Gulabkothari's Blog

जून 21, 2013

मीडिया का विकल्प नहीं

इस सदी के विकास का आधार सूचना क्रान्ति माना जाएगा। इस क्रान्ति ने कई स्थानों पर जीवन की गति को ही बदल डाला, जीवन की दिशा को भीतर से धकेलना शुरू कर दिया, पृथ्वी की अनेक संस्कृतियों को मटियामेट कर दिया और करती ही जा रही है।

समय के साथ इस परिवर्तन की गति बढ़ भी रही है। आदमी इस गति से नहीं बदल पा रहा है। विश्व आज इसी त्रासदी से संघर्ष करने में व्यस्त है। हमारे देश में अभी थ्री-जी तकनीक चल रही है। फोर-जी आने वाली है। सूचनाओं के आदान-प्रदान की गति कई गुणा बढ़ जाएगी। क्या आम आदमी को इस गति की जरूरत भी है?

आज से कोई पचास साल पहले गांवों में तो अखबार भी नहीं थे, फोन नहीं थे, टी.वी. नहीं था। हमारे पास लाखों तरह की सूचनाएं नहीं थीं। जीने की हमारी गति आज भी धीमी है। जल्दी करनी भी पड़ जाए तो गलतियां कर बैठते हैं। जो ढेर सारी जानकारियां आज उपलब्ध हैं, उनकी समाज में क्या भूमिका है इसका आकलन कौन करता है। व्यक्ति किन सूचनाओं की ओर भाग रहा है और क्यों! समय के साथ जैसे-जैसे माध्यम जुड़ते गए, व्यक्ति भी बदलता गया। इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि इन सूचनाओं के उपयोग ने किस तरह के समाज का निर्माण किया।

किन सूचनाओं को व्यक्ति प्राथमिकता देता है-शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक अथवा आत्मिक। इसी के साथ व्यक्तिगत सूचनाओं के आदान-प्रदान का वाहक भी बन गया। दोनों भिन्न-भिन्न स्वरूप और भूमिकाएं सामने आई।

जब टी.वी. बाजार पर छाने लगा, तो समाचार-पत्रों को धक्का लगा कि वे टिक पाएंगे या नहीं। तब तक उनका स्वरूप सूचना-समाचार-विशेष लेख देने तक सीमित था। टी.वी. ने यही आक्रमण शुरू किया। एक तो रंगीन, गतिमान, ग्लैमर, पूरे दिन और विषयों की भरमार। टी.वी. ने मानव की भीतरी कमजोरियों को सम्बोधित किया और व्यक्ति फिसलता ही चला गया। आज तक नहीं लौटा। इंटरनेट ने उसकी नस दबा ली-“एकोहं बहुस्याम्” के नारे के साथ ही तो उसका विश्व में अवतरण हुआ था। उन्हीं सूचनाओं में लीन होता गया। जीवन के सभी लक्ष्यों को शरीर के हवाले कर दिया। शेष्ा तो बस नि:शेष। भारत में मीडिया शब्द ही नहीं था।

समाचार-पत्र थे। रेडियो था। अपनी-अपनी मर्यादाएं-अपना-अपना गौरव। इनका एक अन्य दायित्व भी था-सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में सामाजिक शिक्षण। चिन्तनशील, उत्तरदायी, बोधपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण में, श्रेष्ठ शुद्ध भाषा के साथ अपनी भूमिका निभाना। हमारा दर्शन शरीर के माध्यम से आत्मा तक पहुंचाने की सीख देता था।

