Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2014

जैन एकता… (2)

महावीर जयन्ती के अवसर पर आपसे प्रश्न करना चाहता हूं कि भगवान महावीर का दर्शन आपके दैनिक जीवन में कितना जुड़ा है। जितने भी बुजुर्ग श्रावक-श्राविकाएं यहां विराजमान हैं, क्या वे अपनी तीसरी पीढ़ी को महावीर से जोड़ पाए। एक भी “हां” कहने की स्थिति में नहीं है। यही जैन धर्म का भविष्य है। सुनने में जरूर कड़वा लगता होगा। अब दूसरा प्रश्न यह है कि क्या जो कुछ हो रहा है, उसे होने देना है अथवा हमें कुछ करना चाहिए। आज स्थिति यह हो रही है कि हम अपने धर्म के बारे में अजैनों को सच बता ही नहीं पा रहे। कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं।

आज अपने पोते को मैं किसी साधु के पास ले जाऊं तो उनके प्रश्नों की और निषेधों की सूची देखकर मैं हतप्रभ रह जाता हूं। प्रश्नों के उत्तर तो पोता नकारात्मक ही देगा। निषेधों की सूची सुनकर वह फिर कभी नहीं लौटेगा। वह तो टीवी, इण्टरनेट से जुड़ा है। उसका अपना एक वातावरण है। उसके अपने सपने हैं, जिनसे वह कभी समझौता करने वाला नहीं है। उसके मन में किसी समाज व्यवस्था का भार या भय भी नहीं है। उसे तो बस अपने कॅरियर की चिन्ता है। नौकरी मिली कि घर छूटा। तीन-चार पीढ़ी के बाद कौनसा समाज और कौनसा धर्म रहेगा?

एक रास्ता है। धर्म को, महावीर को शास्त्रों से बाहर निकालें। एक व्यवहार गत स्वरूप तैयार किया जाना चाहिए। सिद्धान्त जैन धर्म के हों तथा व्यवहार 21 वीं सदी का। आत्मा शाश्वत है तो सिद्धान्तों से जुड़ी रहे, व्यवहार देश, काल के अनुरूप बदलता रहे। जो सूर्यास्त से पूर्व घर ही नहीं पहुंचे अथवा जिसकी नौकरी ही रात्रि की हो, तो उसे रात्रि भोजन की छूट अधिकारिक रूप से मिल जाए। ऎसा न होने पर अजैन आपके रात्रि भोजन के नियम पर हंसेंगे। इसी तरह महाव्रतों की पालना के मानदण्ड नए सिरे से बनाए जाने चाहिए। भौतिकवाद के युग में परिग्रह की पुरानी परिभाषा नहीं ठहर सकती। महावीर के युग में न बिजली थी, न उपकरण। न उन्नत विज्ञान ही था, न नौकरी आधारित शिक्षा। जीवन में कहीं कृत्रिमता नहीं थी। विचारों से उद्दण्ड लोग तो उस युग में भी थे। महावीर ने कभी किसी के कार्य की प्रतिक्रिया नहीं की। उस युग में तो आचरण के अलावा था क्या? उन्होंने किसी को शत्रु नहीं माना। त्याग के अर्थ में अनावश्यक को कभी छुआ नहीं। प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा है। सब स्वतंत्र जीव हैं। अत: ईश्वर-नियन्ता की सत्ता को स्वीकार नहीं किया। पराधीनता का बोध कराती रहती है।

आज जैन धर्म का रूप जातिगत हो गया। एक तरह से सम्प्रदायवाद का पोषण कर रहे हैं। कट्टरवाद भी फैल रहा है। भौतिकवाद, क्षेत्रवाद, भाषा की भूमिका, सन्तों की शिक्षा, नई पीढ़ी का विश्वास आदि में एक तरह का बिखराव दिखाई पड़ रहा है। अन्य धर्मो में भी जैन धर्म के अनुयायियों के प्रति प्रश्न उठने लगे हैं। सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन तो सब सिद्धान्त रूप में ज्यों के त्यों हैं। व्यवहार में तो सम्यक् चरित्र ही दिखाई पड़ता है। वहां हम शाम को प्रतिक्रमण करते हैं, दिन में अतिक्रमण करते हैं। बहुत अन्तर है कथनी और करनी में। इससे मेरी तीसरी पीढ़ी को ही विश्वास नहीं जैन धर्म में।

