Gulabkothari's Blog

जून 30, 2013

सरकारी सट्टे

सरकार जो भी करे, वह कानून सम्मत, नागरिक जो वही कार्य करे, तो जेल में। सरकार के साथ पुलिस, हमारे साथ भाग्य। पुलिस कहने लगी कि चोर पकड़ो, तब रिपोर्ट लिखेंगे। क्या कहें इस पुलिस को धूर्त, बिकाऊ, नकारा, शत्रु या अंग्रेज? ये सारे शब्द पुलिस के लिए छोटे पड़ जाते हैं, जब छोटे-छोटे जुआरियों और सटोरियों को पकड़ती है तथा आईपीएल, घुड़दौड़ जैसे बड़े-बड़े सट्टों को कानूनी तौर पर सही ठहराकर उनके साथ ऎश करती है।

आज शेयर मार्केट क्या सट्टा नहीं बन गया है! सोना जिस तरह से विदेशों द्वारा पासों की तरह फेंका जा रहा है, सट्टा नहीं है? साल में इतनी बार इतना ऊपर-नीचे पहले तो नहीं होता था। आज कितने घर लुटते देखे जा सकते हैं। कानून की किताबें बन्द क्यों हो जाती हैं। कहीं कोई प्रसंज्ञान लेता दिखाई नहीं देता। तब देश में यह सरकार का दोहरा चरित्र नहीं कहा जाएगा। समरथ को नहीं दोष गोंसाई। पुलिस भी समर्थ की बनकर रह गई। उनके लिए तो झूठी एफआईआर, झूठे गवाह, बयान, मेडिकल रिपोर्ट, हत्यारे की व्यवस्था (झूठे) तक करवा देती है। गरीबों के साथ तो बलात्कार भी बढ़ता ही जा रहा है। पुलिस की इसी मानसिकता के चलते भ्रष्टाचार बढ़ा है। स्वयं पुलिस भी भ्रष्टाचार में बराबर की भागीदार बनती जा रही है।

वित्त मंत्री, सचिव आदि नीति निर्माताओं का अर्थशास्त्री होना, उस स्तर का अनुभव रखना अनिवार्य होना चाहिए। आज वित्त विभाग शुद्ध रूप से राजनीति करने का एक उपक्रम बनकर रह गया है। नीतियां मात्र राजनीति करने की दृष्टि से ही बनाई जाती हैं। केन्द्र एवं राज्यों का इतिहास भी गवाह है कि वित्त मंत्रियों के लिए अर्थशास्त्री होना अनिवार्य नहीं रहा।

उसका कार्य फीते काटते रहना मात्र होता रहा है। वित्त सचिव तथा मुख्यमंत्री मिलकर नीतियां बनाते हैं। उनके पास अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा संचालन की समझ कहां से आएगी? फिर मंत्री तथा सचिव बदल जाते हैं। योग्यता की बात होती ही नहीं है। कम समझदार को बड़े पद पर बिठा देना ही गलत नीतियों का तथा भ्रष्टाचार का कारण बनता है। दूसरे देशों की नीतियां चुराकर, डींगें मार-मारकर, अपने अहम् की तुष्टि करता है। यदि सुसंस्कृत परिवार से नहीं है, तो देशवासियों का अपमान करने में व्यस्त रहता दिखाई देता है। उसे क्या फर्क पड़ता है डॉलर से या सोने से। देश पर पड़ने वाले ऎसे प्रभावों से पूर्णत: अनभिज्ञ होता है।

वर्तमान प्रधानमंत्री तो अर्थशास्त्री भी हैं। उनके नाम पर मोण्टेक सिंह देश को समय-समय पर आश्वस्त करते रहते हैं। परिणाम सामने हैं। बड़े-बडे आर्थिक अपराध देश में हो रहे हैं। इनमें भी अधिकांशत: राजनेता ही जुड़े हैं। सभी दलों में ऎसे अपराधी हावी हो रहे हैं। दण्ड व्यवस्था नदारद है। भावी चिन्तन सो गया है। न जनता के लिए तंत्र काम कर रहा है और न तंत्र पर लोक की कोई पकड़ ही है। माफिया राज है। जिन्दगी बदनाम गलियारों से गुजरने का नाम है। तब इस देश में कुछ भी अच्छा हो भी, तो किसके भरोसे! माफिया हेराफेरी करके सट्टा चलाए, तीनों पायों का काला धन चकरी घुमाएं और जनता बस लुटती जाए। जब तक माफिया नीति निर्माण पर अपनी पकड़ नहीं छोडेगा, नेता और अभिनेता दोनों ही लाचार रहेंगे। जनता को भ्रमित करते ही रहेंगे।

