Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 19, 2014

समलैंगिकता-1

कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को अवैध मानते हुए धारा-377 को बहाल रखने का फैसला सुनाया था। जबकि इससे पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी तौर पर मान्यता प्रदान कर दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद से ही इस विषय पर देश भर में एक बहस चल पड़ी थी। गत दिसम्बर माह में जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया तो पत्रिका ने फैसले का स्वागत किया। प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी ने 16 दिसम्बर 2013 को विशेष सम्पादकीय लेख लिखा “लहूलुहान संस्कृति” जिसमें समलैंगिक सम्बन्धों को अप्राकृतिक मानते हुए भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बताया। इस लेख पर पाठकों की ढेरों प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई थीं। अनेक पाठकों ने लेख का समर्थन किया। कुछ पाठकों ने विरोध जताया तो कई पाठकों ने “पत्रिका” से अपेक्षा की कि वह इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाले ताकि युवा पीढ़ी को सही मार्गदर्शन मिल सके। इन्हीं में दो पाठकों की प्रतिक्रियाएं और इस विषय के सभी आयाम पर पत्रिका सम्पादक का विस्तृत लेख यहां दिया जा रहा है।

हर क्रिया एक अदृश्य कारण होता है। हर क्रिया किसी कारण का प्रतिबिम्ब है। हमारी नजरें उस कारण को नहीं देख पाती हैं। हम अपने माता-पिता के अंश हैं। हमारे बीज की उत्पत्ति तरल रूप में दो लोगों के मिलन से संभव हुई थी जो समलैंगिक मिलन से संभव नहीं था। हमें इस बीज के अवयव के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। इसमें हमारे पूर्वजों की सात पीढियों के गुण समाहित रहते हैं, माता और पिता दोनों की ओर से। क्या हम इस द्रव के मूल्य को समझ सकेंगे? क्या हम समझ सकते हैं कि प्रजनन के अलावा इस द्रव की जीवन में क्या भूमिका हो सकती है? यह तो जीवन का पर्याय ही है और इसकी एक भी बूँद बर्बाद नहीं की जा सकती है। इसमें सात सात पीढियों के गुणों का खजाना मौजूद है। इसका इस्तेमाल तभी किया जाना चाहिये जब धरती पर आठवीं पीढ़ी को लाना है। समलैंगिक रिश्तों या पशुगमन, जहाँ नवजीवन की उत्पत्ति नहीं होती, वहाँ इस द्रव की बर्बादी से चौदह पीढियों का आशीर्वाद बेकार चला जाता है।

वहीं, ब्रह्मचर्य का पालन कर इस द्रव को सुरक्षित रखने से हम भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ और मजबूत बनते हैं। हमारा आभामण्डल अधिक तेजवान और समस्त इंद्रियां ज्यादा सक्षम हो जाती हैं। शादीशुदा जोड़े को भी सलाह दी जाती है कि वे इस शुक्र को बर्बाद न होने दें। नहीं तो उनकी याददाश्त घटेगी और प्रतिरक्षी तंत्र कमजोर हो जायेगा। ये द्रव वाष्प के रूप में ऊपर उठकर एक अदृश्य स्तर, ब्रह्माण्ड के अक्षर मंडल तक पहुँच जाता है जहाँ हर क्रिया का कारण देखा जा सकता है।

समलैंगिक रिश्तों की नींव, विपरीत तत्वों के बीच आकर्षण के सिद्धान्त पर नहीं टिकी होती है । इसमें निहित दैहिक सुख यंत्रवत रहता है ना कि भावनात्मक या आध्यात्मिक। यह बन्धन दीर्घकालिक न होकर कुछ समय तक ही रहता है। वहीं कुछ लोग टॉफियां या चाकलेट का लालच देकर बच्चों को लुभाने की कोशिश करते हैं। जब बच्चे इन के साथ ही बड़े होते हैं तो वे कई तरह के नशे का शिकार हो जाते हैं। ये एक छोटा लेकिन घनिष्ठ समूह होता है जहां बच्चों को स्वस्थ सामाजिक वातावरण और जीवन की प्राकृतिक धारा से दूर रखा जाता है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि ये काम-विकृत मानसिकता है। जीवन को इस दिशा में धकेलने में कुछ भी प्रकृति के अनुरूप नहीं है।

