Gulabkothari's Blog

नवम्बर 29, 2013

जवान होता लोकतंत्र

लगता है हमारा लोकतंत्र करवट बदल रहा है। पैंसठ वर्षो के बाद फिर से युवा हो रहा है। नई पीढ़ी की आंखों में नए सपने थिरक रहे हैं। राजनीतिक दल तरह-तरह के वादों से आंखों में धूल झोंकने का प्रयास कर रहे हैं। देखना यह है कि जीत मतदाता की होती है या राजनीतिक दलों की। क्योंकि, दलों ने तो अपनी गिरावट का प्रमाण अनेक स्थानों पर अपराधी, भ्रष्ट और निकम्मे उम्मीदवार तक खड़े कर दे डाला है। वे तो मान बैठे हैं कि मतदाता कहां जाएगा। एक ओर कुआ है दूसरी ओर खाई है। दोनों अच्छे नहीं लगे और नोटा का बटन दबा दिया तो मान लो कि खोटे को ही चुन लिया। उच्चतम न्यायालय का हास्यास्पद फैसला आ चुका है कि नोटा यदि अन्य वोटों से अधिक भी हुआ, फिर भी चुनाव दुबारा नहीं कराए जाएंगे। यानी कि नकारा हुआ प्रत्याशी ही जीतेगा। तब क्यों लगाया नोटा का बटन? और सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला? इससे पूर्व एक अन्य फैसले में भी यही न्यायालय कह चुका है कि जेल में बैठा अपराधी भी चुनाव लड़ सकता है। तब कैसा होगा हमारा लोकतंत्र?
इस बार तो चुनाव भी कुछ बदले-बदले दिखाई पड़ रहे हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव हुए। कहीं कोई चुनाव का माहौल ही दिखाई नहीं दिया। न बैनर, न पोस्टर, न लाउडस्पीकर, न सड़कों पर झंडे, फर्रियां। मोहल्लों की बैठकें भी टीवी की भेंट चढ़ गईं। विभिन्न सर्वे के माध्यम से चैनलों ने भी अपनी साख दांव पर लगा दी। जनजीवन साधारण। जैसे बिना पटाखों की दीपावली या बिना रंगों की होली। चुनावी कानून भी विलायती हो गए।

मतदाता भी दो श्रेणियों में बंट गया है। एक तो परम्परागत मतदाता जिसने कई चुनाव देख लिए, तथा जो किसी जाति या दल को स्वीकार कर चुका। दूसरा, युवा मतदाता जो पहली बार मतदान कर रहा है।

उसने केवल एक ही सरकार के कार्यकाल का अनुभव किया है। जैसे कि मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार का, राजस्थान, दिल्ली में कांग्रेस सरकार का। यह युवा शिक्षित है, स्वयं निर्णय लेने वाला है तथा इसके अपने सपने हैं, जो पुराने मतदाता से भिन्न हैं। इसका ध्यान तो मूलत: शिक्षा, रोजगार, महंगाई और विकास पर टिका है। इस युवा को भ्रष्टाचार, वंशवाद या जातिवाद से भी घृणा है। अत: यह समीकरण भी इस बार टूटते दिखाई पड़ते हैं। इसका प्रभाव भी गहरा होगा। सोनिया, मोदी, राहुल इनके विवेक पर पर्दा नहीं डाल पाएंगे। न धन, बल या मद्य का लालच भी इनकी दिशा बदलने वाले। इनकी आंखों में आजादी के वैसे ही सपने हैं, जैसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भगतसिंह या चन्द्रशेखर आजाद की आंखों में रहे होंगे।
प्रकृति भी इस युवा का साथ देती जान पड़ती है। मतदाता सूचियों में इस बार इनका बाहुल्य होगा। इनका निर्णय लोकतंत्र को दूर तक प्रभावित करेगा। एक अन्य पहलू जो चर्चा में आया, वह है निष्ठा का अपमान। दृष्टिकोण राजनीति, आरक्षण, जातिवाद से इतना गहरा रंग चुका है कि निष्ठावान व्यक्ति निराश होने लगा है। भेदभाव आज चारों ओर चरम पर है। महिलाओं के साथ तो और भी ज्यादा है। इस कारण समाज प्रतिक्रियावादी भी होता जा रहा है और प्रतिहिंसक भी। युवा मन की यह बड़ी पीड़ा है। जनसम्पर्क के दौरान किसी पार्टी को भी कॉलेज में जाकर युवा को सम्बोधन करना याद नहीं आता। उसे नोटा भी नहीं चाहिए। उसे अच्छा प्रतिनिधि चाहिए। चाहे निर्दलीय ही क्यों न हो।
अधिकृत दलों के प्रत्याशी तो जनसम्पर्क का भी नाटक ही करते हैं। दागी तो स्वभाव से, धनवान प्रभाव से, बलवान जाति से, तब क्या जरूरत जनसम्पर्क की? पार्टी को भी शर्म नहीं, किंतु मतदाता कैसे किसी खोटे के हाथ में अपनी गर्दन सौंप दे? इस बार खोटे प्रत्याशी भी तेवर देखेंगे।
चुनाव प्रचार तो कमाल ही बचकाना साबित हुआ? किराए की भीड़ भी कई बार उपलब्ध नहीं हो पाई। बडे-बड़े नेता आए और छोटी-छोटी घटिया बातें करके चले गए। पूरा माहौल गरिमा शून्य नजर आया। कहीं-कहीं तो मर्यादा तोड़कर लोग व्यक्तिगत आचरण पर छींटाकशी कर गए। कहते हैं कि हम बड़े पदों पर बैठने वाले हैं। क्या किसी को श्रोता का सिर शर्म से झुकता नजर आया अथवा अहंकार में चूर यह नेता हेलीकॉप्टर से लोगों की आंखों में धूल झोंककर चले गए? सारे नेता सत्ता पक्ष पर प्रहार कर रहे थे जो स्वयं भी विपक्ष में बैठे थे। किसी ने अपनी विपक्ष की भूमिका पर एक शब्द नहीं बोला। पिछले पांच साल में विपक्ष भी था, चुनाव चर्चा में तो सुनाई नहीं दिया। युवा सुनेगा उनको? वह तो इस बात से भी चिंतित है कि हमारा चुनाव आयोग प्रत्याशियों की ओर से दी गई गलत जानकारियों को स्वीकार क्यों कर लेता है? क्यों वह और आयकर विभाग इन गलत आंकड़ों पर कार्रवाई नहीं करता। क्यों चुनाव आयोग उसे मिलने वाली शिकायतों का तुरंत निपटारा नहीं करता। पांच साल क्यों लटकाए रखता है।
इस बार के चुनाव नई स्वर्णिम रेखा खींचेंगे। अल्पसंख्यक और आरक्षण कानून को नकार देंगे। लोकतंत्र सभी तरह के वादों-विवादों से एक बार फिर ऊपर उठेगा। परम्परागत मतदाता भी यदि युवा के साथ चर्चा करेगा, मीडिया को बंद करके चिंतन करेगा, तो उसका निर्णय भी लोकहित का हो जाएगा।
-गुलाब कोठारी

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