Gulabkothari's Blog

जून 23, 2013

सपनों का सौदागर

जब बन्दर अपनी समस्या का समाधान आपस में नहीं कर सकते, तब बिल्ली बुआजी बनकर टपकती है। बन्दरों को तराजू दिखा कर न्याय का आश्वासन भी देती रहती है और उनके हिस्से को चट भी कर जाती है। आज पूरे देश में अधिकांश सामाजिक संगठन, विशेषकर गैर सरकारी संगठन, बिल्ली की भूमिका में नजर आते हैं। भ्रष्टाचार का पर्याय कहे जाने लगे हैं। अकेले दिल्ली महानगर में महिलाओं और बच्चों से जुड़े सैकड़ों एनजीओ होंगे। इनमें भी ज्यादातर प्रभावशाली लोगों से जुड़े हैं। तभी इनको सरकार से करोड़ों रूपए के प्रोजेक्ट अथवा अनुदान प्राप्त हो सकते हैं। इनके कार्यो का अनुमान दिल्ली की महिलाओं और बच्चों की दुर्दशा देखकर लगाया जा सकता है। इनका जाल पूरे देश में फैला हुआ है। बडे-बड़े संगठनों में तो राजनेता, सेवानिवृत्त अधिकारी भी जुड़े होते हैं। सरकारी बजट का बड़ा अंश इनके मार्फत खर्च होता है। परिणाम-भ्रष्टाचार!

हमारा देश इतना बड़ा है और इतनी विभिन्नता लिए हुए है, इतनी भाषाओं का देश है कि एक कोने की बात दूसरे कोने में सुनाई नहीं देती। यह भी एक कारण है कि हमारे यहां सामाजिक संगठनों की भरमार है। फिर सम्प्रदाय भी अनगिनत हैं। उनके अपने-अपने आचार्य एवं मठाधीश हैं। ये स्वयं जनता से ही धन संग्रह करते हैं। जिस प्रकार की Civil Society विकसित देशों में कार्यरत दिखाई पड़ती है, उसकी नकल पर भी हमारे यहां हजारों संगठन काम कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि इनके कार्यो का आकलन कौन करता है। लोग तो जानते तक नहीं कि संगठन की जड़ कहां है। हां, अभियान चलाने वाले संगठन तो जनता के बीच में रहते हैं, किन्तु सेवा करने वाले संगठन बाहर से टपक पड़ते हैं।

स्थानीय लोगों से उनका कोई परिचय नहीं होता। इनका हिसाब-किताब भी जनता को जानने का अधिकार नहीं होता। सूचना के अधिकार से भी नहीं। प्रभावशीलता के मुखौटे इन संगठनों की आश्रय स्थली होते हैं। जनता में इनकी कोई पकड़ भी नहीं और जवाबदेही भी नहीं। हाल ही में “आवाज” संस्था का कारनामा सामने आया। ये मूक-बधिर कन्याओं के लिए एक छात्रावास चलाता रहा है। सरकार के समाज कल्याण विभाग से इसे धन उपलब्ध कराया जाता रहा है। वहां रहने वाली लड़कियों का यौन शोषण तथा दुष्कर्म का एक क्रम बना हुआ सामने आया। संस्थान स्थानीय स्तर पर उत्तरदायित्वबोध से पूर्णत: मुक्त रहा है। तब इनसे जनहित की उम्मीद कैसे की जा सकती है! एक से एक धुरंधर लोग, सेवानिवृत्त बेरोजगार या प्रभावशाली लोगों के परिजन कार्य करते हैं। बाहरी होने से नैतिक दबाव भी नहीं डाला जा सकता। अन्त में जनता के पछतावा ही हाथ लगता है।

