Gulabkothari's Blog

जुलाई 15, 2013

सार्थक बनें चातुर्मास

यह इस देश की एक महान परम्परा है कि वर्षा ऋतु में देव सो जाते हैं। सभी धार्मिक या शुभ कार्य ठहर जाते हैं। पूरा देश सामाजिक चिन्तन व समस्याओं के निवारण में व्यस्त हो जाता है। बरसात के कारण पैदल चलने वाले साधु-संतों का आवागमन ठहर जाता है। वे भी इस काल में समाज को उपलब्ध रहते हैं। उनकी निश्रा में विभिन्न सम्प्रदाय एवं समूह अपने-अपने विषयों पर चर्चा करते हैं। भारतीय दर्शन के संन्यास आश्रम की भूमिका भी यही है। तभी संतों का निर्वाह समाज करता है। चातुर्मास संतों के लिए इस उधार को चुकाने का अवसर भी है। चार मास का काल छोटा नहीं होता। समाज के हर वर्ग के लोग अपने-अपने संतों के पास जाते हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर भी विचार-विमर्श होना एक उद्देश्य होना चाहिए।

एक अन्य परम्परा पीछे छूट गई। प्रत्येक संत अपने ही समुदाय का होकर रह गया। या तो अंधों में काणा राजा हो गया या फिर अभिमान से फूल गया। समाज के लिए नासूर बन गया। अन्य समाजों की क्या प्रतिक्रिया हो रही है, उससे अनभिज्ञ होने लगा है। अन्य सम्प्रदाय जीवन के बारे में क्या दृष्टि रखते हैं, हमारे सम्प्रदाय की दृष्टि क्यों भिन्न है, भिन्न-भिन्न दर्शन, जीवन का लक्ष्य आदि चर्चा से उठ गए। तब अनुयायी अपने गुरू को, उनके उद्देश्यों को कैसे समझ पाएंगे? गुरूओं का अभिमान ही है कि प्रवचन के बाद प्रश्नोत्तर को स्थान ही नहीं है। भले किसी ने कुछ भी समझ लिया हो। अल्प ज्ञान वाले तो बस परम्परावश ही आते हैं। प्रवचन में बातें करके चले जाते हैं।

यह देश का दुर्भाग्य ही है कि जीवन के अन्तिम आश्रम (संन्यास) की यह दुर्दशा हो रही है। यह तो स्वर्णिम काल है। मोक्ष द्वार खोलने का, तेजस्वी होने का काल है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए। और जो संन्यासी हैं, उन्हें मार्गदर्शक होना पड़ता है, प्रत्येक अनुयायी का। उनके लिए तो संतों के पास समय ही नहीं होता। वहां भी छोटे-बड़े हो गए, अपने ही लोग। वी.आई.पी. बन गए राजनेता और काले धन वाले। आज तो मीडिया के लोग सबसे बड़े “विशिष्ट जन” हो गए। क्योंकि प्रत्येक संत संन्यास के नियम विरूद्ध अपनी प्रशंसा या लोकेषणा में डूबता जा रहा है। हर बड़े संत के चातुर्मास पर समाज का करोड़ों रूपया खर्च होने लगा है। संतों को न तो खर्च कम कराने की ही चिन्ता होती है, न ही चातुर्मास में सामाजिक परिवर्तन का कोई संकल्प होता है। चातुर्मास के बाद कैसे एक पराए, निर्मोही की तरह हंसते हुए विदा हो जाते हैं। उनको अपनी भूमिका का आकलन करने की आवश्यकता ही नहीं लगती। उन्होंने समाज को क्या दिया!

धर्म सामाजिक, धार्मिक शिक्षा का एक बड़ा माध्यम रहा है। शिक्षा और वातावरण के बदलाव से जो कमी जीवन में आती जा रही है, उसको धर्म के सहारे ही पूरा किया जाता है। मन और आत्मा की शिक्षा धर्म से ही संभव है। तभी जीवन का अधूरापन मिट पाता है। आज संतों की तो भीड़ बढ़ रही है, किंतु उनके स्वयं के मन गृहस्थों से अधिक चंचल हो गए हैं। भोग को भिन्न स्वरूपों में ग्रहण कर लिया है। जो स्वभाव बन गया, उसे ही त्याग मान बैठे हैं। हर सम्प्रदाय ने स्वयं को धर्म मान लिया। धर्म किन्हीं भी दो व्यक्तियों का एक नहीं होता।

धर्म के नाम पर भी शास्त्रों के कथन ही अधिक काम आते हैं। उनकी भाषा और मन्तव्य नई पीढ़ी के कितने समझ आएंगे, इस बात की किसी को चिन्ता नहीं होती। क्यों नई पीढ़ी विमुख हो रही है, इस पर चर्चा ही नहीं होती। तब चातुर्मास की उपयोगिता पर ही प्रश्न खड़े हो जाएंगे। नई पीढ़ी का चातुर्मास व्यवस्थित हो, पूर्व नियोजित विषयों की चर्चा के साथ आगे बढ़े। शास्त्रों का निरूपण आज के संदर्भ में किया जाए। समाज की भाषा में किया जाए। चातुर्मास के अंत तक परिणामों को भी लक्षित किया जाना अनिवार्य हो। संतों को भी उनकी मर्जी पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। संन्यास की मर्यादा से बाहर जाते ही उनका दंभ समाज को अपयश दिलाने वाला साबित होता है।

नई पीढ़ी को धर्म की वैज्ञानिकता, प्राकृतिक सामंजस्य, सामाजिक सौहाद्र की पृष्ठभूमि को ठोक बजाकर परखना चाहिए। धर्म मुक्ति का मार्ग है। कट्टरता मुझे जकड़ नहीं सकती। मेरे भीतर भी ईश्वर का अंश है। धर्म के नाम पर राजनीति या छलावा करने वालों का हमें बहिष्कार कर देना है। समाज का पुनर्निमाण और पुनरूथान का संकल्प ही मेरे सपनों का “विजन 2025” बन जाएगा।

गुलाब कोठारी

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4 टिप्पणियाँ »

  1. Though its true that nowadays carores are spent on City Chaturmas,but its also true that people do not gether if free transport,free food ,free stay,free transport is not provided .If people would not gether then whom Sadhuji would give leacture?and if one does not hear who would follow good preachings?It is said that if you hear anything 10 times then it any one time may fit in your mind.But main thing is that (1)samaj should arrange different time for good debates(many good debater are in samaj and outside) in evening (8to10pm)2.Children classes for learning dharmik activities(samai etc) and distribute price to them for motivation (3)…Collect suggestions for removing kurutias of smaj and their alternatives(like dahej,limit prepration in shaadi bhojs, etc).(4) prepare a time table after Vyakyan for 4 months from 1to 10pm at any hall having speakers,fan,sitting arrangemnts (If they want to attract youngester who are cutting themselfs from these programme due to facilities nowdays are essential and not provided.There may be other suggestions to be implimated during these 4 months.

    टिप्पणी द्वारा Mahavir Mehta,28 chora rasta,Jaipur — जुलाई 16, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. NICE COMMENTS…AN EYE OPENER AND WHOLE DAY IT WAS A TOPIC IN SOCIAL CIRCLE TO GIVE THOUGHT ON IT

    टिप्पणी द्वारा sajjanraj Mehta — जुलाई 15, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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