Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 20, 2014

समलैंगिकता-2

ग्रंथों में कुंआरे मातृत्व के उद्धरण तो मिलते हैं, पर समलैंगिकता के उदाहरण नहीं मिलते।

पुरूष-पुरूष के सम्बन्धों का उल्लेख मध्य युग/ प्राचीन काल में नहीं मिलता है। लेकिन रसाभास का अंकन हमारे मन्दिरों में काफी पहले हुआ है। पशुओं के साथ ऎसा अंकन मूर्तियों और चित्रों में है। सैनिक छावनियों में, सैनिकों के साथ यह स्थिति बनी रही है। जीवन में उन अंशों को ढूढें जहां स्त्री की उपलब्धता नहीं है। वहां पुरूष सम्बन्धों की स्थिति मिलेगी। उदाहरण के लिए कथकली, भरतनाट्यम, ओडिसी जैसे नृत्य विधाओं में देखें। इसमें भी ख्याल-नौटंकी की भांति एपिक्स हैं जो लम्बे समय तक प्रदर्शित किए जाते हैं। महिलाएं इसमें वर्जित हैं। क्योंकि रजस्राव के दौरान महिलाएं मन्दिर में नहीं जाएंगी। ऎसे में महिला कलाकार हों तो प्रदर्शन कभी एक महिला के कारण, कभी दूसरी-तीसरी महिला के कारण रूक जाए या प्रभावित होगा ही। अत: इन सब विधाओं में महिला की वर्जना रही। एक-एक माह चलने वाली कथाएं होती हैं, ऎसी जगह पर इस तरह की स्थितियां उत्पन्न होने की बात समझी जा सकती है। सैनिक छावनी और सीमा पर तैनात फौजियों में भी महिलाएं वर्जित रही। धर्म के रहनुमाओं के मामले सुने जाते है। उपनिषद में सत्यकाम की कथा भी बिलकुल ऎसी ही है। जाबाली दासी के बच्चा हो गया। शिक्षा के लिए गुरूकुल में प्रवेश के लिए बच्चा गया तो आचार्य ने पूछा पिता का नाम बताओ। वह मां के पास गया। जाबाली ने पुत्र से कहा कि गुरूजी से कह दो कि मैं दासी हूं, अनेक घरों में विचरण करती थी। मुझे मालूम नहीं कि तुम्हारा पिता कौन है। तुम यह कहो कि मेरी माता का नाम जाबाली है तो मैं जाबाल हूं। बच्चे ने गुरूजी के पास जाकर यही कहा। तो गुरूजी ने सुन कर ये व्यवस्था कर दी कि जो मां इतना सच बच्चे के साथ बोल सकती है और जो बच्चा इतनी सच बात बोल सकता है तो यह बच्चा ब्राह्मण का ही होना चाहिए। ये सत्य की बात कह रहा है इसलिए इसका नाम अब सत्यकाम है। अत: सत्यकाम जाबाल उसका नाम रखा और गुरूकुल में प्रवेश दिया।

उपनिषद ने सम्भव है कि यह उद्धरण देकर किसी सिद्धान्त पक्ष को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। जीवन में ऎसी कई अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती है तो उनको कैसे देखा जाए, इसका कोई प्रतिपादन किया लगता है। इस घटना में यही सिद्धान्त निकला कि “सत्य बोलने की हिम्मत” यह ब्राह्मण (अर्थात जो ब्रह्म का चिन्तन करे) का लक्षण है। ऎसी घटनाओं का उल्लेख तो हमारे ग्रंथों में है लेकिन समलैंगिकता के उदाहरण नहीं मिलते। कुंआरे मातृत्व के उद्धरण भी मिलते हैं। कुन्ती कुंआरी थी लेकिन कर्ण को जन्म दिया। फिर पांच पुत्रों का भी जन्म हुआ।

समलैंगिकता के पक्षधर ये सवाल करते हैं कि इससे संस्कृति का ह्रास कैसे होगा, यह बताएं। उनके जवाब के लिए रसाभास ही उदाहरण बनेगा। पिछले दो हजार वर्षो के उपलब्ध चित्रों में चीन एवं जापान के चित्रों में इस प्रकार का अंकन परवर्ती काल का भले ही मिल जाए लेकिन हमारे यहां (परवर्ती समय को छोड़कर) समलैंगिकता को दर्शाते चित्र नहीं है।

