Gulabkothari's Blog

अगस्त 11, 2013

देशी नहीं विदेश विभाग

गर्व की बात है कि हमारा विदेश विभाग शुद्ध रूप से विदेशी है। इसमें देशी कुछ भी नहीं है। इसकी तो भाषा भी विदेशी ही दिखाई देती है। अत: भारतवासियों की भाषा, भावना, प्रतिक्रिया को जरा भी समझते तक नहीं हैं। माटी की भाषा इनको आती ही नहीं। अंग्रेजी पीना, अंग्रेजी खाना, बच्चों को अंग्रेजी सिखाकर निवृत्त हो जाना। इसके आगे जीवन का लक्ष्य ही नहीं। अत: इसी को उपलब्घि मान लेते हैं। पिछले 66 साल में कितने धुरंधर आए इस विभाग में, कितनी अंग्रेजी बोल गए, कितनी वार्ताएं, नकली प्रेस कांफे्रंस कर गए और नतीजा? सिफर! एक छोटे से पाकिस्तान का मुद्दा नहीं सुलझा पाए। क्या इनकी क्षमता को और परिणाम को देखना चाहेंगे? क्या यह देश हित में कार्य करते हैं अथवा सी.बी.आई. की तरह सरकार के हित में? इनके मन में भारतीय होने का उतना गर्व नहीं है जितना कि पाकिस्तानी सेना और विदेश विभाग का लिहाज है। वहां भी अवाम के जज्बात की किसको परवाह है!

इसके परिणाम देखने को ये नेता और अफसर तो शायद न रहें, किन्तु नई पीढ़ी को कंटीले मार्गो पर चलना होगा। जिस प्रकार उत्तराखंड सरकार ने अग्रिम सूचना को दरगुजर कर दिया था और केदारनाथ बह गया, उसी प्रकार हमारी सेना और विदेश विभाग ने भी कुछ नहीं सुना-चेतावनी बंद कानों से टकराकर लौट गई। शायद देश हित में रक्षा सौदे कर रहे होंगे। हमारे अनेक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इन सौदों से जुड़े विवादों में फंसे हैं। सरकारों का हाल यह है, बोफोर्स घोटाले से जुड़ी फाइल तक सदन के पटल पर रखने की उनकी तैयारी नहीं है। रक्षा मंत्री किसी भी दल के हों, उनका ध्यान देश की रक्षा से ज्यादा अपनी सुरक्षा पर रहता है। रक्षा मंत्री ने ताजा घटना को एक बार तो नकार ही दिया। दो दिन बाद स्वीकार करके नाकारा ही साबित हुए। हम खिलौनों में व्यस्त हैं।

देशवासी हतप्रभ हैं। सरकारी रूख पर, जागरूकता पर, बयानबाजी पर, घुसपैठ पर छाए मौन पर। मुफ्ती मोहम्मद सईद के विवाद पर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह के रवैये पर, आडवाणी के शब्दों पर (जिन्ना के बारे में) और भी न जाने क्या-क्या धूल झोंकते जा रहे नेताओं/अधिकारियों पर। जिनकी काली करतूतों ने भारत जैसे बड़े भाई को शत्रु का मेडल पहनवा दिया। हर छोटे से छोटे पड़ोसी देश को विमुख कर दिया हमसे। इससे बड़ी उपलब्घि भी क्या हो सकती है विदेश एवं रक्षा विभाग की। सन् 1971 के युद्ध में तो मैं भी एक सैनिक के रूप में सीमा पर तैनात था। रोज समाचारों से लगता था कि दो-तीन दिन में हम पाकिस्तान से समर्पण करा लेंगे। क्यों रूक गए, आज तक समझ में नहीं आया। सिवाय इसके कि दोनों देशों के विदेश विभाग शायद मिले हुए हैं। प्रत्येक उच्च स्तरीय वार्ता के बाद भी ऎसा ही नाटक होने का आभास होता है। हर बार कहा जाता है कि पाकिस्तान विश्वास करने लायक नहीं है। हम फिर अगली वार्ता की तैयारी में जुट जाते हैं। क्या बात है!

इसी बीच हम देख रहे हैं कि चीन एवं पाकिस्तान बहुत नजदीक आ चुके हैं। सड़कें बन गई हैं। सैन्य सहायता पाकिस्तान पहुंच रही है। तिब्बत पर चीन का पक्का कब्जा है। अब दलाई लामा भी समझ गए होंगे कि भारत के भरोसे उनको तिब्बत नहीं मिलने वाला। भारत आज प्रत्येक पड़ोसी देश का शत्रु है, यह क्या चीन नहीं जानता? अगले दस वर्षो में क्या चीन इन सबसे मित्रता करके भारत को घेर नहीं लेगा! आज भी भारत का बड़ा भूभाग चीन ने दबा रखा है और स्वयं भारत अपनी गलती को ढंकने के लिए झूठ पर झूठ बोल रहा है। कल क्या होगा, कौन जाने! हम तो भीतर की राजनीति में फसे हुए हैं। माफिया और आतंकवाद का उत्तर हमारे पास नहीं है। सीमाएं बंद करना भी हमारे वश में नहीं रहा। राजनेता देश को एकजुट होने नहीं देते। रोज नए टुकड़े करते जा रहे हैं। देश से जुड़े ऎसे संवेदनशील मुद्दों को रहस्यमय ढंग से क्रियान्वित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। न यह मुद्दा किसी एक विभाग या सरकार के हवाले छोड़ा जाना चाहिए। इनमें तो एक राष्ट्रीय स्तर की स्वतंत्र वरिष्ठ जनों की समिति भी बननी चाहिए, जो एक तरह की सलाहकार परिषद की भूमिका निभा सके। जब सरकार ही जनता से उसके मुद्दों को छिपाती है, तब सरकार की नीयत में खोट नजर आता है। और इसी चोरी के वातावरण में बड़े-बड़े घोटाले कर दिए जाते हैं। जनता सुरक्षा के नाम पर मौन रहती है। कोई भी सरकार इस तरह के घोटालों को उजागर नहीं होने देती। आज हर प्रदेश में मंत्रियों-अधिकारियों के घपलों-घोटालों से जुड़ी सीडी भी बाहर आई हुई है। सभी दल मिलकर इन्हें दबाने को समझौते करते दिख रहे हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तीनों इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। जबकि विदेश और रक्षा विभाग के मुद्दों के आगे तो इनकी कोई अहमियत ही नहीं है। आज के हालात में कब देश गुलाम हो जाए, पता भी नहीं लगेगा और हमारे लोग कुछ कर नहीं पाएंगे, बचाव में अनर्गल बोलते ही रहेंगे। देश तो आज भी बहुत कुछ विदेशी हाथों में जा चुका है। देश फिर से गुलामी की ओर बढ़ रहा है। क्या युवा कुछ क्रांतिकारी कदम उठाएगा? सरकारों से उम्मीद करने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया। ऎसे राजनेताओं को तो चुन-चुनकर राजनीति से बाहर करना है। देश की एकता को बहाल करना है।

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