Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 24, 2014

समलैंगिकता-5

दुनिया में कोई विचारधारा ऎसी नजर नहीं आती जहां संयम की बात न की गई हो।

सारे संसार में सबसे सरल और सहज सुख प्राप्ति का उपाय सेक्स है। अन्य कार्यो में तो सुख के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पैसा कमाने में मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन यह प्रकृति का दिया आपके पास ऎसा धन है कि आप उसका उपयोग कर रहे हैं और आपको आनन्द आ रहा है। इसलिए संसार की सारी परम्पराओं में संयम की बात की गई है। उस संयम का क्या प्रयोजन है। संयम का प्रयोजन मनुष्य को पुरूषार्थी बनाना है। तू मुफ्त में मत खोज कुछ-यानी पुरूषार्थी बन! इसका प्रभाव व्यक्ति पर, परिवार पर, समाज पर और राष्ट्र तथा पूरी मानव जाति पर पड़ता है। क्या मानव जाति को भोग विलास के प्रवाह में लाकर पुरूषार्थहीन बनाना चाहते हैं!

आचार्य महाप्रज्ञ ने उपनिषद के आधार पर कहा-ये सेक्स की प्रक्रिया हमारे नर्वस सिस्टम पर क्या प्रभाव डालती है। नर्वस सिस्टम को शिथिल बनाती है। इस शिथिलता के कारण हम संसार के झंझावतों को सहन करने में असफल होते हैं। हर आत्महत्या के पीछे नर्वस सिस्टम की वीकनेस होती है। नर्वस सिस्टम मजबूत होगा तो व्यक्ति आत्महत्या नहीं करेगा, मुसीबत को सहन करेगा। सामना करेगा उसका। नर्वस सिस्टम के कमजोर होने में भोग बड़ा कारण है। कठोपनिषद में कहा है-“सर्वेन्द्रियाणाम् चरयन्ति तेजो।” भोग इन्द्रियों के तेज को क्षीण करता है। इन्द्रियों के तेज क्षीण होने का मतलब व्यक्ति का ही तेज क्षीण हो गया। इन्द्रियों का तप गायब हो गया। वही तप संयम है। संयम और तप पर्याय हैं। दुनिया में कोई विचारधारा ऎसी नजर नहीं आती जहां संयम की बात न की गई हो। चाहे वह विचारधारा राजनीतिक हो, सामाजिक हो अथवा धार्मिक हो। मार्क्सवादी भी संयम की बात करेगा। उच्छृंखलता का तो कहीं सवाल ही नहीं, वरना समाज ही नहीं बनेगा।

मनु ने एक श्लोक और दिया-“न मांसभक्षणे दोष: न मद्ये न च मैथुने प्रवृतिरेषभूतानां निवृत्तिस्तुमाफला।” मांस भक्षण में कोई दोष नहीं। मद्य-मैथुन में भी कोई दोष नहीं क्योंकि यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। लेकिन इस में संयम बरतना, उसका बहुत बड़ा फल है। इन तीनों में यज्ञ की दृष्टि से हमने क्या किया। शास्त्रों में मनुष्य के मांस भक्षण की जो प्रवृत्ति है उसे यज्ञ तक सीमित कर दिया। कहा कि यज्ञ में पशु आलम्बन होगा उससे जो मांस लिया जाएगा, वहीं लिया जाएगा। यज्ञ के बाहर मांस नहीं लिया जाएगा। अत: मांस भक्षण की प्रवृत्ति का सीमाकरण हुआ यज्ञ में पशु आलम्बन से। मद्य के लिए कहा-“सौत्रामण्याम् सुरा पिबेत।” सौत्रामणि यज्ञ होगा तभी शराब पिएगा। इससे पहले या बाद में नहीं पिएगा। मैथुन का नियंत्रण विवाह संस्था से किया। यह पति-पत्नी के बीच सन्तान उत्पत्ति के लिए होगा, उससे बाहर नहीं होगा। यह मानकर कि मनुष्य में ये सहज होते हैं, वैदिक परम्पराओं में इनका निषेध नहीं किया। एक प्रतिशत की अनुमति देकर निन्यानवे प्रतिशत को रोका। पशु व्यवहार से मनुष्य को रोका। सभी परम्पराओं में, चाहे वह कोई भी विचार धारा हो-यह पशु प्रवृत्ति रोकना मूल बात है। असंयम से “सिस्टम” कमजोर हो जाता है, भंग हो जाता है और आदमी कायर-भीरू हो जाता है।

आजकल यह जो चल रहा है कि स्त्री और पुरूष ने तीन-चार बार तलाक दिए और अब फिर किसी अन्य के साथ हो लिए। यह एक प्रकार की सामाजिक अराजकता है। ऎसी अराजकता अन्य जीवों में-पशु-पक्षियों में भी सामान्यत: नहीं मिलती। वहां भी प्रजनन के उद्देश्य से सम्बन्ध बनते हैं। कुछ जीवों में अंग भंग या अंग विच्छेद होने पर टूटा हिस्सा नए जीव में विकसित हो जाता है। कुछ जीवों में नर-मादा की भूमिका एक ही शरीर में सम्पन्न हो जाती है। लेकिन समान जीवों में नर-नर अथवा मादा-मादा में संसर्ग के उदाहरण नहीं मिलते। उच्छृंखल, प्रकृति विरोधी व्यवहार के परिणाम में यौन रोगों सहित अन्य व्याधियां भी भोगनी पड़ती है।

चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से न्यूरोलाजिस्ट और साइकियाट्रिस्ट, साइकोलोजिस्ट यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वे सामान्य यौन व्यवहार और असामान्य यौन व्यवहार के मामलों में पड़ने वाले प्रभावों के अन्तर को किस तरह देखते हैं। वे असामान्य व्यवहार वालों की मानसिकता में क्या अन्तर पाते हैं। – क्रमश:

– गुलाब कोठारी

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