Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 22, 2014

समलैंगिकता-4

पाप-पुण्य का सम्बन्ध सुख-दु:ख से नहीं हैं, आत्मा की मलिनता और निर्मलता से है।

स्त्री-पुरूष की एक विशेष संरचना है। वही संरचना प्रजनन क्रिया को जन्म देती है। आकर्षण भी उसी प्रक्रिया से होगा। विपरीत भाव में ही आकर्षण होगा। इसका मनोविश्लेषण यूं भी किया जा सकता है कि जब हम विपरीत से भयभीत हो जाते हैं तो समलिंगी हो जाते हैं। विपरीत से भय लगता है क्योंकि हम उसको सह नहीं पाते, पचा नहीं पाते। समान से भय नहीं लगता है। क्योंकि वह मेरे जैसा ही है तो कोई डर की बात नहीं है।

यह भाव तो तब है जब दो बराबरी की समझ वाले आपस में समझौता कर आगे बढे लेकिन बच्चों को बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। इन बच्चों को जीवन निर्माण के मार्ग पर बढ़ाने के बजाय पटरी से उतार रहे हैं और वह भी किस उम्र में! उनकी उम्र तो सोचने की भी नहीं है। फिर धीरे-धीरे वे सिगरेट-शराब भी पीना शुरू कर देंगे। उसे ये सब चीजें सिखा दोगे तो बच्चा भाग कर पास आएगा इन लतों के वशीभूत होकर। तो यह तो समाज का विघटन ही हो रहा है। सारे धर्म पतित हुए इस एक कर्म से। स्कूली बच्चों को फुसलाकर उनका आचरण भंग कर रहे हैं। संस्कृति का अपभ्रंश होता दिख रहा है। ये बच्चे बड़े होकर क्या करेंगे।

स्त्री-पुरूष जब आपस में जुड़ते हैं और संतान होती है तो उसके साथ एक दायित्वबोध भी जुड़ता है। जब दो समान व्यक्ति जुड़ते हैं तो कोई दायित्वबोध तो है ही नहीं। जब तक साथ हैं तब तक हैं। उसके बाद कोई दायित्व न इस पर है न उस पर। इसमें न यज्ञ है, न निर्माण है और न ही दायित्व का बोध ही है। और न पूर्णता है। कभी जैन साधुओं के बीच यह विचार रखना चाहिए कि ये पांचों जो व्रत हैं उनकी प्रक्रिया एक जैसी नहीं है। अहिंसा अलग तरह का व्रत है और ब्रह्मचर्य अलग तरह का व्रत है। इस अर्थ में अहिंसा अलग है कि आप अगर मुझे चांटा मारें तो मुझे दु:ख होता है कि आपको मुझे चांटा नहीं मारना चाहिए। लेकिन ब्रह्मचर्य में क्या होगा कि आप अगर मेरे साथ सहचर्य करोगे तो मुझे भी आनन्द आता है, आपको भी आनन्द आता है। अब इसमें क्या बुराई है। अत: यह ब्रह्मचर्य का मामला अहिंसा से अलग तरह का है। इसमें दोनों पक्ष को सुख होता है। दु:ख तो किसी को होता ही नहीं। फिर इसको क्यों निषेध किया जा रहा है। आप मुझे सुई चुभाओं मैं आपको सुई चुभो दूं तो दोनों को दु:ख है। लेकिन आपसी समझौते से सहचर्य से तो दोनों को सुख है। यहां क्या कसौटी लगाएंगे कि ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, इसका क्या कारण दोगे? समलैंगिकता के मामले में भी तो यही कहा जा रहा है कि आपस में सहमति से कर रहे हैं तो किसी को क्या लेना-देना!

पाप-पुण्य का सम्बन्ध सुख-दु:ख से नहीं हैं, आत्मा की मलिनता और निर्मलता से है। दोनों को सुख मिल रहा है यह अलग बात है लेकिन दोनों की आत्मा मलिन हो रही है। इस कारण यह निषिद्ध है। दु:ख और सुख तो आत्मा का विषय ही नहीं है। अनुभूति वहां तक जाती ही नहीं है। इसीलिए जैनों ने बड़ा स्पष्ट कहा है, उन्होंने राग को पाप माना। दु:ख-सुख का इससे सम्बन्ध नहीं है। आसक्ति पाप है। दोनों को सुख हो रहा है या दु:ख हो रहा है इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए अब्रह्म का सेवन, जिसको महामोह कहा, वह सबसे अधिक आसक्ति पैदा करता है। खाने-पीने की, कपड़े-लत्तों की भी आसक्ति होती है लेकिन सबसे बड़ी सम्भोग की आसक्ति है। यह इसलिए क्योंकि “एकोहं बहुस्याम” दोनों का स्वभाव है। यह दोनों की प्रकृति है।

इतिहास में मंच से ब्रह्मचर्य पर बोलने वाले राजनेताओं में महात्मा गांधी आखिरी व्यक्ति हुए। उनके बाद ब्रह्मचर्य का नाम अब कोई नहीं लेता। अहिंसा-अहिंसा तो खूब चिल्लाते हैं, ब्रह्मचर्य का नाम ही लेना अब बन्द कर दिया है। गांधीजी तो ये भी कहते थे कि भाई मामला टेढ़ा है, मैं भी फिसल गया हूं। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि कोई आदमी ब्रह्मचारी रहना चाहे तो मुश्किल काम है। बहुत कठिन है। इसलिए यह नहीं कहा कि आजन्म ब्रह्मचारी रहो। इतना ही कहा कि ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो।

अन्न से सप्तधातुओं के निर्माण के बाद मन और ओज का निर्माण होता है। वीर्य संचयन से इसकी महत्ता बताते हैं। इसके अभाव में ओज का क्षरण ही होगा। ये तो अन्न की फिर भी भौतिक उपलब्घियां हैं। शुक्र भी भौतिक अनुभूति है, ओज को भी भौतिक उपलब्घि कह रहे हैं। इससे जो बन रहा है वह भी भौतिक है।

दो के आपसी सहमति के मामले में समाज को दो प्रकार का कष्ट है-प्रथम तो यह कि ये दोनों व्यक्ति भी समाज का हिस्सा हैं। समाज का दायित्व बनता है कि उनको पतित होने से बचाए। वे अगर गलत रास्ते पर जा रहे हैं तो मेरा भी दायित्व बनता है कि मैं उनको रोकूं। आखिर विवाह संस्था भी तो इसलिए बनाई गई है। आपसी सहमति से दोनों अगर कुएं में गिर रहे हैं तो मेरा दायित्व है कि उन्हें रोकूं। आखिर मैं भी तो समाज का हिस्सा हूं और वे भी हैं। दूसरी बात कि उन दोनों के इस व्यवहार से शेष समाज पर क्या असर पड़ रहा है। आज तो वो जो भी करते हैं उसकी घोषणा करके करते हैं। छुपाकर भी नहीं कर रहे। तो उसका मेरे बच्चों पर क्या असर पड़ेगा।
-क्रमश:

-गुलाब कोठारी

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