Gulabkothari's Blog

अप्रैल 12, 2014

जैन एकता का प्रश्न… (1)

बातें तो हम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की करते हैं लेकिन देश कहीं से भी एक और अखण्ड दिखाई नहीं देता। कहीं जाति और धर्म के नाम पर, कहीं भाषा और क्षेत्र के नाम पर तो कहीं आरक्षित और गैर आरक्षित के नाम पर, हम हर तरफ से बिखरे और बंटे हुए दिखाई देते हैं। कैसे एक हों, हम कहां से और कैसे शुरूआत करें, सबके सामने यह प्रश्न बड़ा है। शुरूआत सबसे छोटी इकाई समाज से करनी होगी, फिर हम देश तक पहुंच पाएंगे। पहले एक-एक कर सारे समाज आपसी विवादों को खत्म करें, फिर समाजों को जोड़ें, इसी से राष्ट्रीय एकता की मंजिल तक पहुंच सकते हैं। राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी देश की एकता-अखण्डता से लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर खुल कर लिखते रहे हैं। जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जे पर उनके विचारों को सुनने के बाद अनेक पत्र आए हैं जिनमें जैन समाज की एकता पर उनके विचार चाहे गए हैं। कल महावीर जयन्ती है। आज प्रस्तुत है जैन समाज की एकता पर यह आलेख। एकता के यही सूत्र सभी समाजों और राष्ट्र पर लागू होते हैं।

पत्र -1

महोदय,
केन्द्र सरकार की ओर से हाल ही में जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। मैं पत्रिका के माध्यम से यह जानना चाहता हूं कि जैन एकता को लेकर आपके क्या विचार हैं। जैनों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने को लेकर आप अपने विचार से अवगत कराएं।
भानमल जैन,
टोंक फाटक, जयपुर

पत्र -2

महोदय,
जैन समाज को देश में अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। समाज को इस नई पहचान के मामले में विचारों से अवगत कराने की कृपा करें। जैन समाज की एकता पर भी प्रकाश डालें।
धन्यवाद!
पीयूष जैन,
महेश नगर, जयपुर

पत्र -3

महोदय,
देश में जैन समाज को भी अल्पसंख्यक मान लिया गया है। मन में उथल-पुथल है कि केन्द्र सरकार का यह निर्णय कल्याणकारी है या भेद करने वाला। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक वर्गीकरण ही है, इसलिए इन वर्गो में खाई की आशंका भी है। स्वयं की सोच को दिशा देना चाहता हूं इसलिए कृपया इस विषय पर अपने विचार बताएं।
धन्यवाद!
एस.सी. जैन,
बेंगलूरू

एकता हर हाल में शक्ति ही होती है। कहावत है कि बन्धी बुहारी लाख की, बिखर जाए तो खाक की।

जैन एकता की चर्चा बचपन से ही सुनता आया हूं। श्वेताम्बर-दिगम्बर की दीवार बहुत चौड़ी होती जा रही है। सम्मेद शिखर तीर्थ को लेकर कोर्ट में जो मुद्दा चला, जिस तरह राजनीति का सहारा लिया गया, उसमें जैनों के विखण्डन का सूत्रपात ही हुआ। जैनों का एक धड़ा बहुत गौरवान्वित हुआ था। पुराने-पुराने मन्दिरों में तनाव व्याप्त हो गया था। आसरों के लिए झगड़े होने लगे थे। आज भी आरक्षण के मुद्दे पर जैन समाज बंटा हुआ है। अल्पसंख्यक घोषित होने के बाद भी समाज तो दो धड़ों में बंटा हुआ ही है। एक धड़ा स्वयं संतुष्ट है, दूसरा अपमानित महसूस कर रहा है। इस दर्द को “विजयी” धड़ा महसूस भी नहीं करना चाहता। जिन मन्दिरों के नामों के साथ में दिगम्बर या श्वेताम्बर जुड़ा हुआ है, वहां उनके अपने पर्वो पर ही भीड़ लगती है। साधारण दिनों में कोई एक-दूसरे के मन्दिर में भी नहीं जाता। हमने तो यहां तक देखा है कि एक सम्प्रदाय के श्रावक अन्य सम्प्रदाय के सन्तों के दर्शन को भी नहीं जाते थे। प्रणाम तक नहीं करते थे।

