Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 22, 2014

समलैंगिकता-3

संसार में सारे रिश्ते निभा लेना सरल है, पति-पत्नी का रिश्ता निभाना सबसे कठिन है।

यौनाचार बुरा है यह सब बोल रहे हैं लेकिन सीमाकरण या निषेध कैसे किया जाए इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। हम तो यह भी तय नहीं कर पा रहे कि बुरा है या बुरा नहीं है। कुदरत ने बनाया है, बुरा कैसे हो सकता है। आपको वे परिस्थितियां परिभाषित करनी पडेंगी कि इन स्थितियों में बुरा है। सही पूछें तो समलैंगिकता का झगड़ा यही है। आप साबित करें कि इस परिस्थिति में बुरा है तब छोड़ देंगे, पर पहले आप इस बात से सन्तुष्ट करें कि बुरा क्यों है।

पुरूष से पुरूष के सम्बन्ध का तो कारण दिखता है लेकिन स्त्री से स्त्री की समलैंगिकता का अर्थ क्या है! अब तो वैध शादियां भी हो रही हैं। बाकायदा मैरिज एक्ट में स्त्री की स्त्री से शादी हो रही है। इसे क्या हम सद्बुद्धि मानें! प्रश्न इतना है कि इसमें जीवन का कहीं भी अभ्युदय नहीं दिख रहा। जिन घरों में वे रहती हैं वहां से मोहल्ले में, बाहर कैसे निकलती होंगी। आदमी तो वहां भी वही बैठा है, भीतर से आदमी वही है। समाज की दृष्टि से नियंत्रण तो कहीं न कहीं चाहिए ही।

एक के बाद एक पत्नी बदलने के मामले भी देखें। सवाल यह है कि आप जिसे घर में लेकर आए हो उसको तो आप भूल बैठे हो और जो घर में नहीं है उसके लिए भाग रहे हो। लड़ाई होगी। दोनों में से एक को जाना होगा। तब आप दूसरी ले आए। तब तक आपकी नजरें अगली के लिए उत्सुक हो जाती हैं। यह भी विचारणीय है कि ऎसा करने वाले बड़े लोगों में शुमार हैं। इनके ऎसे समाचार आते हैं। इसका हम सामान्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि समलैंगिकता का सवाल भी तो वहीं से नीचे उतर रहा है। नीचे से ऊपर प्रश्न थोड़े ही जा रहा है। आज भी जो हाय-हाय मची है यह उसी उच्च और उच्च मध्यम वर्ग में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी हो हल्ला तो उच्च वर्ग में हो रहा है। मध्यम वर्ग वाले तो बहुत खुश हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बढिया फैसला किया। नीचे वाली क्लास को कोई मतलब ही नहीं होता। मूल प्रश्न तो यह है कि इस परिस्थिति में कोई कानून बनाने की जरूरत क्या है। रजामंदी से कोई किसके साथ क्या करता है, करे। आज हर घर में पति-पत्नी रह रहे हैं। किसी को क्या लेना-देना कि क्या हो रहा है। तब इस मामले में कानून की क्या जरूरत है। कानून तो विवाद की स्थिति में जरूरी होता है। सहमति से जो हो रहा है उसमें विवाद हो ही नहीं सकता।

हां, कानून की जरूरत वहां आ गई कि दो समलिंगी आकर कहें कि हम शादी कर रहे हैं तो मैरिज रजिस्ट्रार उसे रजिस्टर करे या न करे। यहां कानून बताएगा कि क्या पुरूष-पुरूष की भी शादी होती है। उसे कानून के प्रकाश में ही तो पता करना पडेगा कि यह वैध है या अवैध।

एक तर्क तो यह भी था कि 25 लाख व्यक्ति अगर देश में हैं तो क्या आपको नहीं लगता कि वे अपनी मर्जी से जीने चाहिए! पच्चीस लाख आदमी एक काम को कर रहे हैं तो क्या उनको कानून का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए!