आज पूरे देश में डॉलर की मजबूती और रूपए की गिरावट से बड़ी चिन्ता का वातावरण बना हुआ है। दूसरी ओर सोने के भावों से उथल-पुथल ज्यादा ही बड़ी हो गई है। भारत में सोने का अपना महत्व है। अन्तरराष्ट्रीय बाजार में भी सोना मुद्रा के रूप में देखा जाता है। अमरीका के आर्थिक धरातल पर दो सालों में ही ऎसा क्या हो गया कि डॉलर के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। अथवा भारतीय अर्थव्यवस्था में ऎसा क्या हो रहा है कि हमारी जमीनी पकड़ छूटती ही जा रही है? समझ में इतना ही आ रहा है कि हमारे नीति निर्माता देश की संस्कृति या जीवन-शैली को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बना रहे। वे विकसित पश्चिमी देशों की नकल में पड़े हैं। भारतीय अर्थ-शास्त्र को कुण्ठित करके विदेशी शास्त्र थोपते ही जा रहे हैं। हर बार ही परिणाम उल्टे पड़ते जाते हैं, किन्तु कुछ भौंपू ऎसे बैठे हैं जो अनर्गल, बकवास करने से बाज भी नहीं आते।

उनको शायद यह भी नहीं समझ आता कि देशवासी उनकी आवाज भी नहीं सुनना चाहता। फिर टीवी ने ऎसे मुखौटों को आकर्षण का केन्द्र बना दिया। रोज इनको कुछ बोलना है। नीतियों से इनका कोई वास्ता भी दूर-दूर तक नहीं होता। सरकार में इन पर अंकुश लगाने वाला भी कोई नहीं। ये हालात पर चर्चा करने ही नहीं देते देश को।

अपनी बकवास में उलझाकर विषय से भटकाने का कार्य करते हैं। इन लोगों पर तो मुकदमे चलने चाहिए। टीवी को भी देश हित में ऎसे नकारा लोगों को दूर रखना चाहिए। ये तो देश का बंटाधार करने वाले कैंसर कीट हैं! जब गैर जिम्मेदाराना लोग उच्च पदों पर बैठ जाते हैं, तब देश में विपदाएं आती हैं, जो कि टाली जा सकती हैं। ये हर अच्छे कार्य का श्रेय लूटना जानते हैं। कुछ गलत हो जाए तो सामने विपक्ष है ही। पिछले सालों में ऎसे ही लोगों ने हमें महंगाई के मुद्दे पर दर्जनों बार आश्वासन दिए होंगे। आज उनकी बोलती बन्द हो रही है।

जिस अन्धाधुन्ध तरीके से हमने वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद, औद्योगिकीकरण, विदेशी निवेश आदि के बारे में नीतियां बनाई, जितने घोटाले इस देश ने देखे, और जितना काला धन विदेशों में जाकर निष्क्रिय पड़ गया, सब झूठी अकड़ दिखाते फिरते हैं। कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। अपना धन बाहर तथा विदेशी धन भीतर? क्या यह देश को बेचने से कम है! मेरे नेताओं, अफसरों को काले धन से मादक द्रव्य, हथियार, शराब के धन्धे को पनपाते देखा जा सकता है। देश को विकसित होते देखना इनका सपना नहीं है।

पूरी पीढ़ी को नशे में बांधकर पंगु बना रहे हैं। गांव-गांव में पुडिया कैसे पहुंची? जो बच गए उनको मनरेगा, पेंशन तथा विभिन्न योजनाओं के जरिए निकम्मा बनाना ही इनका उद्देश्य है। आठवीं तक बिना परीक्षा दिए पास होंगे। ज्यादा पढ़ गए तो बेरोजगार होंगे। नौकरियों में आरक्षित वर्ग की धडे बन्दी होगी, जो चुनाव सम्पन्न कराने का कार्य भी देखेगी। चुनाव आयोग आंखों पर पट्टी बांधकर चुनाव खर्च का ब्यौरा पास करता रहेगा।

ये नेता ही देश की अर्थ नीतियां बनाएंगे, और उन्हें लागू भी करेंगे। तब क्या तो डॉलर, क्या सोना, क्या शेयर मार्केट, सब सट्टा बनकर ही रहेगा। सरकारी सट्टा। सरकारी ठेके तो पहले ही सट्टे का रूप ले चुके हैं। अब तो देश में जीना संभव है या मरना पड़ जाएगा, हमारे लिए तो यह भी सट्टा बन जाएगा। सट्टों पर केवल सरकार का नियंत्रण होगा। तब आम आदमी को तो हारना ही है। समय के साथ सट्टे के नए-नए रूप भी सामने आते रहेंगे।

इन नकारा प्रशासकों से युवा पीढ़ी ही छुटकारा दिला सकती है। उसे संकल्प करना पड़ेगा, जाति-पांति, धर्म से ऊपर उठना पड़ेगा। नए भारत का सपना, विजन-2025 देखना होगा, उसे मूर्त रूप देने को जुट जाना होगा। बाकी सबका हिसाब हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