हमें सिखाया गया है कि पुरूष और नारी, दोनों ही अर्द्ध-नारी और अर्द्ध-पुरूष हैं। पुरूषों में पुरूषोचित गुणों के साथ स्त्रैण गुण भी होते हैं। इसी तरह महिलाओं में, पौरूष गुण भी रहते हैं। लेकिन समलैंगिक रिश्ते में जब दो पुरूष साथ रहते हैं तो अर्द्ध नारी का हिस्सा समाप्त हो जाता है। इसी तरह महिलाओं के बीच सम्बन्ध में अर्द्ध-पुरूष का हिस्सा समाप्त हो जाता है। प्रकृति ने हमें अपूर्ण बनाया है, लेकिन इस तरह के सम्बन्ध से हम में पशु प्रवृति बढ़ जाती है। वैसे, पशु भी प्रकृति के नियम के विरूद्ध नहीं जाते हैं, हम उनसे भी बदतर बन जाते हैं। हम अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण खो देते हैं ।

इस तरह के सम्बन्ध में किसी तरह का आध्यात्मिक पक्ष नहीं रहता। ये पूर्ण रूप से काम इच्छा की संतुष्टि के लिये है। इससे नई रचना सम्भव नहीं। दाम्पत्य में जिस निर्मल पे्रम की अनुभूति स्पर्श-आलिंगन आदि व्यवहार में होती हैं वैसी आन्तरिक प्रसन्नता समान तरह के व्यक्ति से अनुभूत नहीं हो सकती। प्रेम रस का कोई भी साहित्य पढ़ लो, वह दैहिक सुख की बजाय भावनाओं पर आधारित है। यहां तक कि पशुओं में भी यही बात देखी गई है। सिर्फ शारीरिक समागम होने पर, उसमें किसी तरह के लगाव की कोमल भावनाएं नहीं जुड़ी रहती हैं। महज कामुक अनुभूति रहती है जिसमें नवसृजन की अपेक्षा भी नहीं होती। परिणामस्वरूप हमारा बर्ताव पशुओं जैसा होता है। ऎसे सम्बन्धों में आत्माओं का मिलन नहीं होता है ।

प्राचीन काल के हमारे साहित्य में एक शब्द है- रसाभास यानि मिथ्या सुख की अनुभूति। एक ऎसे संवेदनहीन सुख की अनुभूति जिसमें गुदगुदाती मीठी भावनाओं का अभाव रहता है। सभी इन्द्रियबोध भ्रामक और क्षणिक होते हैं। ना इसमें पिछली क्रिया के लिए कोई संवेदना होती है और न ही भविष्य के प्रति आकांक्षा। प्राकृतिक रस सिर्फ स्त्री-पुरूष के संसर्ग में बहता है। रसाभास के कई उदाहरण हैं ।

  1. किसी और के जीवन साथी के साथ शारीरिक सम्बन्ध।
  2. दोनों की सहमति की बजाय सिर्फ एक साथी की रूचि होने पर, फिर भले ही दोनों इस क्रिया में शामिल हो जाएं।
  3. पशुगमन या पति-पत्नी के अलावा किसी अन्य की ओर आकर्षण।
  4. भय या आक्रामक दबाव में संसर्ग।
  5. वेश्या गमन या आदतन व्यभिचारी में।

रसाभास में प्रेम की अभिव्यक्ति, रति-क्रीड़ा जैसे प्रेम के आभूषण नहीं होते हैं। इसमें न बदलती ऋतुओं का साथ होता है, न साथ बैठकर सूर्योदय का इंतजार और न ही ढलते सूरज को विदा किया जाता है। जल-क्रीड़ा, वन के शांत वातावरण में साथ टहलना, इत्र-सुगंधी, आकर्षक वस्त्रों के जरिये रिझाने जैसी कोई बात नहीं रहती है। फिर मानवोचित क्या है? प्रत्येक क्रिया के पीछे कोई इच्छा रहती है। कुछ पाने की, कुछ हासिल करने की। लेकिन यही एक क्रिया है जो हम साथ करना तो चाहते हैं लेकिन उसका परिणाम नहीं चाहते, भले ही इसमें अलग अलग मंजिल के स्त्री-पुरूष साथ शामिल हों। ऎसे में क्रिया के दौरान पर-पुरूष या पर-नारी के विचार मन में आते हैं।