दिल्ली में अन्ना हजारे का प्राकट्य भी एक उदाहरण है। जैसे ही नि:स्वार्थ, जनहित के मुद्दे को लक्षित करने आया, सम्पूर्ण राष्ट्र उसके साथ हो गया। किन्तु नैतिक दबाव का अभाव रहने से केजरीवाल, प्रशान्त भूषण, बाबा रामदेव, किरण बेदी जैसे लोग एक-एक करके विदा हो गए। आज तो अन्ना की आवाज भी खो गई। पानी में डूबने वाला जैसे बीच-बीच में ऊपर दिखाई दे जाता है, वही हाल अन्ना हजारे का हो गया है।

गैर सरकारी संगठन इतने बदनाम हो चुके कि आम आदमी इनकी चर्चा भी नहीं करता। भले ही इनके पास बड़ी सहायता आती होगी। जो कुछ संस्थान अच्छा कार्य करते हैं, उन पर स्वयं प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर रखा है। इसीलिए इनकी प्रभावी भूमिका दिखाई नहीं पड़ती। वरना, हर अच्छा संगठन अमूल की तरह बड़ा और देशव्यापी क्यों नहीं होता? क्यों जरा दूर चलकर लड़खड़ा जाते हैं अधिकांश संगठन? वरिष्ठ नागरिक, स्वच्छ शहर, पर्यावरण, ऊंट बचाओ, चिडिया बचाओ, मोर बचाओ आदि- अनगिनत संगठन और बचा कुछ भी नहीं पाते। “पेड़ बचाओ” के नारे कहां सुनाई देते हैं, जब सड़क चौड़ी करने के लिए सरकारी आदेशों के माध्यम से सैकड़ों-हजार पेड़ काटे जाते हैं?

सामाजिक संगठन चलाने के लिए प्रतिबद्धता की जरूरत पड़ती है। स्वयं के बजाए संस्थान के उद्देश्य के लिए जीने का संकल्प। बीज बनकर जमीन में गड़ जाने का संकल्प! कौन कर पाता है, इस भौतिकवादी युग में! पत्रिका के सामाजिक सरोकार सफल इसीलिए होते हैं कि कहीं निजी स्वार्थ नहीं जुड़ा, कहीं से कोई धन नहीं मांगा जाता। जनता स्वयं करती है, स्वयं के लिए करती है। हमारे देश की जीवन शैली तो मूल रूप से जनता पर टिकी है। हां, आज उनके रहनुमा बदल गए हैं। हमारे समाज का ढांचा जातिवाद पर आधारित रहा है।

अधिकतर सामाजिक संगठन पंचायतों के माध्यम से अपनी व्यवस्था बनाए रखते हैं। जाति शब्द “कर्म” वाचक है। अनेक कर्म भौगोलिक कारणों से भी प्रतिष्ठित रहते हैं। चूंकि खान-पान, पहनावा, परम्पराएं भी भूगोल से जुड़ी होती हैं, अत: भिन्न-भिन्न क्षेत्रो के, समान जाति के लोग भी व्यवहार में एक से नहीं दिखते। मारवाड़ का कृषक, शेखावाटी के कृषक से भिन्न होगा। जैसलमेर का गौ पालक भरतपुर या कोटा के गौ पालक से भिन्न संस्कृति का परिचायक होगा। राजनीतिक नेतृत्व ने इस स्वरूप को तोड़कर धडेबन्दी कर डाली। अब तो जातिवाद एक बड़ा रोग बनाया जा चुका है। आरक्षण का कैंसर जातिवाद पर ही आधारित है। इसने सबको एक-दूसरे का शत्रु बना दिया है।

तब कैसी एकता और अखण्डता? जातिवाद के साथ-साथ सम्प्रदायवाद और क्षेत्रीयता भी मुखरित हो उठी। जीवन का महत्व अब केवल राजनीति में भागीदारी रह गया है। राजनीति ने अपराधी बढ़ाए, जातिवाद ने उनको आश्रय दिया। आज ये अपराधी जातियों के लिए ही भस्मासुर साबित होने लग गए। कलंक बन गए, किन्तु सारा समुदाय राजनीति के नशे में इस कड़वे घूंट को भी पी रहा है। यहां तक कि क्षेत्रीय एवं जातीय पंचायतों पर भी ऎसे ही लोग काबिज होने लगे हैं। भाषा का अपना एक संघर्ष है।

