Gulabkothari's Blog

जुलाई 21, 2013

हम भी पशु हैं!

जगत में जीव की चौरासी लाख योनियां कही गई हैं। एक इन्द्रीय-52 लाख, दो इन्द्रीय छह लाख, नरक, त्रियंच, देव-चार-चार लाख, मनुष्य 14 लाख। एक ही जीव किसी जन्म में मनुष्य बनता है, तो किसी जन्म में पशु-पक्षी बन जाता है। अपने कर्मो के फल भोगने को। पशु-पक्षी चूंकि भोग योनियां हैं, अत: वहां नए कर्म नहीं किए जा सकते। नए कर्म केवल मानव कर सकता है। इसी कारण उसे सभी प्राणियों में श्रेष्ठ कहा गया है।

दूसरी बात यह भी है कि जीव इनमें से किसी भी योनि में पैदा हो, उसके साथ उसका संचित ज्ञान तथा उसके संचित कर्म भी रहते हैं। वह जगत के व्यवहार को अनुभव कर सकता है। जैसे पालतू पशु-पक्षी और पौधे देखे जा सकते हैं। शकुन्तला की विदाई के समय वृक्षों-लताओं में वार्तालाप का प्रसंग बड़ा मार्मिक है।

सीता की खोज में भी राम की सहायता वृक्षों-लताओं ने की थी। आकृति के भेद के कारण मनुष्य तथा अन्य प्राणियों में प्रकृति-अहंकृति भी भिन्न होती है। कभी ये सभी प्राणी मनुष्य रहे होंगे। आज सभी कर्मानुसार मनुष्य के मित्र अथवा शत्रु दिखाई पड़ते हैं। मित्र अधिक, शत्रु कम। जो मित्र हैं, वे जीवन में हमारे सहायक बनते हैं। जो शत्रु हैं, उनमें कमजोर को मनुष्य मारकर खा जाता है।

शक्तिशाली, मनुष्य को मारकर खा जाता है। अन्न को ब्रह्म कहा है। हर दाने में एक जीव होता है। उसी जीव से हमारी देह में बीज का निर्माण होता है। इसीलिए कहा भी है-“”जीवो जीवस्य भोजनम्””। साथ में यह भी कहा है कि हम सब एक-दूसरे के अन्न हैं। हम ही पशु बनते हैं, हम ही मनुष्य भी बनते हैं। मानव को भी पशु ही कहते हैं। पंच पाश में बंधे होने के कारण प्रत्येक पार्थिव प्राणी की पशु संज्ञा है।

हमारा एक दूसरे के बिना जीवन नहीं चलता। क्योंकि हम सब माया भाव से भीतर जुड़े हुए हैं, “एक हैं”। पशु-पक्षी भी कभी हमारे ही परिजन रहे होंगे। दो हजार साल पहले न ईसाई थे और न मुसलमान, तब जो उस समय थे, उन्हीं में से तो बने हैं। भले ही आज एक दूसरे के सामने तनकर खड़े हुए हों। यह तो हुआ दर्शन पक्ष!

दूसरा, आर्थिक पक्ष तो बहुत ही मजबूत है। राजस्थानवासी इस मामले में विशेष रूप से सौभाग्यशाली हैं कि प्रकृति ने इतना बड़ा भू-भाग रेगिस्तान के रूप में दिया। यह देश भर का एकमात्र पशु प्रजनन क्षेत्र है। इस क्षेत्र के पशु (मालाणी) गुणवत्ता में अरबी नस्ल की टक्कर के हैं। चाहे ऊंट हो या घोड़े। जिस वातावरण में ऎसी नस्ल तैयार होती है, वह केवल इस रेगिस्तान में ही है। इतने बड़े देश में कहीं भी इतना बड़ा क्षेत्र पशु प्रजनन से नहीं जुड़ा।

यही कारण है कि राजस्थान के पशु सम्पूर्ण देश में बिकते हैं। पशु मेलों की अन्तरदेशीय श्रृंखला तिलवाड़ा से शुरू होकर नागौर-परबतसर-पुष्कर होती हुई दक्षिण भारत और असम तक जाती है। पुलिस और सेना के लिए ऊंट-घोड़े यहीं से जाते हैं। राजस्थान में कृषि के बाद सर्वाधिक आय पशु धन तथा इनसे जुड़े उद्योगों, डेयरी आदि से होती है। हमारे अधिकारी स्वार्थी भी हैं और क्षुद्र दृष्टि वाले भी। उन्होंने पशु सम्पदा को जान-बूझकर नष्ट करने का सिलसिला चालू किया। नहरों की खेती ने गांव उजाड़ दिए। सेवण घास उजाड़ दी, सेम की समस्या ले आए ताकि दुबारा गांव बस ही नहीं सकें। फसलों के साथ कैंसर बिछा दिया। इनके काकासा का क्या गया?