आज तो जैन धर्म भी महावीर प्रधान होने के साथ व्यक्ति प्रधान भी होने लगा है। न तो आज सारे श्वेताम्बर एक आचार्य को मानने को तैयार, न ही सारे दिगम्बर एक आचार्य की निश्रा में चलने को राजी होने वाले। दर्जनों आचार्य, उनके अपने-अपने महावीर के दर्शन की व्याख्या। अपने-अपने पोस्टर, वीडियो और राजनेता। वर्ष भर में महावीर से ज्यादा उनकी जयन्तियां और समारोह। सबके साथ उनके सांसारिक स्वजन जुड़ने लगे। त्याग का स्थान ट्रस्टों ने ले लिया। सामाजिक, धार्मिक गतिविधियों में इनका सीधा दखल होने लगा है। विभिन्न बोलियों में धन इकटा करने का नजारा देखते ही बनता है। किसी ने यदि जैन एकता का अभियान चला दिया तो इन सब आचार्यो के समक्ष अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो जाएगा। मुंह से कुछ भी कह लें, मानेगा कोई नहीं। इनका अहंकार महावीर को भीतर प्रवेश ही नहीं करने देता। अत: अपने-अपने घेरे में जीते हैं।

आचार्य विनोबा भावे ने एक प्रयास किया था। जैन एकता के लिए। जिनेन्द्र वर्णी जी से आग्रह करके “समण सुत्त” लिखवाया गया। सभी मतों के जैनाचार्यो को पढ़ाया गया। उनकी सम्मति ली गई। सबने ग्रन्थ को स्वीकार किया। आज तक किसी ने उपयोग ही नहीं किया। यह स्वयं में एकता का श्रेष्ठ उदाहरण बन गया। आचार्य पद स्वयं में सत्ता सूचक भाव है। सिद्धों और अरिहन्तों को किसने देखा है। आचार्य ही शीर्ष पद है। ऎसा कई बार होता रहा है कि कोई सन्त विभिन्न कारणों से किसी सम्प्रदाय से छिटक कर नया सम्प्रदाय और नया आचार्य बना लेते हैं। अब तो आचार्य पद और भी चकाचौंध वाला होता जा रहा है। क्योंकि धर्म के साथ राजनेता और धन जुड़ता जा रहा है।

जैन समाज की नई पीढ़ी किधर जा रही है? क्या महावीर की वाणी का मर्म इसके मन में अंकित है। संस्कारों के प्रति इस पीढ़ी के मन में क्या अवधारणा है! टीवी, इण्टरनेट, मोबाइल फोन के सहारे अकेला जीना इनके स्वभाव का अंग बनता जा रहा है। कॅरियर की पकड़ जीवनशैली पर बहुत ही मजबूत है। भौतिकवाद का सपना भी इनको महत्वाकांक्षी बना रहा है। दृष्टिकोण उदारवादी होता जा रहा है। लेकिन खण्ड-खण्ड दिखते समाज की एकजुटता के लिए आवश्यक उदारता का नितान्त अभाव है। अकेला जीने वाला व्यक्ति कभी समूह में सहज नहीं रहेगा। माता-पिता के साथ आज भी साधु-सन्तों के या मन्दिर में नियमित नहीं जा रहा। शास्त्रों का नित्य पाठ नहीं कर रहा। उसके मन में धर्म के प्रति वैसा आकर्षण या प्रगाढ़ श्रद्धा नहीं है, जैसी पिछली पीढियों में थी। अत: आसानी से वह अजैनों जैसा व्यवहार भी कर लेता है। तब जैन एकता का झण्डा कौन उठाएगा? माता-पिता की स्वयं की कथनी और करनी में बहुत अन्तर है। पहली समस्या जैन होने की है। एकता बहुत आगे की बात है।

