Gulabkothari's Blog

अगस्त 18, 2013

कर्णधारो… लोकतंत्र बचाओ!

हर जनप्रतिनिधि एक बेल की तरह जनता के सहारे खड़ा होता है। उसका स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं होता। फिर वह जनता का सबसे बड़ा शत्रु बनकर, जनहित के विरूद्ध, सामन्ती ढंग से व्यवहार करने में गर्व करता है। उसको न तो यह याद रहता कि उसे निश्चित अवधि के बाद फिर से जनता के समक्ष जाना है, नई स्वीकृति लेनी पड़ेगी। न उसको याद रहता कि धन तो हाथ का मैल है, साथ कुछ नहीं जाता, पीछे वालों को बिगाड़ जाता है। आज की स्थिति तो और भी भयंकर है। अधिकतर जनप्रतिनिधि स्वयं को भस्मासुर प्रमाणित करने में व्यस्त हैं। जनता से शक्ति मांगकर जनता के अस्तित्व को ध्वस्त करने लगते हैं। जनता का हर तरह से मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से शोषण करके सेवा का दंभ भरते हैं। भले ही समाज उन्हें धिक्कारता रहे। और इन्हीं के कंधों पर टिका है हमारा लोकतंत्र!

लोकतंत्र हो गया पंगु

इनके रहते देश में न तो खुशहाली आएगी, न ही गरीब को रोटी-पानी मिलने वाला है। अधिकांशत: इनके रिश्तेदार भी इनकी तरह ही असंवेदनशील होते हैं। क्यों हो गया मेरा लोकतंत्र ऎसा पंगु? क्या चुनाव सुधार से कुछ बदल सकता है? क्या सरकारी तंत्र और युवा आगे आएंगे? न अल्पसंख्यक बच पाएगा, न ही आरक्षित। न धर्म और जाति ही बचाने में समर्थ होंगी। जानते हैं न, धर्म गुरू भी बिकने लग गए हैं! सबसे पहले तो सही-निष्ठावान व्यक्ति का-चुनाव करने का संकल्प लेना होगा। न पार्टी, न जाति, न वंश, न धर्म। किसी का भुलावा नहीं चले। देखें कि क्या प्रत्याशी प्रदेश व राष्ट्र स्तर के मुद्दों को समझने की क्षमता रखता है, समाज को नेतृत्व दे सकता है, भेदभाव से ऊपर न्याय कर सकता है। हम उसका इतिहास, चरित्र और भूमिका का आंकलन करें। आज राजनीति व्यापार बन गया है। सरकारों की गिद्ध दृष्टि केवल धन पर रहती है। इस धन से भोग और रोग का पोषण होता है, योग का नहीं। सारे अनैतिक कार्य इसी धन से सम्पन्न होते हैं। इनकी रोकथाम के लिए कानूनकम नहीं हैं, किंतु चुनाव अधिकारी स्वयं उनका पालन नहीं करते। प्रत्याशी स्वयं धज्जियां उड़ाते हैं, गलत सूचनाएं भरते हैं, धन की बारिश, शराब की नदियां और हलवों की दावतें होती हैं। मतदान केन्द्रों पर कब्जे, शस्त्र प्रयोग, सामूहिक आक्रमण होते हैं। जेल में बैठे अपराधी जीत जाते हैं। जय लोकतंत्र! क्या लोकतंत्र में कहीं अपराधी शासन करता देखा जाता है? और इसलिए मजाक बनता है – मेरा भारत महान!

“प्रत्याशी स्वयं धज्जियां उड़ाते हैं, गलत सूचनाएं भरते हैं, धन की बारिश, शराब की नदियां और हलवों की दावतें होती हैं। मतदान केन्द्रों पर कब्जे, शस्त्र प्रयोग, सामूहिक आक्रमण होते हैं। जेल में बैठे अपराधी जीत जाते हैं।…क्या लोकतंत्र में कहीं अपराधी शासन करता देखा जाता है? और इसलिए मजाक बनता है – मेरा भारत महान!”

