Gulabkothari's Blog

जुलाई 5, 2013

कितनी भूख?

क्या-क्या नहीं बेच डाला लोकप्रिय सरकारों ने! जनता के धन को बजट बनाकर खा गए, जनता की संपत्तियां बेचकर बांट खाई, जमीन-पहाड़ बेच दिए-नामी-बेनामी।

आज देश में लोकतंत्र के जैसे हालात चल रहे हैं उनको देखकर कभी-कभी तो मन मे शंका हो उठती है कि हमारे जनप्रतिनिधि वे लोग ही हैं, जिनको हमने अपना वोट दिया था! क्या जीत जाने की मुहर में विदेशी स्याही होती है, क्योंकि उसी क्षण प्रतिनिधि पराए व्यक्ति जैसा व्यवहार करने लगता है। उसका यह व्यवहार पूरे साढ़े चार साल चलता है। आखिरी छह महीनों में वह आपकी गालियां तक खाने को तैयार हो जाता है। चार-साढ़े चार साल में वह इतना सब कर डालता है, जो उसे नहीं करना चाहिए। जिस धरती का पुत्र बनकर वोट मांगता है, भू-स्वामी के रूप में वही धरती को पांवों से रौंदता है। उसके टुकड़े करता है, बोलियां लगाता है, बेच देता है। क्या ऎसे पुत्र के बजाय माता का बांझ रहना ठीक नहीं? इन्हीं के हाथ आज देश बिक रहा है। हम पांच साल तक इतने गूंगे हो जाते हैं, मानो हमारा भी इस धरती से कोई नाता ही नहीं। कोई बेचे, कोई खरीदे, हमें क्या! सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जिनको इसकी रक्षा और विकास का भार सौंपा, वे अभिभावक के स्थान पर मालिक बन बैठे। निर्ममता से देश को बेचा जा रहा है। अगली पीढियों को क्या सौंपेंगे, जिस पर भारतीय लिखा होगा?

क्या संविधान किसी भी सरकार को इतनी छूट देता है कि जो कुछ जनता की संपत्ति है, वह जनता की स्वीकृति के बिना बेच सके? बात चली जयपुर हवाई अड्डे के निजीकरण की। किस सरकार का है यह हवाई अड्डा? बेचने पर राशि कौन खाएगा? पालम हवाई अड्डा कैसे बिक गया? क्या जनता की बड़ी-बड़ी संपत्तियों को किसी भी सरकार में बैठे कुछ लोग बेचकर खा सकते हैं? आप अकेले राजस्थान पर दृष्टि डालकर तो देखिए, क्या-क्या नहीं बेच डाला लोकप्रिय सरकारों ने! जनता के धन को बजट बनाकर खा गए, जनता की संपत्तियां बेचकर बांट खाई, जमीन-पहाड़ बेच दिए-नामी-बेनामी। वाड्रा को, लक्ष्मी मित्तल को, दूसरे कारोबारियों को, भू-माफिया को, क्या-क्या नहीं बेचा। हिन्दुस्तान जिंक जैसे सार्वजनिक उपक्रम तक बेच डाले। झीलें, तालाब और बांध तक नहीं छोड़े। मध्यप्रदेश में दिलीप सूर्यवंशी, सुधीर शर्मा के अवैध खनन का किसको अनुमान नहीं! वहां तो परिवहन विभाग ही बेच दिया गया। छत्तीसगढ़ में तो अंग-अंग खा गए। आदिवासियों से छीन-छीन कर खा गए। वाह, कमाल है, मेरे लोकतंत्र का। क्या ऎसे बेशर्म, संवेदनाहीन नेता और अफसर इक्कीसवीं सदी के युवा वर्ग का नेतृत्व करने लायक भी सिद्ध होंगे। क्योकि इतना सब खाकर भी पेट नहीं भरा तो खरबों रूपए उधार लेकर भी खा गए। मूल और ब्याज आने वाले चुकाते रहेंगे।

आज विकास के नाम पर उद्योगों का विकास किया जाता है। किसानों की बहुमूल्य भूमि का अधिग्रहण किया जाता है। सरकार की मदद से कारखाने लगते हैं। चार-पांच साल में उजड़ने लग जाते हैं। अधिकारियों और उद्यमियों की मिलीभगत से औद्योगिक क्षेत्र भी बंद हो जाते हैं। उद्योग भी नहीं पनपते, खेती की जमीन भी उजड़ गई। आज तो चारों ओर जमीनों की खरीद-बेच, टाउनशिप और बिल्डर्स का तांता लग गया है। जमीनें कौनसी हैं? शहरों के फैलाव का सरकारें मनमर्जी से निर्णय कर लेती हैं। गांव भी उजड़ते हैं, खेती भी उठ जाती है। हाउसिंग बोर्ड इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। क्या लेता है और क्या देता है, समझने लायक है।

