Gulabkothari's Blog

जुलाई 14, 2013

राजनीति में भी कैंसर

कहते हैं कि कलियुग में देवता तैंतीस करोड़ तथा असुर निन्यानबे करोड़ होते हैं। चार में से तीन व्यक्ति आसुरी गुणों से ओत-प्रोत होते हैं। बेचारे लोगों का क्या दोष? एक विशेष बात यह भी है कि सुर-असुर, दोनों एक ही शरीर में रहते हैं। कब कौन सामने आ जाए! शायद यह तथ्य उच्चतम न्यायालय की समझ में आ गया। फैसला दे दिया कि जो जेल में बैठे हैं, वे चुनाव नहीं लड़ सकते। लोकतंत्र के असुर प्रमाणित हो चुके।

क्या इस फैसले से पुलिस के भाव नहीं बढ़ जाएंगे? गिरफ्तारी से वही तो बचाती है जनप्रतिनिधियों को भी और प्रभावशाली लोगों और अफसरों को भी। इससे ज्यादा गिरावट शायद ही किसी विभाग में हो। उच्चतम न्यायालय को आदेश में ये जोड़ देना चाहिए कि यदि ऎसे असुर खुले में घूम रहे हों, विधानसभा अथवा संसद में बैठते हों, तब शीर्ष पुलिस अधिकारियों, सदन के अध्यक्षों को भी सजा दी जाएगी। यही तो निजी स्वार्थो के चलते कानून की धज्जियां उड़ाते हैं। पिछले कुछ वर्षो में कई न्यायाधीश भी पुलिस को सहयोग करते देखे गए हैं। ऎसे फैसलों की भी समीक्षा होनी चाहिए और आवश्यक हो, तो मुख्य न्यायाधीश इनको बदल भी सके।

उच्चतम न्यायालय का दूसरा फैसला, जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ (4) को रद्द करने का, बहुत साहसिक तथा आसुरी शक्तियों से संघर्ष का ब्रह्मास्त्र साबित होगा। अब तक दागी नेताओं/जनप्रतिनिधियों को उनके विरूद्ध मुकदमों के चलते हुए भी पद पर बने रहने की छूट देता रहा है। अब वे यह कहकर पद पर नहीं रह सकते कि वे ऊपर की अदालतों में फैसले को चुनौती दे सकते हैं। यह छूट वापस ले ली गई है। अब नेताओं के भाग्य का फैसला पुलिस या मुख्यमंत्रियों के हाथ में आ जाएगा।

सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों को पुलिस जेल होने ही नहीं देगी। सीबीआई की जांच में सैकड़ों नेता बरी होते रहते हैं, हर साल। जांच शुरू करते समय सीबीआई अनेक नामों की चर्चा स्वयं उछालती है, आयकर छापों की तरह। अन्तिम रिपोर्ट कुछ और ही कहती है। राजस्थान का भंवरी प्रकरण हो या म.प्र. का शहला मसूद काण्ड या फिर कर्नाटक का बेल्लारी खनन काण्ड। मुख्यमंत्री चाहे किसी भी प्रदेश के हों, राजनीतिक अपराधियों की शरण स्थली बन गए। अपराध करवाने तक लग गए। बड़े-बड़े धुरन्धर अपराधी इनके निजी सम्पर्को में रहते हैं।

किसी मुख्यमंत्री ने किसी नेता, विधायक अथवा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को जेल भिजवाया हो, इतिहास साक्षी है। वर्तमान सरकारें भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ने में व्यस्त हैं। राजस्थान में रामलाल जाट, बाबूलाल नागर जैसे, मध्यप्रदेश में कैलाश विजयवर्गीय, अनूप मिश्रा, अजय विश्नोई जैसे सैकड़ों दागदार नेता-विधायक उच्चतम न्यायालय के फैसले की परिधि में कैसे आ सकते हैं? अपने बचाव में इन नेताओं के अपने तर्क हो सकते हैं और सरकारें तो इनको अपराधी ही नहीं मानतीं।