कभी अभियान चला करते थे कि हमें अपने नाम के आगे जैन लिखना चाहिए। गौत्र से महत्वपूर्ण स्थान जैन होने का मानते थे। आज “अल्प संख्यक” बनने के बाद हजारों लोग नाम के आगे जैन लिखना ही बन्द कर देंगे। वे अल्प संख्यक नहीं कहलवाना चाहते। न ही उनके साथ दिखाई पड़ना चाहते हैं। उनको देने वालों की श्रेणी में रहना उचित लगता है, लेने वाले नहीं बनना चाहते। नई शैली में जैन-अजैन एक जैसे होते जा रहे हैं। खान-पान, पहनावा, संस्कृति, मूल्य आदि एक जैसे होते जा रहे हैं। अभी तो पहला प्रश्न जो जड़ से जुड़ा है, वह यह है कि दो-तीन पीढियों के बाद समाज का समूह रूप रहेगा या लु# हो जाएगा। क्या धार्मिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा आज की तरह बनी रहेगी? एकता की बात तो शुद्ध दिखावटी है। अन्तर्जातीय विवाह, अन्तर्जातीय खान-पान जैन परिवारों में प्रवेश कर चुका है। संस्कृति और धन में मित्रता हो चुकी है। मेल-बेमेल एक हो चुके हैं।

धर्म का कार्य मुक्त करना है। सम्प्रदाय बान्धने का कार्य करते हैं। टुकड़े करने का सारा श्रेय या तो राजनेताओं को जाता है, या फिर धर्माचार्यो को। आज धर्म के नाम पर भी राजनीति करने की बात कई आचार्य कर रहे हैं। चुनावों में जैनियों को टिकट कितने मिलने चाहिए, यह चर्चा का विषय धर्मसभाओं में सुनाई देने लगा। अब तो जो मिलेगा, अल्पसंख्यक कोटा में मिलेगा। अब तक तो जैन मुख्य धारा में थे।

एक समय था जब वीतरागता के भावों की प्रबलता के कारण एक गृहस्थ साधु बनता था। आज? साधुओं में वीतरागता का स्थान राग-द्वेष ने ले लिया। यही खण्डन के कारण बन गए। वीतरागता में झगड़ा-संघर्ष संभव नहीं है। तीर्थकरों को भी लोगों ने कम परेशान (उपसर्ग) नहीं किया था, किन्तु उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं की। आज तो आचार्यो की वीतरागता की परिभाषा ही बदल गई। यह भी रिकार्ड पर है कि लगभग पचास वर्ष पूर्व एक जैनाचार्य का चित्र खींचने पर कैमरा तोड़ दिया गया था। कैमरामैन की पिटाई की गई। चित्र लेने को आत्म प्रदर्शन की संज्ञा थी। बाद में उन्हीं के सैकड़ों वीडियो बन गए। प्रश्न यह भी है कि ऎसे में समाज की जिम्मेदारी क्या? इसके बिना एकता की बात?

वस्तु स्थिति यह भी है कि शास्त्रों में कहीं भी “जैन” शब्द की परिभाषा नहीं दी गई। अत: जैन के घर जन्मा वही जैन। तब जैन धर्म न होकर एक जाति बन गया। परिभाषा सदा अतिव्याप्ति, अव्याप्ति तथा असंभव से परे होती है। यहां नहीं है। तब एकता किसकी? साधुत्व ही जैनों का लक्षण है। यहां एकता की बात का अर्थ क्या? एकता सदा किसी के विरोध में होती है। जैनों का अनेकान्तवाद सारे भेद मिटाकर सौहार्द बनाए रख सकता है। जहां तक मन्दिर आदि सम्पत्तियों के मुद्दे हैं, एक सेवानिवृत्त जजों की समिति इन्हें निपटा सकती है। इसमें दोनों तरफ के जज हो सकते हैं। एक-दो अजैन भी हो सकते हैं।

