Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 1, 2013

दिमाग से नहीं, दिल से

इस प्रदेश के मतदाताओं को बधाई! आज हमारे भाग्य के निर्माण का दिन है। अपने-अपने देवता से हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा विवेक हमारे साथ बना रहे। प्रकृति ने हमें एक देश-प्रदेश में पैदा किया है। उसे हरा-भरा रखना हमारा दायित्व है। भले ही भीतर हम अकेले जीते हों। हमारी पूजा की थाली में केवल सौहार्द और ऊंचे उठने के सपने हों। मन प्रफुल्लित एवं तरंगित बना रहे।

आजादी से लेकर आज तक राजनेताओं ने हमारे भीतर के पशुभाव का ही पोषण किया है। समाज का खंडन ही किया है। आरक्षण ने एक के दो देश कर दिए। अल्पसंख्यकों को भी मुख्यधारा से अलग कर दिया। जबकि हम इनको देश की अखण्डता के लिए चुनते रहे। आज भी जिस तरह के असुर-दरिंदे और भ्रष्ट लोगों को चुनाव में उतारा है, भले ही जाति या वंशवाद के नाम से उतारा होगा, हम देश को यह संदेश तो दे ही रहे हैं कि हमारी जाति, वंश या प्रदेश में इनसे अच्छा व्यक्ति उपलब्ध ही नहीं है।

“हमारे खून की हर बूंद, चिंतन-भावना रूप देश के काम आए,… शत्रु को, देश की अखंडता के दुश्मन को मैं अपने वोट से मार सकता हूं। मेरे देश को किसी की नजर न लगे।”

यही हमारे गौरव कहलाने योग्य भी हैं तथा आजादी के 65 सालों की उपलब्घि भी हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए आज हमें ऎसे प्रत्याशियों की बलि चढ़ा देनी है। वरना, नासूर बनते चले जाएंगे। अपने संकल्प को हम पक्का कर लें। हम भी यदि पशुओं तथा नपुंसकों को श्रेष्ठ बताएंगे, तो ईश्वर हमारी रक्षा के लिए नहीं आएगा। ऎसा करके हम अपने ईश्वर का अपमान भी करेंगे। जिस इंसानियत और खुद्दारी को मारकर हमें आश्रित भाव में ला छोड़ा है, आज आंखें खोलकर जिंदगी को प्रकाशित करने का दिन है, दीवाली है।

हमारे नेता, अफसर, न्यायाधीश बेजान होते जा रहे हैं। इनके मन में इंसानियत के प्रति दर्द कम होता जा रहा है। ईश्वर ने इनको ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठने की गरिमा दी, इनका विवेक उसका सदुपयोग नहीं कर पाया। धन, जो हाथ का मैल कहा जाता है, को ही साध्य मान बैठे हैं। पुरूषार्थ इनके जीवन से बाहर निकल गया है। इसका स्थान स्वार्थ और तृष्णा ने ले लिया है। स्वयं से इतने दूर हो गए हैं कि भोगों में सुख ढूंढ़ने लगे हैं। यह भी उपलब्घि है हमारी आजादी की। हम विदेशों की नकल करना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य लिव-इन-रिलेशन की ओर बढ़ता जा रहा है। इसका स्वाद तो तभी आएगा न, जब भारतीय ब्रह्मचर्य की अवधारणा का आदर करोगे? वरना, स्त्री तो उम्रभर सजा काटती रहेगी। या पुरूष को भी तेजपाल बनना पड़ेगा। भीतरी मूल्यों को रखकर हम हर जीवनशैली में जी सकते हैं। ऎसे ही हमारी नस्ल में एक प्रजाति अकड़ के कारण वोट डालने ही नहीं जाती। इनको देश खुद के आगे छोटा लगता है। पिछले चुनावों में इनके क्षेत्रों का मतदान 15 से भी कम रहा था। क्या यह इनकी समझ का अपमान नहीं है? क्या ये लोकतंत्र को पैर की जूती मानते हैं?

इनसे आग्रह है कि आज का दिन देश के नाम लिख दें, कितना भी कष्ट हो, अहंकार कितना भी रोके, भले ही बिना मन जाना पड़े, किंतु, अपने परिवार के साथ वोट देने अवश्य जाएं। आखिर पूरी उम्र देश ही तो हमको देता है।

हां, एक बार याद दिला दूं कि आज पहली बार, पुराने मतदाताओं को “नोटा” का नया बटन भी वोटिंग मशीन पर मिलेगा। इसे छूना भी मत राजनेताओं यानी कि हमारे प्रतिनिधियों ने हमें बेवकूफ बनाने के लिए अथवा हमारे विवेक की परीक्षा लेने के लिए इस बटन की अगवानी की है। वे “जिताने वाले” खोटे लोगों को भी हमारा प्रतिनिधि बनाकर हमको अपमानित करना चाहते हैं। आपको खोटे प्रत्याशियों के बीच कोई ईमानदार व्यक्ति नजर नहीं आए, तो निश्चित है कि आप “नोटा” का बटन दबाकर यह कहना चाहोगे कि मुझे इनमें से कोई पसंद नहीं। उच्चतम न्यायालय के फैसले से आपका मत गया रद्दी की टोकरी में। नोटा के कारण खोटा आदमी ही जीतेगा, यह पक्की बात है। चुनाव रद्द नहीं होगा।

इस बार लोकतंत्र का यह उत्सव युवाओं के लिए विशेषरूप से विकास के द्वार खोलने वाला हो सकता है। प्रचार के दौरान दिए गए नेताओं के अहंकार भरे, गरिमाहीन, देश का खंडन करने वाले भाषणों को दर गुजर कर दें। हमारे अरबों रूपए इस कार्य के लिए मिट्टी में मिला दिए। साथ ही अपनी औकात भी बता गए। इनकी भी वक्त आने पर हमें सफाई करनी है। यह हमारे देश प्रेम और माटी के मोह से खिलवाड़ नहीं कर पाएंगे। हमारे खून की हर बूंद, चिंतन-भावना रूप मेरे देश के काम आए, मैं अपना कर्ज चुका सकूं, यह प्रार्थना करनी है। इसके लिए सीमा पर गोली खाना ही जरूरी है। शत्रु को, देश की अखंडता के दुश्मन को मैं अपने वोट से मार सकता हूं। मेरे देश को किसी की नजर न लगे।

-गुलाब कोठारी

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