Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 25, 2014

समलैंगिकता-6

ब्रह्मचर्य का अर्थ मनोभावों का नियंत्रण होता है। इसी से ओज पैदा होता है।

आत्मा के संस्कारों को भी समझने की आवश्यकता है। क्या कारण है कि एक शरीर का आत्मा उसी तरह के शरीर वाले आत्मा की ओर आकर्षित हो रहा है। दोनों ही प्रकृति दत्त ही तो है। वे आपस में आकर्षित कैसे हो रहे हैं? यज्ञ के सिद्धान्त के विपरीत प्रकृति कैसे काम कर रही है? आकर्षित होने का (बाहर दिखने वाला) एक कारण तो यह है कि समाज की तरफ से स्त्री-पुरूषों के मिलने पर तो रोक लगी रहती है। पुरूष और पुरूष के तथा स्त्री और स्त्री के मिलने पर कोई रोक नहीं है। तो समलैंगिकता सहज सुलभ हो जाती है। विषमलिंगता सहज सुलभ नहीं होती। एकान्त में दो पुरूष आपस में बैठे हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन एक स्त्री और एक पुरूष बैठे हैं तो समाज सवाल करेगा कि अकेले में क्या कर रहे हैं ये लोग। स्त्री-पुरूष की निकटता पर जो रोक लगी है तो उस पर पुरूष सोचता है कि पुरूष-पुरूष की निकटता पर ऎसी कोई रोक ही नहीं है। तब अपनी इच्छा यहां पूरी करो। अत: यह कारण बन जाता है ऎसे सम्बन्धों का। स्त्री-पुरूष की निकटता पर रोक का भी कारण है कि वहां प्रजनन हो सकता है। इस खतरे के कारण रोक है।

दुनिया में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों में भी क्या हो रहा है-अमरीका-फ्रांस-इटली के प्रसंग सामने आए हैं। भोग का ऎसा स्वरूप सत्ता से जुड़ा हुआ है। भोग ही सत्ता का पर्यायवाची है। इस समस्या का समाधान कहीं नजर नहीं आता। ध्यान का मार्ग भी सुझाया जाता है-समाधान के तौर पर। लेकिन ध्यान भी प्रतिक्रिया कर जाता है। आप तीन दिन ध्यान करें उसके बाद तीन दिन भोग की तीव्र इच्छा होगी। क्योंकि आपका ध्यान प्रकृति की प्रवृत्ति को दबाने में व्यस्त था। जैसे ही आपने दबाने के प्रयास हटाए तो एकदम विस्फोटक प्रतिक्रिया हुई।

आज हम ध्यान में “कांशियसली”-प्रवृत्ति को दबाने का प्रयास कर रहे हैं और इसे ध्यान कह रहे हैं! यह ध्यान नहीं है-“सपे्रशन का”, दबाने का प्रयास है। ऎसे ही ध्यान से भोग सम्बन्धी व्यभिचार भी निकलते हैं। ओशो जैसे संत-विचारक बदनाम ही इसलिए हुए कि उनके “ध्यान” का विचार केन्द्र ही खुलेआम यही था। जहां भावनाओं का प्रवाह एक पक्षीय हो, व्यक्ति का निर्माण बुद्धि से नही बल्कि दिल से निर्देशित हो, वहां भी व्यक्ति प्रवाह पतित हो जाता है। संगीत-नृत्यादि कलाओं के क्षेत्र में ऎसे उदाहरण मिल जाते हैं। क्या चित्त की दशा और दिशा पर भी ग्रहों का प्रभाव पड़ता होगा? क्या प्रभाव से प्रारब्ध का भी सम्बन्ध है? क्योंकि इस दशा का प्रभाव प्रत्येक दिशा में पड़ता है। सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। पूरा वातावरण ही कम्पायमान हो जाता है। इस दशा का मूल कारण वासना होती है। काम-क्रोध जैसे नकारात्मक प्रकरण वासना रूप ही हैं। इनमें ब्रह्मचर्य का अभाव किसी भी साधन की सिद्धी नहीं होनेे देता। जितने भी सूक्ष्म (अक्षर) देवी अथवा व्यावहारिक प्रभाव हैं, वे सर्वप्रथम पूर्ण संयत वीर्य में ही अपना असर पैदा करते हैं। “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्य लाभ:”-योग सूत्र। ब्रह्मचर्य से अशक्य कार्य भी किए जा सकते हैं। भीष्म, हनुमान जैसे पुरूष इसी के उदाहरण हैं। वेद विद्या सरस्वती भी ब्रह्मचारिणी रूप में ही उपास्य है। इसीलिए विद्यार्थियों के लिए भी ब्रह्मचर्य अनिवार्य कहा है।

ब्रह्मचर्य का विनाश ही वेद विद्या के लोप होने का कारण रहा है। कामुक व्यक्ति के पास वेद विद्या नहीं रह सकती। जैसे प्रकाश और अंधकार विरोधी होते हैं। दतिया स्वामी ने लिखा है कि आलस्य, प्रमाद, कुचेष्टा आदि दुर्गुण ब्रह्मचर्य के अभाव में ही उत्पन्न होते हैं। धैर्य का भी नाश होता है। अत: गम्भीर और विचारात्मक भावों से जुड़े कार्य हैं, वे कामुक व्यक्ति नहीं कर सकते। शिक्षा के साथ ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध अग्नि और दाह की तरह है, नित्य है। साधक के पतन का कारण कामिनी है। “मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्” वीर्य का धारण ही जीवन है और बिन्दु का पात ही मरण है। ब्रह्मचारी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मचर्य के अभाव से सद्विद्याओं का लोप, निर्लज्जता का आधिक्य होता है। “कामातुराणां न भयं न लज्जा।” ब्रह्मचर्य ही निर्भयता का सूत्र है। निर्भयता का अर्थ उच्श्खलता नहीं है, स्वतंत्रता भी नहीं कह सकते। ब्रह्मचारी को पूर्ण स्वातं˜य प्राप्त होता है। आपत्तियों को सहन करना, संघर्ष करने की क्षमता ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। इन्द्रिय निग्रह ही वीरता का प्रमाण है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ मनोभावों का नियंत्रण होता है। इसका परिणाम शुक्र संग्रह भी है। इसी से ओज पैदा होता है। ओज से मन का निर्माण होता है। मन में ही इच्छाएं पैदा होती हैं। इच्छाओं की पूर्ति ही जीवन का विकास है। इच्छाओं की गुणवत्ता, गंभीरता ओज तथा मन के स्वरूप पर निर्भर करता है। समलैंगिकता के संदर्भ में ब्रह्मचर्य की विकृति ही प्रमुख है। यांत्रिक क्रिया के कारण मन तो मृत प्राय: ही रहता है। साथी बदलता रहे तो भी भाव में अन्तर नहीं आता। सारा क्रम निष्परिणाम होता है। इससे बड़ी विकृति क्या हो सकती है! आप बिना किसी परिणाम की कामना के कोई कार्य करें, तो ये बेवकूफी है। क्षणिक सुख, वह भी मात्र भ्रान्ति, जीवन को अर्थहीन, महत्वहीन तथा ऎश्वर्यहीन बना देता है।

– गुलाब कोठारी

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