इस प्रवृत्ति के दो ही कारण हो सकते हैं-या तो स्त्री उपलब्ध ना हो अथवा समाज की तरफ से स्त्री-पुरूष संसर्ग पर प्रतिबन्ध हो। जो ठीक रास्ता है उससे जब व्यक्ति संसर्ग कर ही न पाए तो फिर कोई कृत्रिम रास्ता अपनाता है। जैसे यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मर्द गायब हो गए, युद्ध में काम आ गए। उससे उपजी वेश्यावृत्ति का तो यूरोप में अब तक निपटारा नहीं हो पा रहा है। हर सभ्यता में युद्ध प्रवृत्त आदमी ने यही रास्ता निकाला। हमारी औरत दूसरी कौमों में जाएं, उससे तो बेहतर है कि हम ही चार-चार औरतें रख लें। ऎसे कानून इसी तरह की स्थितियों से भी तो बनते हैं। लेकिन इससे यह हुआ कि औरत की हैसियत खत्म हो गई। वह उपयोग की वस्तु हो गई। यही हाल यूरोप का है। एक आदमी चार-चार बीवियां बदल लेता है। कारण है उपलब्धता। बिन मांगे मिल रही हैं, तो उस की कीमत ही नहीं रह जाती।

वस्तुस्थिति यह है कि ब्रह्मचर्य को हमने खूब महिमा मण्डित कर रखा है। जैनों में, ब्राह्मणों में, बौद्धों में भी। ईसाइयों में भी। लेकिन भोग मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है-एकोअंह बहुस्याम। उसका कोई वैकल्पिक मार्ग का सीधा फार्मूला किसी के पास नहीं है। सारे लोग इससे कुण्ठित हो गए है। रजनीश आदि कई विद्वान बोलते रहे हैं। खोज करें कि क्या इन्होंने सेक्स के उदात्तीकरण की कोई बात की है? या जैनों में कहीं ऎसा कोई मार्ग सुझाया है! सबने यही डण्डा सिर पर ठोका है कि ब्रह्मचर्य का पालन करना है। जो प्रवृत्ति है उसे आप कैसे रोकेंगे। उसका कोई उपाय आपके पास है? उपाय कोई दिख नहीं रहा। ऎसे में वही जानना ठीक लगता है कि वैदिक ऋषियों के भी पत्नियां होती थी। वे कुंआरे नहीं थे। उनके बच्चे-परिवार सब थे। बल्कि दूसरे ऋषि से भी मांग लेते थे कि तुम्हारी पत्नी कुछ काल के लिए दे दो क्योंकि मुझे बच्चा चाहिए। नियोग प्रथा भी थी। इसलिए मनुस्मृति में मनु का श्लोक है कि जो केवल संतान के लिए पति, पत्नी का संसर्ग करता है वह ब्रह्मचारी ही है। प्रकृति को आप नकार नहीं सकते। साधु-संत, नन-पादरी आदि जिन्हें कुंआरा रहना होता है वे भी इसमें फंसे रहते हैं। निश्चित है कि आप प्रकृति की हूक को कहीं न कहीं तो शान्त करोगे। किसी भी विचार को, भाव को आप जितना ही दबाते चलेंगे, एक सीमा के आगे वह दबेगा नहीं। जैसे ही मौका मिलेगा, विस्फोट होगा। जैसे स्प्रिंग में उछाल आता है। ये सारे कथित धर्मात्मा बरसों तक उसे दबाते जाते हैं कि मुझे यह नहीं करना। कभी मौका मिला भी तो ऎसे सन्नद्ध हो जाते है कि फिर छूटता ही नहीं। व्यक्ति का सारा व्यवहार भी असामान्य हो जाता है। क्योंकि आप प्राकृतिक रूप में उसको जी ही नहीं रहे हो। साधु-साघ्वियों की भांति ही कई संघों में भी तो प्रचारक को विवाह नहीं करना होता। सभी एक ही भांति के लगते हैं-अभाव ग्रस्त। एक ही उत्तर समझ में आता है कि जीवन में खुद के प्रति आस्था होना। जो कुछ मैं कर रहा हूं वह पूरी समझ और आस्था के साथ कर रहा हूं। इसी में धर्म-कर्म सभी आ जाएगा। इसमें मेरा भी अभ्युदय है और दूसरे का भी। -क्रमश:

-गुलाब कोठारी

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