आज की राजनीति ने जाति, सम्प्रदाय, धर्म जैसे संवेदनशील एवं गरिमामय विषयों की सारी संवेदना ही छीन ली। सामाजिक सौहार्द का स्थान आपस की लटबाजी ने ले लिया। राजनीति ने किसी को अल्पसंख्यक बना दिया, किसी को अनुसूचित जाति-जनजाति बना दिया। एक के बजाए दो-दो विशेषणों में बंट गया आदमी। सिख भी है तो अल्पसंख्यक भी है।

मीणा भी है तो अनुसूचित जनजाति का भी है। हर व्यक्ति के दोहरे चेहरे हो गए। एक चेहरे से तो वह परम्परागत समाज में अपने जातीय स्वरूप को बनाए रखता है। दूसरे चेहरे से विकासवादी किन्तु घिनौनी राजनीति की मार खा रहा है। हमारी भागीदारी ऎसी हो कि ये सारे संकुचन हट जाएं, सब एक रूप में भारतीय बनकर रह सकें। इनको भ्रमित करने वाले नेताओं, गुरूओं या उत्प्रेरकों (activists) से मुक्ति दिलवाएं। आज संविधान के अधिकार भी इन स्वरूपों ने छीन लिए हैं। तब किस लोकतंत्र का दावा करते हैं तीनों पाये? यदि एक रूपये में से पांच-सात पैसे ही नीचे तक पहुंच रहे हैं तो बाकी कौन खा रहा है? तीनों पाए, मीडिया और राडिया? ऊपर से रिश्वत, जो वेतन से भी ज्यादा हो गई।

वेतन भी जनता के धन से और रिश्वत भी जनता के धन से! इसी को जन सेवा का मेवा कहा जाता है। हमें हर उस पेड़ को उखाड़ देना है जिसमें कीड़ा लग गया हो। युवा शक्ति को इस देश का कर्णधार भी बनना है। तब संकल्प करना होगा कि वे ऎसे कौरव सेना के भ्रष्ट और धृष्ट महारथियों का मर्दन भी करेंगे, चाहे परिवार में ही क्यों न हों। वे स्वयं तो इनका अनुसरण कभी नहीं करेंगे। व्यक्ति भीतर अकेला ही जीता है। बाकी सब निमित्त हैं। हम तैयार करें खुद को ताकि इस चक्रव्यूह को तोड़ सकें, बाहर निकल सकें। एनजीओ के जिस नए माफिया ने मदद करने के बहाने समाज को पकड़ रखा है, अपने कर्मयोग से उसको भी आईना दिखाना है।

भारत जैसे देश में इस तरह का वातावरण कैसे बन गया। जहां हर व्यक्ति पुरूषार्थ के सहारे मोक्ष का सपना देखता था, कर्म को अपना धर्म मानता था, वह अचानक दुष्प्रवृत्तियों में कैसे रस लेने लग गया? जीवन के शाश्वत रूप को भूलकर नश्वरता पर गर्व करने लग गया! शरीर जीवी बन गया! क्यों? क्यों शरीर के भीतर रहने वाले की चर्चा शिक्षा में होती ही नहीं। पेट भरने के लिए नौकरी या मजदूरी। नौकरी नॉलेज के सहारे और मजदूरी शरीर के बल पर चलती हैं। दोनों ही जगह मानवीय संवेदनाओं की जरूरत नहीं पड़ती। लक्ष्मी को पाने की दौड़ में उजाले का मोह छोड़ना पड़ता है। उल्लू को उजाले में दिखाई ही नहीं देता। अत: लक्ष्मी की संगत रात को होने वाली गतिविधियों तक ही व्यक्ति को सीमित कर देती है। आध्यात्मिक धरातल छूट जाने के कारण शिक्षित लोग पशुवत् (आहार-निद्रा-भय-मैथुन) ही जी पाते हैं।