वन विभाग के जड़ बुद्धि अधिकारियों ने पूरे क्षेत्र में जूली फ्लोरा बो दिया। जैसे अफसर आम आदमी के काम नहीं आता, जूली फ्लोरा भी केवल जमीन से पानी सोखता है। न इसके फल काम आए, न ही छाया। बलीता (जलाऊ लकड़ी) है बस। राज्य भर का कितना पानी पीकर?

पशु धन राज्य के विकास की सूची में है ही नहीं। छोटे-छोटे देश पशु धन के सहारे दुनिया भर में छाए हुए हैं। स्वीडन, डेनमार्क, हॉलैंड, स्विट्जरलैण्ड आदि दुग्ध-उत्पादों के लिए सिरमौर बने हैं। और हम आज भी ईश्वर की सम्पूर्ण कृपा के बाद भिखारी जैसे हैं। डेयरी का मिल्क पाउडर, कीड़े मिला हुआ दूध बच्चों को पिला रहे हैं। कैसी बेशर्मी ओढ़ रखी है।

अभी भी देर नहीं हुई है। विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। पशुओं को विकास की अग्रिम पंक्ति में लाना आज की जरूरत है। आर्थिक विकास के जहां सारे प्रयास फेल हो रहे हैं, वहां यह क्षेत्र कृषि से आगे निकल सकता है। पशुपालन की निश्चित योजना बने। चारागाहों की भूमि सुरक्षित की जाए। आज तो नेताओं तथा अफसरों की मदद से इन पर अतिक्रमण करवाया जाता है। घरों में पशुओं को रखने की व्यवस्था हो। गर्मी में पशुओं को शीतल क्षेत्रों में लेकर जाना होता है। वहां की व्यवस्था सुधारी जाए।

आज स्थिति यह है कि इनमें कागजी खानापूर्ति के अलावा कहीं कुछ नहीं होता। सारी जमीन का जो खेल चल रहा है, वह माया का कहो या सरकार का, संहारक रूप ही है। सब अपना-अपना रोकड़ा लेकर चले जाने में लगे हैं। भले ही सुविधाओं के अभाव में कृषक अपने पशुओं को बेचने पर मजबूर हो रहा है। रोजाना ट्रकों में ऊंट कटने के लिए बांग्लादेश भेजे जा रहे हैं। पुलिस अपनी वसूली करके ट्रकों को छोड़ रही है। सांसद मेनका गांधी ने बताया कि उन्होेने मुख्यमंत्री एवं पुलिस महानिदेशक को पत्र भी लिखे। किन्तु उनका उत्तर नहीं आया। जो मारकर सुख महसूस करते हों, उन्हें बचाने में क्या स्वार्थ?

राजस्थान आज भी चाहे तो पशुधन के सहारे नई पीढ़ी को सुनहरा भविष्य दे सकता है। दूध, दूध उत्पाद के अलावा चमड़ा, ऊन, अस्थि, आंत्र जनित उद्योगों में बड़ा कार्य कर सकता है। पूरे देश में इतना पशुधन अन्यत्र नहीं है। उन देशों से सीखें जो छोटे होकर भी पशुपालन में शीर्ष पर हैं। हमारी दिक्कत यह है कि प्रशिक्षण तथा सर्वे की टोली में भी नेता और अफसर भरे होते हैं, जिनका विषय से लेना-देना नहीं होता।

हर मुख्यमंत्री इजरायल जाकर आता है। अफसरों का टोला साथ। इनमें इच्छाशक्ति नहीं होती। आज रासायनिक खेती भी मोहभंग कर चुकी है, पशुधन कटने क ो पंक्ति में खड़ा है। समय रहते आंख नहीं खुली तो हम भी अन्न-दूध आदि के लिए विदेशों पर आश्रित हो जाएंगे। हमारे नेता 100 प्रतिशत एफडीआई करके हमारे जीवन को विदेशी हाथों बेचकर चले जाएंगे। जागना चाहो, तो अब भी सवेरा हो सकता है।

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. हम पशु नहीं उनसे बदतर ही व्यवहार करते है ।

    टिप्पणी by sajjanraj Mehta — जुलाई 22, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • शिक्षा का प्रभाव ज्यादा, संस्कारहीनता का परिणाम है।

      टिप्पणी by gulabkothari — जनवरी 29, 2014 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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