सड़कों के मनमाने विस्तार ने भी जमीनें चाट डालीं। सड़कों की अनिवार्यता ठेके में मिलने वाली दलाली से और वोट की राजनीति से तय होती है। देश में कितने अनावश्यक कार्य सरकारें करवाती हैं दलाली के चक्कर में। अरबों-खरबों के। इसके स्थान पर न खाने को रोटी देना चाहती हंै, न पीने को साफ पानी। जनता के लिए गटर का सतरंगी पानी नलों में उपलब्ध रहता है।

इस बार चुनावी चक्कर कुछ ज्यादा ही उलझा नजर आता है। दोनों बड़े दल घोटालों से अटे पड़े हैं। केन्द्र सरकार ने एक रूपए किलो गेहूं, दो रूपए किलो चावल बांटने की घोषणा की है। कहां से आएगा? महंगी आरक्षित दरों पर खरीद कर जनता को सस्ता बेचेगे। घाटा कौन वहन करेगा? इस बात को समझने के लिए किसी को भी प्रधानमंत्री जी की तरह अर्थशास्त्री बनने की जरूरत नहीं है। घर का अनाज भण्डारण के अभाव में सड़ाया जाएगा। कमी की पूर्ति के लिए तत्काल ऊंची दरों पर आयात किया जाएगा। डॉलर के भाव कौन नहीं जानता।

बहुत कुछ पहले रूस को जा चुका। अमरीका पहुंच गया। अब जो कुछ बचा है उसे खरीद कर यहां जम जाने के लिए विदेशी निवेश आमंत्रित होता दिखाई पड़ रहा है। दो दिन पहले ही टेलीकॉम में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की छूट घोषित हुई है। अनेकों श्रेणी के उद्योगों में निवेश की छूट अलग-अलग है। क्या इसका अर्थ स्थानीय उद्योगों का अंश विदेशियों को पहुंचाना नहीं है। वे तो डॉलर में कुछ भी खरीद लेंगे। हमारे हाथ से तो उम्र भर के लिए निकल जाएगा। शनै: शनै: वे लोग हमारी नीतियों एवं नेताओं को भी प्रभावित करने लगेंगे।

मूल में प्रश्न यही है कि जो मेरा नहीं है, उसे बेचने का दु:साहस कैसे कर सकता हूं। सस्ती लोकप्रियता के अलावा क्या मिलने वाला है। फिर भी हम दोनों हाथों से देश को बेचने में अथवा बिना विचारे उजाड़ने में लगे हैं। किसी सरकार को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता। वह तो संरक्षक की भूमिका में होती है। न्यायपालिका को भी स्वत: प्रसंज्ञान लेने की आवश्यकता है। रोकेगा कौन? जनता ऎसे निर्णयों को कैसे उलट सकती है। पांच साल बाद वह सरकार को तो उलट सकती है। वैसे भी सरकारों ने तरह-तरह के कानूनों के आधार पर देश को धर्म, जाति, सम्प्रदायों और दलों में इतना बांट दिया कि जरूरत पड़ने पर सब एकजुट भी नहीं हो पाएंगे और जब कुछ बचेगा भी नहीं तब काट-मार का वीभत्स नजारा, हो सकता है महाभारत को भी पीछे छोड़ दे। एकमात्र आशा की किरण ये हो सकती है कि हमारा युवा इनमें से किसी धड़े में शामिल न हो। तब उसको देश की वास्तविक स्थिति नजर आएगी। देश का यह खंडन ही एकमात्र ऎसा कारण है, जिससे किसी भी सरकार के गलत निर्णयों के विरोध में कोई सामूहिक कदम उठाना सम्भव नहीं हो पाया। पहले इस एकता और अखण्डता को पुनर्जीवित करना है। राजनीति तो और बांटेगी, हमें ही जागरूक रहना है। युवा पीढ़ी को इस बंटवारे की चाल को समझ कर मैदान में उतर जाना चाहिए। खोटे निर्णयों के विरूद्ध कोर्ट में भी जाना चाहिए। ऎसे निर्णय करने वालों के विरूद्ध भी मुकदमे चलें। वरना, युवा पीढ़ी के लिए तो केवल कर्जा बचेगा और सूदखोर अस्मत मांगेंगे।

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