इंटरनेट किसी भी बहाने खुले, अधिकांश युवा अकेले होते ही या तो अश्लील चित्रों तक पहुंच जाते हैं या फिर किसी प्रेम प्रसंग में व्यस्त हो जाते हैं। समय के साथ मीडिया भी सारी लाज-शर्म छोड़नेे पर उतारू होने लगा है। इतना ही नहीं समाचार पत्रों का कलेवर भी टी.वी. और इंटरनेट से स्पर्घा करने लगा है। आज सम्पूर्ण मीडिया मनोरंजन के शिकंजे में पहुंच गया। सम्पूर्ण युवा पीढ़ी को मनोरंजन तथा शरीर सुख के आवरण ने ढंक लिया, ऎसा प्रतीत होने लगा है। गृहस्थाश्रम तक के पचास वर्षो में मनोरंजन का स्थान ही नहीं है। जीवन का लक्ष्य चूंकि मोक्ष रहा है, अत: व्यक्ति तो इन्द्रिय निग्रह का अभ्यास करता था। आज तो मीडिया तथा सूचना तंत्र का भेद ही समाप्त हो गया। सोशल साइट्स भी मीडिया की भूमिका निभाने लगी हैं।

सच्चाई की कोई गारंटी नहीं। व्यक्ति की जानकारी का प्रश्न ही नहीं उठता। शादियां कराने का माध्यम बन गए और विवाह-विच्छेद को साधारण घटना बना दिया। व्यक्ति और समाज के प्रति संवेदना और उत्तरदायित्व का बोध, दोनों ही खो गए। उनका स्थान व्यापार ने ले लिया। जिस प्रकार शिक्षा कॅरियर-धन प्रधान हो गई, उसी प्रकार मीडिया भी धन पर जाकर ठहर गया।

लक्ष्मी का उल्लू तो अंधेरे में ही उड़ सकता है। इंटरनेट की नकल टी.वी ने शुरू की और टी.वी. के पद चिन्हों पर प्रिंट मीडिया ने कदम बढ़ा दिया। टी.वी. की अधिकांश कम्पनियां विदेशी थीं। अपने-अपने देशों में बैठकर टेलीकास्ट करती थीं। हमारे यहां उस प्रसारण का क्या प्रभाव पडेगा, यह उनकी चिन्ता का विषय हो भी क्यों! पश्चिम की जीवन शैली सदा ही हमारे आकर्षण का कारण रही है। लोकप्रियता के परिणाम तो व्यापार में आने ही थे। विज्ञापनों के लिए भी संघर्ष बढ़ा, नई भारतीय कम्पनियां भी बाजार में उतरीं, सामग्री पर मनोरंजन का दबाव भी बढ़ा। विज्ञापन दरों में भी समझौते होते चले गए। एक समय ऎसा भी आया था, जब विज्ञापनदाता मीडिया पर भारी पड़ने लग गया था। वहीं से नए व्यापारिक समझौतों की बाढ़ आ गई।

मीडिया में “पैकेज” व्यवस्था लागू हो गई। धन कमाने का नया मार्ग खुल गया। यही योजना चुनाव में भी प्रभावी सिद्ध हुई। करोड़ों के वारे-न्यारे हो गए। क्या फर्क पड़ता है किसी रिपोर्ट में “पेड न्यूज” की सूची छप गई तो? इन गतिविधियों ने मीडिया को पत्रकारिता के सिद्धान्तों से उतना ही दूर कर दिया जितना कि भौतिकवाद ने व्यक्ति को स्वयं की आत्मा से कर दिया।

पत्रकारिता के जिन सिद्धान्तों के कारण, तथा लोकतंत्र में प्रहरी की भूमिका को ध्यान में रखकर जो छूट संविधान में दी गई थी, वह भूमिका लक्ष्मी की गोद में समा गई। मीडिया ने अपने-आप को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ घोषित कर दिया और संविधान प्रदत्त तीनों पायों के साथ बैठने की हिमाकत कर बैठा। न प्रहरी रहा, न ही सेतु। जनता से इसका संवेदना का, विकास का, शिक्षा का रिश्ता टूट गया। जन समस्याओं की अभिव्यक्ति पीछे छूट गई। सार्वजनिक बहस किसी कानून या सरकारी नीति पर छिड़ती ही नहीं। सबसे बड़ा आघात मीडिया को, विशेषकर समाचार-पत्रों को यह लगा कि इन्होंने भारतीय संस्कृति का धरातल छोड़ दिया। शुद्ध उद्योगपति बन गए। किसी प्रकार के पत्रकारिता के सिद्धान्तों से चिपकने की जरूरत भी समाप्त हो गई।

अब तो बड़ा प्रश्न यह हो गया कि क्यों न इनको उद्योगों का दर्जा दे दिया जाए! क्या जरूरत है इनको “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की? सही पूछो तो उस स्वतंत्रता के लिए इनका संघर्ष ही समाप्त हो गया। अधिकार चाहिए तो हर एक को भारतीय लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में भूमिका निभाने का संकल्प-पत्र भरना होगा। धन के बदले पाठकों का विश्वास नहीं बेचेंगे। दोगलापन करते रहे तो एक दिन पाठक घर से निकाल भी देगा। नया युवा लिहाज नहीं करेगा। तब जाकर लोकतंत्र पुन: प्रतिष्ठित होगा। यदि अपने संकल्प पर टिके रहो तो सशक्त मीडिया के आगे भ्रष्टाचार के भूत भागते नजर आएंगे।

मीडिया के व्यापारिक दृष्टिकोण ने उसे काफी हद तक जनता के प्रति उदासीन बना दिया। समाचार-पत्र तो कभी नैतिकता के संदेश वाहक माने जाने जाते थे। आज ऎसे-ऎसे अनैतिक विज्ञापन छाप देते हैं, जिनकी भाषा सभ्य समाज की नहीं हो सकती। नीति-सिद्धान्त गौण हो गए, क्योंकि विदेशी निवेश के कारण इनमें व्यवसाय प्राथमिक हो गया। विदेशी निवेशक को मेरे राष्ट्रहित की पड़ी है। अश्लीलता और अनैतिकता उनके सभ्य समाज में मान्य है। इस व्यावसायिक दौड़ में अखबार इतने कमजोर हो गए कि उनमें पाठक, समाज या देश को सही और सच बताने का साहस ही नहीं रहा। कश्मीर, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे मुद्दों पर 65 साल से अनभिज्ञ बने बैठे हैं।

या फिर जो खरीद ले उसके भौंपू बनने को तैयार हो जाते हैं। उनके राज्यों के समाचार-पत्र यह स्वरूप धारण कर चुके हैं। चुनावी “पैकेज” भी इसकी पुष्टि ही हैं। यही वह कारण भी है कि मीडिया पाठकों के बजाए व्यापारियों तथा उद्योगपतियों का हित चिन्तक अधिक हो गया। नीरा राडिया प्रकरण में तो मीडिया के तेज तर्रार, राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित पत्रकार जिस प्रकार नंगे नजर आए, ऎसा दिन मीडिया जगत में ईश्वर करे वापस नहीं आए।

इतना ही नहीं आज बड़े-बड़े व्यवसायी घराने एक के बाद एक मीडिया समूहों का अधिग्रहण करते जा रहे हैं। मीडिया के माध्यम से अपनी शक्ति, व्यावसायिक हित और राजनीति में भागीदारी बढ़ाना ही उद्देश्य है। पाठक उनके सामने नहीं होता। कई व्यावसायिक समूह इसी उद्देश्य से अपने ही अखबार निकालने लगे हैं। व्यवसाय से ऊपर उठकर पत्रकारिता के मूल्यों पर विश्वास करने वाले मीडिया समूह तो इने-गिने रह गए। जनता का यह स्वार्थ होना चाहिए कि खोटे प्रत्याशी की तरह खोटे मीडिया का चयन भी नहीं करे।

गुलाब कोठारी

प्रधान सम्पादक पत्रिका समूह

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1 टिप्पणी »

  1. मीडिया से जुड़े व्यक्ति का मीडिया के बारे इतनी निष्पक्षता से लिखना काबिलेतारीफ है- सारिक खान

    टिप्पणी द्वारा sarik khan — जून 21, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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