Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 6, 2013

अधर में अटका सुधार

हाल ही में दो-तीन तरह के घटनाक्रम इस तेजी से गुजरे कि देश में आशा की एक किरण भी नजर आई, वहीं दूसरी ओर, एक अंधेरे का धुंधलका भी क्षितिज में झूलता दिखाई दिया।

उच्चतम न्यायालय ने दागियों पर चुनाव लड़ने की रोक लगा दी। बहुत अच्छा किया, किंतु पुराने दागियों को दागी नहीं माना, बहुत बुरा किया! कानून में दोनों दागियों में भेद क्यों किया गया? क्या कोर्ट स्वयं दागियों से डर गया? जैसे उनके मतदाता डर के मारे हर बार उनको चुनते रहे हैं! उन्हीं की समझ पर फिर छोड़ दिया पुराने दागियों को? इतिहास माफ नहीं करेगा। लोकतंत्र पंगु रह जाएगा।

भविष्य में मतदाता को खराब प्रत्याशियों को नकारने का अधिकार दे दिया गया। बहुत अच्छा हुआ, लेकिन अब भी जीतने वाला बचे हुए वोटों में बहुमत से जीत जाएगा। यह बहुत बुरा होगा। मान लीजिए यदि एक सौ मतदाताओं में से चालीस ने सबको नकार दिया, तब क्या शेष मतदाताओं (साठ) में से 31 वोट पाने वाला जीता हुआ मान लिया जाना चाहिए? अर्थात जिसको 69 प्रतिशत मतदाताओं ने नकार दिया हो, उसे जीता मान लिया जाए? यदि इस बिन्दु को बदला नहीं गया, 100 में से 51 वोट पाने पर ही जीतने का कानून नहीं बनाया गया, तो वोट की राजनीति अच्छों को चुनाव जिताने के बजाए नकारने वालों पर अधिक टिकेगी। लोकतंत्र का इससे अधिक नुकसान अथवा अपमान और क्या हो सकता है! समय है, पुनर्विचार किया ही जाना चाहिए।

सत्ता के आज दो ही पाए रह गए-एक राजनीति और दूसरा धर्म। एक का उदाहरण तो आसाराम और एक उदाहरण लालू यादव। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के संस्थापक हैं। उदाहरणों की सूची तो बहुत लम्बी है। प्रश्न सूची का नहीं, मानसिकता का है। लालू तो अपराधी घोषित हो गए। आसाराम को भले अभी कानून ने अपराधी घोषित नहीं किया हो, पर समाज ने तो अपराधी मान ही लिया है। दोनों जेल की सजा काट रहे हैं। सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व की भूमिका में रहने के बावजूद इनके चेहरे पर कोई अफसोस नहीं, कोई लज्जा नहीं। उल्टा अहंकार, फैसलों को चुनौती देने का? अपने किए को सही प्रमाणित करने का यह कैसा दु:साहस? राबड़ी देवी कह रही हैं कि जेल से ही राजनीति करते रहेंगे। जैसे लीला मदेरणा ने कहा था कि-पुरूष प्रधान समाज में तो राजा-महाराजाओं के समय से ही यह सब होता आया है। तब कैसी शर्म और कैसा धर्म? आसाराम को अनुयायी आज भी पूज रहे हैं। या तो उनको यथार्थ का भान ही नहीं है या उनको काम में लिया जा रहा है। उनको अब तो विश्वास हो जाना चाहिए कि आसाराम को अब बरसों जेल में “जैराम जी” की ही करनी पड़ेगी!

जनता के सामने एक चौराहा आ गया है। उसको आलस्य त्यागकर दृढ़ फैसले करने हैं। कानून में छूटी गलियों को समझकर मार्ग निकालना है। धूर्त लोगों की मीठी-अतिविनम्र भाषा को गटकना नहीं है। न ही अपनी गर्दन इनके हाथों में सौंपनी है। राहुल ने देशहित में इतना बड़ा काम कर दिया जैसे कुम्भकरण के मुंह से इन्द्रासन के स्थान पर निद्रासन निकल गया। मां सरस्वती ने मुंह से अच्छे बोल निकलवाए। भले शब्दावली को लेकर मां की डांट खानी पड़ी हो।

आज सत्ता की शतरंज जिस तरह खेली जा रही है, उसमें सत्ताधीश नशे से बाहर नहीं आता जान पड़ता। उससे मानवीय संवेदनाओं की आस करना सावन के अंधे जैसा ही होगा। उनसे संघर्ष करने वालों को भी संवेदनाओं को त्यागना पड़ेगा। आज चारों ओर जो लूट मची है, अपराधियों को जिस तरह से बचाया जा रहा है, जनता को निचोड़ा जा रहा है, ऊपर से जनता को हाथ जोड़कर मां-बाप कह रहे हैं।

वाह! जीतने के बाद पांच साल के लिए मां-बाप फिर सड़क पर। गायों के बाड़े में बस एक आसाराम और चारे के डिपो में बस लालू यादव! तय तो फिर भी जनता को ही करना है। अच्छा तो तभी होगा, जब कानून भी जनता का भरपूर साथ दे। अपराधियों को, राजनीति करने वाले वकीलों को सहयोग नहीं किया जाए। जब प्रमाणित अपराधी सजा मिलने के बाद ऊपर की अदालतों में जाते हैं और वहां भी दोषी पाए जाते हैं, तब उनकी सजा स्वत: ही दोगुना हो जानी चाहिए। केवल निचली अदालत के फैसले को सही ठहराना अपराधियों के लिए काफी नहीं है।

कानून में सजायाफ्ता अपराधी की पैरवी करना, ऊपर के न्यायालय में दोषी बने रहना भी वकीलों को स्वतंत्रता नहीं दें। उन्हें चेतावनी मिले कि प्रमाणित अपराधी को, मोटी फीस लेकर, बचाने के प्रयास करने के बजाए न्याय को प्रतिष्ठित करने में सहयोग करें। वरना ये भी कानून के नासूर ही बनते जा रहे हैं। दिल्ली में तो ऎसे वकीलों की बाढ़ आई हुई है। अपराधी प्रवृत्ति के दल आमतौर पर बड़े वकीलों को अपने प्रतिनिधि के रूप में राज्यसभा में इसीलिए भेजते हैं। समय आ गया है, जब न्यायालयों को न्यायपालिका के बारे में भी कठोर फैसले करने होंगे। जिन फैसलों में भ्रष्टाचार की बदबू आए, उनकी मीडिया में सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए। आधा-अधूरा तो कुछ भी नहीं होना चाहिए।

-गुलाब कोठारी

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