उनके झौंपडे भी पुलिस ने जला दिए थे। पुलिस की इस गौरवगाथा के वृत्त-चित्र कहां-कहां नहीं दिखाए गए! अन्त में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अभियान को गैर संवैधानिक करार दिया।

क्या बिना सरकार एवं मुख्यमंत्री की स्वीकृति के यह सारा हुआ था -संभव था?
राजस्थान पुलिस के एक अधीक्षक को सभी थानों से “बंधी” या मासिक वसूली के आरोप में पकड़ा गया। क्या यह बिना पुलिस महानिदेशक की जानकारी के संभव था? क्या उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई करने की राज्य सरकार ने सोची! क्या इस धन का अंश वहां तक नहीं जाता रहा होगा? क्या मध्यप्रदेश के सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा या छत्तीसगढ़ के नवीन जिन्दल बिना प्रशासनिक सहयोग के चल रहे हैं?

राजस्थान हो या बेल्लारी, अवैध खनन आज सातवे आसमान पर है। क्यों? क्यों भारत के सभी पड़ोसी भ्राता समान छोटे देश एक-एक करके शत्रु हो गए? कौन बनाता है भिन्न-भिन्न नीतियों के ड्राफ्ट जो सदन के पटल पर रखे जाते हैं? कौन लिखता है मंत्रियों के भ्रमित करने वाले वक्तव्य? कौन जिम्मेदार हंै चुनावों के झूठे आंकड़ों को स्वीकार करने के लिए? बजट बनाना, ऊंची दरों पर खर्च करना, बिल पास करना, झूठे बिल बनवाना किसका काम है?

प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, विदेश सेवा, वन सेवा, सिविल सेवा, न्यायिक सेवा, डाक सेवा, रेल सेवा वगैरह-वगैरह अनगिनत। और इनका हाल? भ्रष्ट, अभाव ग्रस्त, दूसरों को कष्ट पहुंचाकर अट्टहास करने वाले। अपने ही देश के नागरिकों को द्वितीय श्रेणी का मानने वाले, अपनी ही बिरादरी में बन्द रहकर जीने वाले ये हमारी कार्यपालिका के अंग हैं। सर्वश्रेष्ठ विभूतियां देश की किसी योजना को कई गुणा अधिक खर्च करके भी समय पर पूरा नहीं कर सकतीं।

कार्यपालिका लोकतंत्र का पाया है जिस पर लोकतंत्र टिका है। यह खुद आज भ्रष्टाचार पर टिका है। आरक्षण ने इस आग में घी का काम कर दिया। शासन-प्रशासन बंट गए। आरक्षण ने जो अवसर दिया विकास में भागीदारी का, यह वर्ग उसका लाभ नहीं उठा पाया। अपनी भावी पीढ़ी के विरूद्ध समाज को एकजुट होने का मार्ग भी प्रशस्त किया। आपसी वैमनस्य के चलते सरकारी कार्य अटकने लग गए।

स्वयं आरक्षित वर्ग सार्वजनिक स्थानों पर अपनी पहचान छिपाने लग गए। एक डॉक्टर ने नेम-प्लेट से उपनाम हटाया, उसके बाद
मरीज आने लगे। हाल ही एक अधिकारी के उठावने के विज्ञापन में उसका उपनाम हटा दिया। उनको डर था कि उसके कारण बहुत से लोग आएंगे ही नहीं। यही है कार्यपालिका के भविष्य की बानगी।

ऎसा इसलिए है कि इनकी शिक्षा और प्रशिक्षण भारत के सांस्कृतिक धरातल पर तथा भारतीय भाषाओं में नहीं होते। तब ये कैसे उन लोगों के साथ संवाद स्थापित कर सकते हैं? उनके साथ उठते-बैठते नहीं। अधिकांश अफसर अन्य प्रान्तों के, भिन्न-भिन्न भाषाओं को लेकर आते हैं। उनको भी अंगे्रजी अपनानी पड़ती है। स्थानीय भूमिका में कभी आ नहीं पाते। इसके स्थान पर वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव में उनके सपने भी दबकर रह जाते हैं।