बहुत होली खेल चुके हम देश के सम्मान की। इतनी शर्म उठाकर भी क्या आईपीएल बंद करने का साहस जुटा पाए? राष्ट्रमंडल खेलों की फाइल कहां घूम रही है? चारों ओर घोटालों और भ्रष्टाचार के महाकाव्य लिखे जा रहे हैं जनप्रतिनिधियों द्वारा। यह चिंतन कैसे बदल पाएगा! सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की तो पालना भी नहीं हो पाती। क्या यह न्यायपालिका के अस्तित्व पर प्रश्न नहीं है? क्या कानून की ठोस पालना के बिना भ्रष्टाचार निवारण संभव है? आज यदि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, तो कानून भी कठघरे में है ही। इसके बिना हम देशहित को सर्वोपरि नहीं रख पाएंगे? चुनाव प्रक्रिया के सुधार भी कानून की पालना पर आधारित रहेंगे।

भूल जाते हैं घोषणापत्र

आज प्रत्याशी या राजनीतिक दल कुछ भी घोषणा पत्र जारी कर देते हैं। पांच साल में याद भी नहीं आता और चुनाव आयोग भी कुछ कार्यवाही नहीं कर सकता। न खोटे प्रतिनिधि को वापस बुला सकते हैं। इसी तरह आज एक तरफ तो एक व्यक्ति एक पद के नारे लगते हैं तथा दूसरी ओर, एक सदन का सदस्य बिना इस्तीफा दिए दूसरे सदन के लिए चुनाव लड़ लेता है। क्या यह लोकतंत्र का मजाक नहीं है? जब सत्ता पक्ष ही प्रक्रिया से जुड़ा रहेगा, तब चुनाव निष्पक्ष कैसे हो सकते हैं? अधिकारियों को सत्ता पक्ष के लिए कार्य करना पड़ेगा। सारे संसाधन भी सत्ता पक्ष के काम आएंगे। तब क्यों नहीं इस अवधि में निश्चित काल के लिए राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए? उसी काल में मतदान हो। चुनाव से जुड़ी घोषणाएं जब चुनाव के बाद पूरी की जाएं, तो यह खर्च पार्टी के चुनाव खर्च में जोड़ा जाए। भले ही कुछ प्रत्याशी अवैध छूट जाएं। जनप्रतिनिधि के वेतन-भत्ते के साथ उत्तरदायित्व भी तय होने चाहिए। सदन में अनुपस्थिति पर वेतन में कटौती का प्रावधान भी होना चाहिए। प्रदेश के विकास में सदन में उसकी भूमिका नजर आनी चाहिए। यदि किसी प्रतिनिधि या मंत्री के विरूद्ध गम्भीर आरोप लगते हैं, तो तुरंत कार्रवाई करना अनिवार्य होना चाहिए।

श्रद्धेय कर्पूरचंद्र कुलिश ने लिखा था…

चुनाव सुधार का एकमात्र उपाय कानून नहीं है। … हमारा यह भी दायित्व है कि जिस तरह के सुधार हम चाहते हैं वैसी भावभूमि का निर्माण भी देश में करें। …भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू लोकतंत्र के बजाय भीड़ तंत्र पर अधिक निर्भर करते थे और भीड़ तंत्र को ही लोकतंत्र समझते थे।…भीड़तंत्र का एक कुपरिणाम यह निकला कि विधानसभाओं या लोकसभा में विचार विमर्श का महत्व ही समाप्त हो गया। …आवश्यकता है कि राजनीतिक दल अपने आपको सुगठित करें। उन्हें साधारण सदस्य से लेकर मंत्री पद पर आसीन होने वाले व्यक्तियों तक के लिए एक कसौटी बनानी पड़ेगी। नीचे से लेकर ऊपर तक चढ़ने वालों के लिए एक सुनिश्चित प्रक्रिया अपनानी होगी। चुनावों में उतरने वाले उम्मीदवारों का चयन पहले पार्टी के सदस्यों द्वारा किया जाना चाहिए।