मनुष्य ने निर्णय लिया कि विवाह नाम की एक संस्था बने। यह संस्था भी वैश्विक है। जब यह तय हुआ होगा तब कोई प्रचार साधन नहीं था, मीडिया नहीं था। इसके बावजूद पूरी दुनिया में एकसाथ लागू हो गया। आज तक यह विवाह संस्था एक जैसी है। आज भी सभी लड़कियां विवाह करके लड़के के घर जाती हैं। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। इतना बड़ा अनुशासन कैसे पूरी दुनिया में फैल गया! वह भी बिना किसी मीडिया के! इस बात पर पूरी दुनिया के विभिन्न समाज एक हैं। ऎसा संभव कैसे हुआ कि एक ने चिन्तन किया कि पति-पत्नी विवाह कर साथ रहें और पूरी दुनिया में यह फैल गया। पहुंचा कैसे। इसके साथ फिर परिवार संस्था बनी विवाह के आधार पर। इस आधार पर यदि समलिंगी को देखें तो रति का आभास है यह तो एक बात है लेकिन समलिंगियों के विवाह हो जाने पर परिवार थोडे ही बनता है! सन्तति कहां है, परम्परा कहां चलती है। परम्परा तो स्त्री-पुरूष से ही चलेगी।

हम देखें कि कारण क्या हैं! किसी भी समुदाय में ये चीजें घट-बढ़ रही हैं तो उसके पीछे कोई कारण क्या है। जो पुरूष एक बार इस पटरी पर चढ़ गए तो फिर उन्हें नारी का संसर्ग अच्छा ही नहीं लगेगा। लड़के फिर शादी ही नहीं करते। दूसरे, इसमें रिश्तों की कहीं कोई रूकावट भी नहीं। जैसे घरों में भाई-बहिन का रिश्ता है तो एक सीमा है। इस प्र्रवृत्ति में वह भी कुछ नहीं है। कुल मिलाकर इस विषय में कुछ बिन्दु विचारणीय हैं।

  1. जिसे हम पितृ ऋण कहते हैं उसके अर्थ में बोलचाल की भाषा में कहें कि मनुष्य जाति की निरन्तरता बनी रहनी चाहिए। यह निरन्तरता दम्पति से ही हो सकती है। कल यदि यह निर्णय ले लिया जाए कि समलिंगी व्यवहार ही आदर्श व्यवहार है तो सौ साल के बाद मनुष्य जाति ही समाप्त हो जाएगी। अगली पीढ़ी कहां से आएगी। एक ही पीढ़ी में सब खत्म!
  2. मनुष्य का मनोविज्ञान अपने से विपरीत के द्वारा ही परिपूरित होता है, समान से नहीं। विज्ञान की “काम्प्लीमेंटेरिटी” विरोधी के साथ है। समान ध्रुवों में तो विकर्षण होता है।
  3. आदमी का निखार और मनुष्य की सहिष्णुता का आधार, वह कसौटी जहां आदमी को परखा जाए, वह विरोधी के साथ है। जो अपने जैसा ही है उसके साथ नहीं है।

संसार में सारे रिश्ते निभा लेना सरल है, पति-पत्नी का रिश्ता निभाना सबसे कठिन है। क्योंकि दो छोर, दो ध्रुव अलग-अलग होते हैं। यहीं पर मनुष्य की असली परीक्षा होती है। मैं सारे संसार से मधुर व्यवहार कर सकता हूं, पत्नी के साथ मेरा क्या व्यवहार है-वही कसौटी है कि सचमुच मैं खड़ा कहां हूं। सारी मधुरता सरल है, वहां (पत्नी के साथ) मधुरता कठिन है। एक कथन भी प्रचलित है, कहते हैं कि सन्तान नहीं हुई तो तू नरक में जाएगा। अभिप्राय यह है कि कसौटी पर मैं पूरा कसा ही नहीं गया जब तक कि पत्नी के सम्बन्ध में मैं पति रूप में नहीं हुआ। पुरूष की और स्त्री की भी वरना परीक्षा ही नहीं हुई। दोनों अपूर्ण ही रहे।
-क्रमश:

– गुलाब कोठारी

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