भारतीय शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण करती रही है। कोई शिक्षक आज की तरह छात्राओं से बलात्कार नहीं करता था। आज तो छात्रावासों की संचालिकाएं ऎसे दुष्कृत्यों में लिप्त पाई जाती हैं। जातीय संघर्ष, साम्प्रदायिक दंगे, कट्टरवाद इसी धर्महीन शिक्षा से संभव हो सके। धन के लालच ने अपनी ही संतानों को मादक द्रव्यों के हवाले कर दिया। शराब सभ्यता का विजिटिंग कार्ड हो गया। लूट, बलात्कार, चोरी, रिश्वत शिक्षित वर्ग की चतुराई के ही परिणाम हैं। जो अपने हित के लिए किसी का भी नुकसान कर सकते हैं। निरंकुश गति दुर्घटनाओं को जन्म देती है। आज की शिक्षा ने “आई-क्यू” बढ़ा कर यही किया है। अमर्यादित, निरंकुश, अपूर्ण मानव ही नए समाज की पहचान बन गए हैं। विश्व शान्ति और वसुधैव कुटुम्बकम् का सपना पूरा करना है तो हर व्यक्ति को तपना पड़ेगा। खुद के लिए भी, समाज तथा देश के लिए भी।

शिक्षा में भटकाव कहां दिखाई देता है- पूर्व के लोग भक्ति द्वारा, मीरा बनकर मोक्ष पाना चाहते हैं। पुरूष का अहंकार और आक्रामकता ठहर जानी चाहिए। तब उसका वाम भाग उसे शान्त कर पाएगा। स्त्री की तरह। आज की पश्चिम की शिक्षा स्त्री को पुरूष बनाने में लगी है। उसके दाहिने भाग को अधिक सक्रिय कर रही है। जो कुछ पुरूष को नहीं पढ़ाया जाता, वह स्त्री को भी नहीं पढ़ाया जाता। महिला विद्यालयों में भी नहीं। नारी उसमें डूबकर निकलती है। दौड़-स्पर्घा-आक्रामकता से तर-बतर होकर। इस चक्कर में उसके सारे गुण दब जाते हैं। उसकी गहनता, शांति, आत्मा खो जाती है। वह पुरूष्ा से अधिक अशांत या तनावग्रस्त हो जाती है।

माया सक्रिय भाग है, सदा नहीं टिका रहता। निष्क्रियता ब्रह्म रूप है। केन्द्र है। इसी को साक्षी भाव कहते हैं। बाहर सक्रिय, भीतर शांत। बाहर शब्द, भीतर शब्दातीत। शिक्षा ने पुरूष और स्त्री को सक्रियता दे दी। समान धर्मा हो गए। पुरूष और स्त्री भी पुरूष्ा जैसी। एक असंतुलन छाता जा रहा है, विश्व में। शांति असम्भव हो गई। दोनों अगिA रूप, आक्रामक। पहले स्त्री शांत थी, उसी पर पुरूष की सक्रियता-अहंकार टिके थे। अब दोनों का आधार खो गया। वायु चलता है, क्योंकि आकाश शांत और स्थिर है। समुद्र में तूफान-लहरें उठती हैं कि वह भीतर गहरा और शांत है। आधुनिक शिक्षा ने सारी गहनता-शांति और जीवन का मूल स्त्रैण ही छीन लिया। रह गया मानव कहलाने के लिए- बस शरीर?

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. Shat shat naman is syah andhere me app ke wachan bhor ki pahli kiran lagte hai

    टिप्पणी द्वारा suresh kumar tejwani — सितम्बर 17, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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