हमारी वर्तमान कार्यपालिका हमारे लिए कार्य नहीं करती। अधिकांश तो स्वयं को लोक सेवक भी नहीं मानते। सुविधाओं का दोहन, परिजनों का हित साधन उनका लक्ष्य रहता है। मंत्री खुश रहे, तो उसके लिए भी किसी भी स्तर तक लुढ़क सकते हैं। आज हर सरकारी समारोह में सैकड़ों गुणा धन खर्च किया जाता है। किसके लिए? नेताओं और अफसरों के लिए।

उनके नौकरों और ड्राइवरों के लिए। सार्वजनिक समारोह में भी आम जनता को खूली छूट नहीं मिलती। तब लगता है कि अंग्रेजों का राज अभी गया नहीं है। यहां तक कि प्राइवेट कार्यक्रमों में भी फ्री पास के लिए जिस प्रकार धमकियां दी जाती हैं, आंखें दिखाई जाती हैं, वह अदा तो वाकई देखने लायक होती है। बड़े सार्वजनिक समारोह में तो सेना और पुलिस के जवान दो-तीन घण्टे पहले ही जगह घेर लेते हैं। बाल-बच्चों को फोकट में खाना खिलाकर कितना गर्व करते हैं! टोंक का एक अदना-सा अधिकारी ढाबे वाले को भुगतान नहीं करने पर अड़ गया। ढाबे वाला माना नहीं। अगले दिन यह कहकर ढाबा तोड़ दिया कि यह बिना स्वीकृति बनाया गया था।

आज ऎसे ही अधिकारी लोकतंत्र का स्वर्णिम इतिहास गढ़ रहे हैं। हर वर्ष बाढ़ आती है, सूखा पड़ता है, बजट भी बनते हैं। लोग मरते रहते हैं। 65 साल में भी हमारे विशेषज्ञ अधिकारी प्रबन्ध नहीं कर पाए। इनकी तो दावतें चलती रहती हैं। उत्तर भारत में दो दिन पहले मानसून की पहली बरसात में 60 से अधिक लोग मर गए। किसी भी शहर में सफाई, पानी का निकास, अतिक्रमण आदि कुछ ऎसे विषय हैं जिनके कारण जनता को नारकीय जीवन जीना पड़ता है। पीने के पानी में गटर लाइनों की बदबू भी इन पत्थर दिलों को नहीं पिघला पाती।

सड़कें तो इनको स्वर्ण सीढियां देती रहती हैं। जनता के धन से कुछ बनाते भी हैं, तो उपयोग के लिए जनता से टिकिट के पैसे मांगते हैं। करों की सारी आय वेतन भत्तों में जीम जाते हैं। विकास का उधार नई पीढ़ी चुकाए। फूटी कौड़ी भी देने का भाव इनके मन में नहीं आता। नेता जैसे अपनी सहायता राशि में दलाली काटने लगे हैं, ये भी नकल कर रहे हैं।

नए-नए आईएएस को कलक्टर बनाते हैं-जिलाधीश। जैसे कि हमारे मठाधीश होते हैं। एक-एक के पास दर्जनों समितियां होती हैं। सौ से ज्यादा भी हो सकती हैं। इस बच्चे को तो साल में एक बैठक करने का भी नम्बर नहीं आता दिखाई देता। बरसों काम सड़ता रहता है। इनमें भी इतना साहस नहीं होता कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को लागू करवा सकें। इनको रूकवाने में भी बंधी मिलती हो शायद। जैसे अपराधियों को नहीं पकड़ने पर पुलिस वसूलती रहती है।

आज की कार्यपालिका आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में नेताओं से बहुत पीछे नहीं है। इसी कारण लोकतंत्र में रहते हुए भी समाज में इन पर किसी को भरोसा नहीं रहा। जो अच्छे हैं वे भी संगत का शिकार हो रहे हैं। एक समय था जब आईएएस तथा आईपीएस अपने बच्चों को भी सेवा से जोड़ना चाहता था। अब कोई नहीं चाहता। सरकारी सेवा बिल्ली के छींके की तरह आकर्षक थी। अब तो अच्छे लोग पहले अन्यत्र प्रयास करते हैं।

गुलाब कोठारी
प्रधान सम्पादक पत्रिका समूह

1 टिप्पणी »

  1. simply superb..keep awakening us ..vision 2025 ..jai ho

    टिप्पणी द्वारा sajjan raj mehta — जून 20, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: