Gulabkothari's Blog

जून 22, 2013

रजत पट पर काला ही काला

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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आज का मानव दु:खी है, तो अपने मन की चंचलता से। न तो उसे चंचलता का प्रभाव समझ में आता है और न ही उसे इस पर नियंत्रण करना आता है। बल्कि सत्ता से जुड़े, प्रभावशाली, धनिक श्रेष्ठी तथा आपराधिक प्रवृत्ति के लोग तो इस चंचलता पर गौरवान्वित होते हैं।

चंचलता को हवा देते रहते हैं। निरन्तर बनी रहने वाली चंचलता मन को प्रवाह पतित करती है। प्रवाह नीचे की ओर ही ले जा सकता है। अत: इसी चंचलता के प्रभाव में समाज भी कमोबेश नीचे ही गिरकर संतुष्ट है। आज शिक्षा व्यक्ति को हित-अहित की भेद दृष्टि नहीं देती। पेट से बंधी होने के कारण शिक्षा पेट के आगे सोचने ही नहीं देती। इच्छा पेट में पैदा नहीं होती। शिक्षा भी इच्छा को पैदा नहीं कर सकती। हम तो ईश्वर के हाथों कठपुतलियां हैं। यही चिन्तन हमारे दर्शन का आधार है।

उन्नीस सौ पचास के दशक तक सिनेमा में भी संस्कारों, मानव मूल्यों और आस्था की प्रधानता थी। अभिनेता और अभिनेत्रियां भी आदर्श रूप में प्रतिष्ठित थे। आजादी के समय का देशभक्त मीडिया समय के साथ दिशाहीन होता माफिया के शिकंजे तक पहुंच गया।

 

शराब और मादक पदार्थो की तरह यह भी एक मादकता ही परोस रहा है समाज में। सम्प्रेषण का इतना सशक्त माध्यम कोरे कागज जैसे युवामन के भीतर की कोमल दुर्बलताओं को वीभत्सता दे रहा है। आई.पी.एल. हो या सिनेमा, दोनों ही आज माफिया की मुटी में हैं। देर रात की कहानियां दोनों क्षेत्रों में ही दिन की “चीयर लीडर्स” पर उन्माद के आक्रमण की कहानियां कहती हैं।

तब ऎसे मीडिया से राष्ट्र प्रेम के संस्कार, संस्कृति का विकास या राष्ट्र निर्माण के संदेश की उम्मीद कैसे की जा सकती है? हिन्दी में ही औसतन दो फिल्में प्रतिदिन बनती हैं। हिट होती होगी महीने में दो। बाकी की फिल्में क्यों और किसके लिए बनाई जाती हैं? इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

एक समय था, जब पटकथा, गीत, संगीत, गायन आदि में प्रत्येक का महत्व था। भारतीय शास्त्रीय संगीत का विस्तार हुआ। कई घरानों को आगे बढ़ने का मार्ग मिला। अभिनय का अद्भुत प्रदर्शन आम आदमी को देखने को मिला। सिनेमा देश का पहला सस्ता और सर्वसुलभ मास मीडिया बना। बड़ा पर्दा इसकी आत्मा है।

छोटा पर्दा आज सौतन बन गया। घर के शयन कक्ष में प्रवेश कर गया। जो बड़े पर्दे पर नहीं देखा जा सकता, छोटे पर्दे पर वह भी उपलब्ध है। इसी स्पर्धा के रहते बड़ा पर्दा भी अपनी लक्ष्मण रेखा को आगे खिसकाता जा रहा है। कब मिट जाएगी पता नहीं। हर बार सेंसर बोर्ड ज्यादा से ज्यादा उदारवादी दिखाई देता है। न्यायपालिका भी समय के साथ लचीलापन बनाए रखती है, किन्तु लगता है, यह बांध ज्यादा दबाव सहन नहीं कर पाएगा। सरकारें आग में घी का डालने का काम कर रही हैं।

ऎसे-ऎसे कानून लाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ी हैं कि आदमी, आदमी कहलाने लायक भी न रहे। युवा जीवनशैली ही पोर्न बनकर रह जाएगी। बिना किसी बन्धन के दूसरे का शरीर भोगने की खुली छूट। तब टीवी और सिनेमा में सेंसर क्या काटेगा? सारे कानून और मर्यादाएं, आत्मानुशासन केवल समाचार-पत्रों के लिए! क्या बाकी माध्यम मीडिया की परिभाषा में नहीं आते? फिर यह सरकारी दोगलापन क्यों? कई बार जनता भी मुखौटा ओढ़ लेती है। पत्रिका में कोई चित्र छप जाए जिसमें अंग अधिक खुले हों, तो पाठक मुझे संवादों में ही टोकते रहे हैं।

“आपके यहां तो ऎसा नहीं होना चाहिए। बच्चों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरे यदि करते हैं, तो करने दीजिए।” कभी किसी ने टीवी या सिनेमा को लेकर शिकायतें की क्या? बल्कि इन्हीं दर्शकों के कारण महेश भट्ट जैसे कई निर्देशकों की फिल्में लोकप्रिय हुई। देशभर में अश्लील फिल्मों का मार्केट किसके भरोसे?

देश गढ़ने का बीड़ा यदि उठाना है, तो मन पर अंकुश लगाना सीखना पड़ेगा। आदमी बनने का मार्ग पकड़ना पड़ेगा। तपना पड़ेगा। हर युवा लड़के-लड़की को चिंतन करना पड़ेगा कि क्या नारी बाजार में बिकने की वस्तु है या प्रत्येक नर की जीवनसंगिनी है।

 

पुरूष्ा के जीवन को निर्मित करने वाली, पुरूष की शक्ति है। सिनेमा उसी नारी शक्ति का धन के लालच में दोहन कर रहा है। टीवी और सिनेमा नारी की अस्मत बेच रहे हैं। सार्वजनिक रूप से उसे नंगा करने का प्रयास कर रहे हैं। इनके पीछे कोई सभ्य इन्सान नहीं है। माफिया है बस। उसे धन कमाना है। उसके लिए शराब, चरस और औरत में कोई अंतर नहीं है। किंतु हमारा तो इस नारी से सरोकार होना चाहिए। हम भी तो इन्हीं से हैं।

हममें से ही किसी परिवार की होगी। नादानी में भूलवश भेडियों के हाथ पड़ गई। अब वहां देवता नहीं बसते पहले की तरह। आज तो अमिताभ बच्चन और शाहरूख खान भी लाचार बने बैठे हैं। फिर इनके मंदिर बनाने का क्या अर्थ रह जाएगा? क्यूं नहीं ये देवता देशहित में मुखरित होते। आमिर खान भी तो कर ही रहे हैं। क्यूं सिनेमा पर सभ्यता की आचार संहिता लागू नहीं करवाते? सेंसर बोर्ड भी क्या रिश्वत लेकर देश के साथ खिलवाड़ कर सकता है? स्वयं शर्मिला जी और शबाना जी तो अपने समय की बड़ी अदाकारा रही हैं। इन सबके रहते इनके द्वारा पोषित मसाला फिल्मों वाला सिनेमा देश को गर्त में ले जाने वाला कैसे बन गया? क्या इसी माध्यम के जरिए राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता?
आज का सिनेमा क्या हो गया, क्यों गीत और संगीत-नृत्य, सब तो इतने भौण्डे हो गए हैं कि धैर्य ही छूट जाता है? शास्त्रीय संगीत का आत्मीय धरातल छूट गया। शरीर के आगे नए संगीत का प्रभाव पहुंचता ही नहीं। पशुभाव को जाग्रत करने वाला है। किसी पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता। फिर भी आपका सिनेमा महंगा होता जा रहा है।

 