सामाजिक पहचान और शक्ति एकता से ही प्राप्त होते हैं। यह कार्य आचार्य नहीं करेंगे। वे तो अन्य सम्प्रदाय के सन्तों को साधु भी नहीं मानते। नियम ही ऎसे हैं। साधु का छठा गुण स्थान होता है। चारों सम्प्रदाय के साधुओं के महाव्रतों का स्वरूप भिन्न होता है। एकता संभव नहीं है। हां, व्यवहार में सौहार्द प्रकट कर सकते हैं। व्रत बल पूर्वक थोपे नहीं जा सकते। ज्ञान और श्रद्धा तथा चारित्र में भी बल वांछित नहीं है।

एकता का कार्य युवा ही कर सकता है। वहां किसी प्रकार के तात्विक भेद भी नहीं होते। समाज के प्रतिनिधि भी युवा ही होते हैं। पहचान की जरूरत भी इन्हीं को होती है। ये सब मिलकर अपनी नई “आचार संहिता” बना सकते हैं। आचार्यो की सलाह काम नहीं आएगी। वैसे भी हमारे यहां आचार्यो की कोई परिभाषा नहीं दी गई। न उनके अधिकार एवं उत्तरदायित्व की कोई स्पष्टता है। तभी तो वे स्वयं को धर्माचार्य कह रहे हैं और हम एक जाति की तरह व्यवहार कर रहे हैं। आचार्यगण वीतरागता से विमुख होते जा रहे हैं। हमें उनसे भी बात करनी चाहिए। उनकी स्वीकृति से एकता को बल ही मिलेगा। आज तो सन्त हमें खुला छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं। यह उनकी ही कमजोरी है। इसी तरह से मीडिया भी उनकी कमजोरी हो गया है।

धर्म को सकारात्मक रूप देना पड़ेगा। अ-हिंसा, अ-स्तैय, अ-परिग्रह की व्याख्या सहज नहीं होती। निषेध भी परोक्ष भाव में ही परोसे जाएं। वरना, बच्चे दुबारा नहीं आएंगे। सबको मिलकर एक रूप में ही महावीर को ग्रहण करना होगा। प्रसारण करना होगा। तब जाकर सामाजिक-आर्थिक पहचान की अन्य धर्म-समुदायों में प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आज उनमें जगह बनाना हमारी प्राथमिकता नहीं है। अपने समाज के कमजोर वर्ग को भी आज हमने ऊपर उठाना छोड़ दिया। दानदाता मन्दिरों के जरिए सन्तों का राजनीतिक लाभ उठाने लग गए। सरस्वती पुत्र तैयार करना बन्द हो गया। शास्त्रों पर शोध बन्द-सा हो गया-वैज्ञानिक विवेचन होता ही नहीं।

युवा एकता की पहली शर्त यह है कि हमारे प्रयास वर्तमान शैली के अनुरूप हों। नहीं तो भागीदारी नहीं होगी। अब जब अल्पसंख्यक श्रेणी का लाभ उठाना है तो बिना एकजुटता के संभव ही नहीं होगा। सामाजिक कार्यो के स्वरूप एकता का प्रमाण बनें, जरूरी हैं। नई पीढ़ी की आवश्यकताएं, चिन्तन, कॅरियर तथा जीवन शैली बिना किसी आलोचना के समाहित की जानी चाहिए। तभी हम शैक्षणिक नेतृत्व भी दे पाएंगे। छोटे-बड़े का भेद मिटा पाएंगे। धर्म के प्रति आस्था का नया प्रवाह तथा गति पैदा कर पाएंगे। तीर्थो का सामूहिक उत्तरदायित्व, नई पीढियों को जोड़े रखने के लिए तदनुरूप साहित्य का निर्माण जैसे कार्य हो सकेंगे। कुल मिलाकर युवा वर्ग को संकल्प करना होगा कि नई चेतना की जाग्रति के साथ विश्व में जैन दर्शन का प्रकाश फैलाएंगे।

क्रमश:

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