– 24 मार्च 1998

आज जिस प्रकार चुनाव प्रकिया अपनाई जा रही है, वह जनहित में भी नहीं है और लोकतंत्र का स्वरूप भी भ्रष्ट कर रही है। उदाहरण के लिए, सीटों का आरक्षण। आरक्षण कानून प्रत्याशियों तथा दलों पर ही लागू होना चाहिए। तीस प्रतिशत महिलाओं का आरक्षण हो या आरक्षित वर्ग का, सीटों पर तो नहीं किया जा सकता। दलों की सूची में आरक्षण के सारे प्रावधान रहने चाहिए। राज्य विधानसभा की 200 सीटों की सूची में 60 नाम महिलाओं के होने चाहिए। चुनाव पार्टी कहीं से भी लड़वाए। इसी प्रकार आरिक्षत वर्ग की संख्या भी 200 की सूची में सम्मिलित रहनी चाहिए। चुनाव कहीं से भी लड़ सकते हैं। इससे प्रत्येक नागरिक के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रह सकेंगे। कोई भी नागरिक चुनाव लड़ सकेगा। आप किसी क्षेत्र की सीट आदिवासी के लिए आरक्षित करते हैं, तो वहां के सामान्य जातियों के सारे नागरिकों के अधिकारों का उम्र भर के लिए हनन होता है। तब यह लोकतंत्र का स्वरूप न रहकर सामंती हो जाएगा। महिला के नाम सीट का आरक्षण भी 50 प्रतिशत पुरूष् मतदाता के अधिकारों का हनन ही है।

क्षेत्रीय दल न लड़ें संसदीय चुनाव

इसी प्रकार संविधान में भी क्षेत्र तथा राष्ट्रीय दलों की परिभाषा दी हुई है। चुनाव आयोग का दायित्व बनता है कि इन परिभाषाओं को लागू करें वरना इन चुनाव अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय पदों का चुनाव तो हरगिज न लड़ पाएं। इसी कारण सीटों की खरीद-फरोख्त होती है। इसी प्रकार चुनाव में सम्पत्ति तथा चुनाव खर्च के आंकड़े यदि झूठे पाए जाते हैं, तो चुनाव अवैध घोषित हो जाना चाहिए। पुख्ता सबूत के बाद भी ऎसा नहीं हो, तो चुनाव आयुक्त के विरूद्ध मुकदमा क्यों न चले? आपराधिक पृष्ठभूमि को छिपाना, फरारी की सूचना ढककर रखना भी चुनाव को अवैध ठहराता है। जो व्यक्ति पुलिस रिकार्ड में फरार हो, वह चुनाव कैसे लड़ सकता है? विधायक बनकर विधानसभा में बैठता है, तो विधानसभा अध्यक्ष के विरूद्ध भी कार्रवाई होनी चाहिए। लोकतंत्र में दल-बदल कानून तो होना ही नहीं चाहिए। दल छोड़ने पर पुन: चुनाव अनिवार्य हो जाना चाहिए। इसी प्रकार चुनाव सम्बंधी मुकदमों का निस्तारण भी एक निश्चित समय में होना चाहिए। पांच साल निकल जाएं क्या यह अन्याय नहीं है? नई पीढ़ी तो अब यह प्रश्न करने लगी है कि राजनीति में व्यक्ति को क्रमश: ऊपर चढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। वह ग्राम पंचायत से शुरू करके एक-एक पायदान ऊपर चढ़कर संसद तक पहुंचे।

आज सारे प्रतिनिधि स्वयं को असुरक्षित पा रहे हैं, अपने ही देश में भ्रष्टाचार के कारण। न वे सूचना के अधिकार में आना चाहते, न ही आय तथा सम्पत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहते। इनको बाहर करना हमारी पहली आवश्यकता है। इसके लिए व्यापाक चुनाव सुधार ही पहला कदम हो सकता है।

गुलाब कोठारी

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