जो दूसरे के धन से फिल्में बनाते हैं, निवेशक के नियंत्रण में ही रहते हैं। हीरो-हिरोइन, कथा, संगीत आदि सभी में निवेशक का दखल रहता है। उसे लोकप्रियता नहीं, धन चाहिए। विदेशी निवेश के कारण प्रिंट मीडिया में भी तो यही हो रहा है। यहां भी सस्ता मनोरंजन प्रवेश कर गया। युवा को शरीर के रोमांच से भ्रमित रखना है, नशे को कम नहीं होने देना है। देश जिसका है, उसके देशवासी जानें। निवेशक पर यह दबाव क्यों?

क्या इस हाल में देश गढ़ने में सिनेमा योगदान कर सकता है? हरगिज नहीं! यह तो आज युवाओं का अपमान कर रहा है। जिस सिनेमा ने आजादी से पहले राष्ट्रभक्ति एवं विकास में योगदान का नारा दिया-धर्मात्मा, अछूत कन्या, बन्धन, किस्मत, हिन्दुस्तान हमारा जैसी फिल्मों से। जागृति, शहीद एवं हकीकत जैसी रोंगटे खड़े कर देने वाली, खून का प्रवाह का बढ़ा देने वाली फिल्मों की सौगंध खानी पड़ेगी। युवा मन को तरंगित करना होगा।

 

पृथ्वीराज कपूर की आवाज से। राजा हरिश्चंद्र से चलकर आलमआरा, रामायण और महाभारत जैसी फिल्में जिन्होंने पूरे देश को एक माला की तरह पिरोकर रखा। दुर्गेश नन्दिनी जैसी धरोहरों से परिचित कराना होगा देश के जवान को। फिल्मों को शिक्षा का पूरक बनना होगा। शिक्षा में आज मानवीय अभिव्यक्तियां, संवेदनाएं सब लुप्त हो गई। सिनेमा को लौटाना होगा नारी का वात्सल्य, करूणा, भाव, वो लोरियां जो नम कर देती हैं आंखों को आज भी।

 

कसमें खानी होंगी नर्गिस, मधुबाला, मीना कुमारी या वहीदा रहमान जैसी अभिव्यक्तियों की, जिनका स्वरूप आज भी तैर रहा है पिछली पीढ़ी की आंखों में। पुन: प्रतिष्ठित करना होगा नारी के खोये सम्मान को, ताकि हर पुरूष सभ्य हो सके। रेन-डांस पशु युग का प्रतीक है, जो भारत की कर्मभूमि का अपमान है। आज जितने दिग्गज हैं इस उद्योग में, उनको शपथ लेनी चाहिए कि उनका शेष जीवन देश गढ़ने में लगेगा। युवा शक्ति उनका अनुसरण करेगी। भारतीय सिनेमा को विदेशी चोला फेक देना चाहिए। बहुत कीमत चुका दी हर अभिनेता-अभिनेत्री ने भी। हमें नई पीढ़ी को भविष्य देना है, लाचारी नहीं देनी।

कर्णधारों को व्यक्तिश: राष्ट्रनिर्माण में अपनी आहुतियां देनी होंगी। आत्मा की मशाल जलानी होगी, ताकि धिक्कार ना पड़े आगे कभी! जिन-जिन अदाओं पर आपकी भी आंखें रोई थीं कभी, उठाओ सौगंध उन आत्माओं की-देश गढ़ने के लिए।

गुलाब कोठारी प्रधान सम्पादकपत्रिका समूह

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1 टिप्पणी »

  1. sahi kha sir.sabhi ko apni jimmedari samghni chahiye,paisa hi sab kuch nahi hota.desh ke prati unki bhi kuch jimmewariya hai.jinhe unhe nibhana chahiya.

    sir mughe aapka re manva mere series bahut pasand aa rhi hai .lekin last two post blog par upload hue hai,please upload left re manva mere also,

    thank you sir

    टिप्पणी द्वारा kulbhushan sharma — जून 23, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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