तब कौन पुलिस अधिकारी इनको छूने का साहस करेगा? छत्तीसगढ़ तो भरा पड़ा है ऎसे जनप्रतिनिधियों से। स्वयं मुख्यमंत्री का नाम कोल ब्लॉक आवंटन में आ चुका है। इनके रिश्तेदार अवैध खनन में आकण्ठ डूबे हैं। न्यायालय तो कागजों से चलते हैं। अंग्रेजी में की जाने वाली बहस का रूतबा फैसले में काम आता है। प्रार्थी को भले ही कुछ भी समझ में नहीं आए। इसीलिए सारे फैसले भी आज अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं।

एक त्रासदी और भी है। हमारे देश का जनप्रतिनिधि स्वयं को अब जनता का सेवक नहीं, राजा मानता है। अधिकांश नेता पांच साल तक जनता को सिर्फ अंगूठा दिखाते रहते हैं। लोकतंत्र को मुंह चिढ़ाते रहते हैं। काले धन के कारण ऎसे नेता ही माफिया से जुड़ जाते हैं। लोगों का पाला नेताओं की जगह माफिया से पड़ने लगा है। नेता के पास गाली थी, माफिया के पास गोली है।

धीरे-धीरे ऎसे अपराधी नेताओं की संख्या हर सदन में बढ़ने लगी है। जब भी किसी कोर्ट का फैसला इनको चुभने लगता है, तो फैसलों के विरूद्ध ही नया कानून पास करके, फैसलों को निष्प्रभावी करने का प्रयास करते हैं। इसके बस दो बड़े उदाहरण देखिए – वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि चुनाव लड़ने वाला हर प्रत्याशी अपनी संपत्ति, शिक्षा और पृष्ठभूमि (आपराधिक) की सूचना उजागर करेगा, चुनाव आयोग ने इसकी व्यवस्था भी कर दी, लेकिन सरकार ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरर्थक कर दिया।

दूसरा मामला बिल्कुल नया है – केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्र की अध्यक्षता में बनी पूर्ण खंडपीठ ने आदेश दिया कि सरकार से प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ लेने वाले राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के अधीन लाया जाए। लेकिन राजनीतिक पार्टियां इसके लिए तैयार नहीं हैं। केन्द्र सरकार सूचना का अधिकार की धारा 2 को अध्यादेश के माध्यम से संशोधित करना चाहती है, ताकि जन प्राधिकरण की परिभाषा बदल दी जाए, इसमें राजनीतिक पार्टियां न आएं।

जिस शासन में अपराधियों की प्रतिष्ठा होती है, वही आसुरी शासन कहलाता है। वैसे तो ईश्वर की सजा से तो कोई बच नहीं पाया। न्यायाधीशों से भी धीरे-धीरे विश्वास उठने लगा। हाल ही में गुजरात के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भट्टाचार्य का जो पत्र मीडिया में पढ़ा, उसके बाद जानने को क्या रह गया? सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर ही उंगली उठ गई? अब तक तो सेवानिवृत्ति के बाद उठती रही है।

आज देश के आम नागरिक के मन में प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या देश को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले देश के मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर तथा उनकी बहन पर नैतिकता के वही मापदण्ड लागू नहीं होते ? या आम नागरिकों के लिए अलग मापदण्ड होते हैं। अथवा बड़े-बड़े न्यायाधीश दूसरे ग्रहों से आते हैं। दीया तले अंधेरा तो सब जानते हैं, किन्तु यहां तो सूरज तले अंधेरा नजर आता है। पहले भी कितने मुख्य न्यायाधीश आरोपों के घेरे में हैं।

अब युवाओं को चाहिए कि आरटीआई में जानकारियां लेकर भ्रष्ट नेताओं/अधिकारियों के विरूद्ध मुकदमों की झड़ी लगा दें। सेवा से निवृत्ति के बाद भी इनको छोड़ना तो नहीं है।

गुलाब कोठारी

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