प्राचीन भारतीय संस्कृति, हिन्दू शास्त्रों में जीवन के अंतिम दिनों में पुरूषार्थ के माध्यम से भक्ति, त्याग और तपस्या करने की बात कही गई है। ये तभी सम्भव है जब हम एक नारी की तरह ईश्वर से अनुराग करें। इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ ईश्वर ही पुरूष है और पूर्ण समर्पण के लिये हमें नारी रूप धारण करना ही होगा। लेकिन समलैंगिक सम्बन्ध में न प्रेम है, न ह्वदय है, न आस्था है और न ही मोक्ष है। सात पीढियों के तžवों की बर्बादी से जीवन में सुख को ग्रहण लग जाता है। अगले जन्म में भी ये हमारा पीछा नहीं छोड़ता है और हम समलैंगिक चक्र में फंस जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति के किसी अन्य जीव में देखा नहीं गया है। इससे किसी जन्म में मुक्ति नहीं है और न ही वर्तमान में किसी तरह की सामाजिक छवि।

ऋषभदेव से पहले लड़का-लड़की एक साथ जन्में तो उसे युगलिया कहते थे। उन्हीं भाई-बहन की आपस में शादी हो जाती थी। आदिम जातियों में यह समझ नहीं थी कि भाई-बहन में विवाह न हो। उनके लिए तो एक लड़का-एक लड़की होता था। उनके लिए तो ये बस युगलिया थे। विवाह पद्धति ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती ने स्थापित की। ऋषभ ने असि, मसी, कृषि, शिल्प और वाणिज्य के विषय परिष्कृत किए। शादी की प्रथा होने के बाद भाई-बहन के विवाह होना बंद हुए।

यम-यमी संवाद में इसका उल्लेख है। यम नाम का भाई यमी नाम की बहिन से कहता है आओ हम शादी कर लें। यमी मना कर रही है कि नहीं, भाई-बहन की शादी नहीं हो सकती। ये संवाद-सूत्र ऋग्वेद में हैं। समलैंगिकता के बारे में वैदिक साहित्य-पुराण, उपनिषदों में उल्लेख नहीं मिलता। इसका कोई पर्यायवाची शब्द भी संस्कृत में नहीं मिलता। लेकिन यह बात भी केवल पुरूषों के आपसी सम्बन्धों पर लागू होती है। महिलाओं पर लागू नहीं होती। एक पुस्तक भी अंग्रेजी में उपलब्ध है-इनवेजन आन द सेक्रेड(पवित्र पर आक्रमण) 600 पेज की किताब है यह। इसमें पश्चिम के लोगों ने रिसर्च की है। इसमें कई बेहूदा बातें लिखी हैं।
हमारी संस्कृति में सेक्स का सम्बन्ध काम पुरूषार्थ से है। काम पुरूषार्थ या रति का प्रयोजन सन्तति उत्पन्न करना है। रघुवंशी राजा सन्तति के लिए गृहस्थ में प्रवेश करते थे। राजा भोग के प्रयोजन से क्या करते थे यह व्यवहार की बात अलग है, रति का प्रयोजन सन्तति रहा, यह बात प्रमुख है।

समलिंगी गुण रसाभास है। श्रृंगार रस नहीं है इसमें, यह रस का आभास है। साहित्य शास्त्र विपरीत रति को भी रसाभास कहता है। इसी तरह पशु-पक्षियों के साथ सम्बन्ध को भी रसाभास कहा है। साहित्य का ही आधार है जिससे हम कह सकते हैं कि यह व्यवहार हमारी परम्परा का नहीं है। इसको कहीं भी हमने श्रृंगार या रति नहीं माना। काम पुरूषार्थ नहीं माना। ऎसा संसार में होता है जिसे हमने रसाभास लेबल दिया। लगता है कि इसमें प्रेम हो रहा है वस्तुत: यह प्रेम का स्वरूप नहीं है। – क्रमश:

-गुलाब कोठारी

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