जैन धर्म भी बौद्ध धर्म के समकालीन था ही। बौद्ध धर्म का प्रसार लगातार बढ़ रहा है। जैन धर्म संकुचित होता जा रहा है। कट्टरवाद का उदाहरण तो इतना ही काफी है कि हर मंगलपाठ/मांगलीक के अन्त में हम कहते हैं-“ये चार शरणा, मंगल करना, और न शरणा कोय।” क्या अर्थ हुआ इसका? यही न कि जैन धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है? क्या यही महावीर का अनेकान्त दर्शन है? तब हम अन्य धर्मो को कैसे स्वीकार करेंगे। उनके सिद्धान्तों पर क्यों कर शोध करने वाले! हम तो महावीर के ही अन्य अनुयायियों को नहीं मानते। एकमत भी नहीं हैं। अर्थात, हमने अपने दरवाजे बन्द कर लिए हैं। हमारा कोई साधु कुरान या बाइबिल पर बात नहीं करता। अब तो महावीर का विवेचन भी कम होता जा रहा है। प्राकृत या पाली से उद्धृत कर देते हैं। नई पीढ़ी को क्या लेना-देना। दूसरी बात यह भी है कि हमें उनके जीवन की सांसारिक घटनाओं के बजाय आत्मा से जुड़े विचारों को समझने की आवश्यकता अधिक है।

बाहरी जीवन इतिहास है। अंतर्जीवन दृष्टि है। भीतर चेतना है। उसकी गति, दिशा, रूपान्तरण, विकास आदि अधिक महत्वपूर्ण है। भीतर-बाहर का सीधा एक ही सम्बंध है कि भीतर चेतना है, बाहर स्वप्न है, नश्वर, परिवर्तनशील सृष्टि है। बाहर का जीवन सबका भिन्न-भिन्न, भीतर का सब एक जैसा। महावीर, जीसस, बुद्ध। इतिहास यानी तथ्य, दृश्य, संग्रह योग्य। भीतर की-पुराणों से-जो पढ़ेगा, उसके भीतर भी कुछ तो घटेगा। ऎसे उदाहरणों के अर्थ परोक्ष और गहरे होते हैं।

प्रत्यक्ष में तो धर्म भी बन्धन दिखाई देता है। एक आचार्य से पूछा कि संसार के बन्धनों में तथा संन्यास के बन्धनों में क्या भेद है। संन्यास के नियम तो ज्यादा कठोर है। कहने लगे यह तो धर्म का मार्ग है-मोक्ष मार्ग है। मेरा प्रश्न था कि मार्ग तो मंजिल आने पर छूट जाता है। आप तो अन्तिम श्वास भी इन्हीं बन्धनों में लेते हो। सम्प्रदाय तक नहीं छूटता। यहां तक कि मरने के बाद श्रावकों के लिए भी जैन श्मशान अलग होते हैं। शव भी मुक्त कहां हुए? तब आचार्य जी ने अपने सभी सन्तों को बुलाकर मेरे प्रश्न को दोहराया। कुछ ही दिनों बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि अब मेरे किसी तरह का भी बन्धन नहीं रहेगा। वे नीचे सभा में आकर बैठ गए। हमें महावीर के सूत्रों को गहरे में समझना होगा। उद्धृत करने से काम नहीं चलेगा। हमारी आज यही मूल समस्या बन गई। आप किसी भी साधु-साध्वी से पूछो कि अहिंसा क्या है, तो वे तुरन्त हिंसा पर बोलना शुरू कर देंगे। पूछो अपरिग्रह क्या है, तो परिग्रह की चर्चा शुरू कर देंगे। प्रश्न उठता है कि क्या हमारे महाव्रत नकारात्मक शैली में घड़े गए हैं? हम सामायिक करते हैं, प्रतिक्रमण करते हैं, ध्यान करते हैं, तब क्या किसी ने हमको समय में रहना सिखाया है? निश्चेष्ट होने का मर्म हमारी शिक्षा का अंग रहा है। यही कारण है कि हम वर्तमान में जीना ही नहीं जानते। जो अब तक किया, उस कारण यहां तक पहुंचे। अब जो करेंगे, वही हमारा भविष्य होगा।

क्रमश:

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