5 टिप्पणियाँ »

  1. Bharatiya Jantantra ki Biggest Problem ye he ki Satta dhari Party Purntaya CORRUPTION me Dubi hui he and VIPAKSH bhi Lagbhag same Track par he Jabki ek Jimmedar Vipaksh ko Govt ke Policies ke Khilaf Apni Nitiyon ka Presentation karna chahiye …Jaisa ki U K me CHAYA MANTRIMANDAL ke roop me hota he Aisa hi BHARAT ki Vipakshi Parties ko karna chahiye Lekin vipakshi Aapsi khichtan me lage he and P M ki davedari Jatane ke sivaye kuch nahi karte Jaise ki P M ki chair khali hi padi he …..Bharat me JIMMEDARI Naam ki koi cheese nahi rah gayi he Even Supreme court ko kai bar Govt ke decisions ke khilaf FATKAR lagani padti he lekin leaders ko kuch fark nahi padta …Aakanth BHRASHTACHAR me Sanlipt he , Chunav nazdeek aate hi VOTER ke samne BHEEKH ka PITARA khol dena …Jativad ka zahar faila kar DIVIDE & RULE ki Policy he ….JANTA ko hi now 2014 ke Election ka INTEZAR he jisme if Voter ne SWARTH chod kar HONEST , YUVA , Jativad virodhi , Vikasvadi LEADERS ka chunav kiya tabhi BHARAT ka SAMMAN , SWABHIMAN , Vaibhav barkarar rah payega …..RAJASTHAN Patrika ka YOGDAN Anukarniya , Vandniye he …….Subheccha ke sath

    टिप्पणी द्वारा om prakash birla — जुलाई 6, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • वोटर, जनता को जागरूक रहना होगा, RTI का प्रयोग करते रहना होगा.

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — जनवरी 29, 2014 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. every indian is feeling the same . you have given the words to the feeling of mass. It seems all the problems are starting from our heart. Because of our tolerance idiots and fools are governing a country like india. Ek chor jise humne chokidaar banaya wo chori karke bhag raha hai aur sare haath peir salamat hote huye bhi hum doosre chor ka muh taak rahe hai ki wo hum BECHARON ki madad kare , us chor ko pakade… . . .keisi saamuhik murkhata hum kat rahe hai…..gulab ji bhai saab dhanyawaad aapka . . … aap abhi media wale hai lekin aapne is (dhandhe) ko IS DHANDHE KI IMANDAARI se kiya iske liye dobara dhanyawaad. . .. . .loktantra ka koi ek stambh hai ye. . . Shayad Choutha ya paanchva
    .. .. .lekin ye bhi veise hi maal katne me laga hai jeise iske aur sahodar karyapaalika vidhayika. .aur n……. television media sarkaaron ke mohalle ka aawara belagam kutta banke beitha hai ki kahi kuch kisi ne maal kata ya kahi kuch paka to isko bhi kuch tukade feko nahi to bhonkega aur pure mohalle ko sir pe utha lega. . . .
    Lekin hum jo janata hai . . Ho kya gaya hai hume samajh me nahi aata. . . koi bhi jhuth paakhand

    टिप्पणी द्वारा nitesh sharma — जुलाई 5, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. रविवारीय जाकेट पर प्रतिक्रया

    रुपये के अवमूल्यन को रोकने के कारणों और उपायों की समीक्षा नितांत आवश्यक है ..शेयर बाजारों और अन्य धातु के बाजारों में प्रदर्शन ,GDP , विदेशी निवेशको का बढ़ता प्रभुत्व, महंगाई की बढ़ोतरी , उसके फलस्वरूप उच्च मुद्रा स्फीति की दरे , चालू खाता घाटा की निरंतर बढना क्यूंकि आयत निर्यात से अधिक है , भ्रष्टाचार और राजनितिक आपाधापी , राजनितिक अस्थिरता , रिज़र्व बैंक की सक्रियता तथा आर्थिक सुधारो की समय समय पर समीक्षा ही रुपये की आन बाण शान में अभिव्रधि करा सकती है ..पत्रिका की पहल अवश्य ही राजनितिक नेताओ , व्यापारियो तथा आर्थिक विशेषज्ञों को मजबूर करेगी की देश हित में रुपये की मजबूती के लिए सतत प्रयासों से अभियान को गति दे तथा पूर्व में भारत को जो सोने की चिड़िया कहा जता था उसे वही ताज फिर से मुनासिब हो .. समुचित और संगठित तौर तरीको से बदलाव की बयार को सही दिशा दी जा सकती है .. आपका अभिनव प्रयास नव चेतना का संचार करे और सुखद अनुभूति प्राप्त हो ..

    ​सधन्यवाद

    Thanks a lot..

    Regards..

    Sajjan Raj Mehta..

    टिप्पणी द्वारा sajjan raj mehta — जुलाई 1, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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