Gulabkothari's Blog

अप्रैल 15, 2014

जैन एकता… (3)

हम खाना खाते हैं, तब क्या हमारा ध्यान खाने में रहता है? क्या हम पांचों ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हैं खाने में? क्या हमें याद रहता है कि-जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन! न जाने कितने विचार चलते रहते हैं मन में, कि खाने के बाद क्या-क्या करना है। खाना किसने खाया, किसने बनाया, क्या कैसा बना, सब गौण हो गया। क्या यही स्थिति सामायिक-प्रतिक्रमण में नहीं रहती? हम वर्तमान के बजाए अतीत या अनागत में जीते हैं। ध्यान तो वर्तमान में जीने का नाम है। अतीत की स्मृतियां तथा अनागत की कल्पनाएं हमारे वर्तमान को ध्वस्त कर देती है। तब हम पांचों महाव्रतों की सूक्ष्मता को कैसे समझ सकेंगे। जब महावीर ने कही थी, तब कैसा युग था। आज वैसा क्या बचा है? संसार की भौगोलिक तथा भौतिकवादी तस्वीरें बदल चुकी हैं। हां, आत्मा का भाग, सृष्टि के सिद्धान्त वही हैं। आगे भी नहीं बदलने वाले। जरूरत इस बात की है कि हम महावीर की यात्रा से उस अन्तरात्मा के स्वरूप का विवेचन 21 वीं सदी की भाषा में कर सकें। उसकी सार्थकता मोक्ष मार्ग तथा लोक कल्याण में सहायक होने पर होगी। कर्मो की निर्जरा तथा नए कर्म बन्धनों से मुक्ति कैसे हो, यह बताना पड़ेगा।

जीवन में महावीर नि:श्रेयस तथा अभ्युदय के साथ-साथ वर्तमान जीवन की सफलता में भी सहयोग कर सके। साथ ही सिद्धान्त को सरल व्यवहार में ढालना पड़ेगा। वरन् व्यक्ति उनकी पालना भी नहीं कर पाएगा और झूठ भी बोलता रहेगा। चरित्र में यदि विरोधाभास हुआ तो अन्य समुदाय के लोग हम पर हंस भी सकते हैं। हमारा व्यवहार रूढ़ी बनकर न रह जाए। मेरी ही नई पीढ़ी मेरी ही बात नहीं मानेगी। उदाहरण के तौर पर साधु-संत कहते हैं कि गृहस्थ स्वयं के लिए खाना बनाएं और उसी में से हमको भी दें। ताकि हम हिंसा के निमित्त नहीं बनें। मेरा अनुभव है कि प्रत्येक बड़े चातुर्मास में सैंकड़ों चूल्हे केवल साधुओं के निमित्त ही यात्री जलाते हैं। गोचरी के लिए लगभग चालीस से अधिक निषेध लागू होते हैं। साधु-साघ्वियां आज फरमाइश करके जाते हैं कि अगली बार वे क्या ले जाना चाहेंगे।

महावीर तथा बुद्ध के काल में उपनिषदों की ज्ञान धारा प्रमुख थी, चरित्र गौण था। महावीर चरित्र को “अति” तक ले गए। शरीर शुद्धि के लिए तप अनिवार्य कर दिया। अन्न के साथ ही मन की शुद्धि भी जुड़ी ही है। उपनिषद् में आकाश को छोड़कर शेष चार महाभूतों को देवता माना जाता था। महावीर ने इनमें जीव तत्व सिद्ध कर दिया। कह दिया कि किसी भी “काय” की हिंसा नहीं करनी चाहिए। व्यक्ति कभी भी किसी तत्व रूप में पैदा हो सकता है। इसी प्रकार उपनिष्द् आत्मा को पवित्र ही मानते हैं। महावीर ने इसको नकार दिया। उन्होंने कहा कि यदि शुद्ध होती तो जन्म ही क्यों लेती। आत्मा को अच्छा-बुरा कर्म बांधता है। फल की इच्छा इसका कारण है। अत: आत्मा में बस स्थित रहना है। दूसरे के स्थान पर खड़े होकर सोचना ही अनेकान्त है।

आज सम्यक् दृष्टि की आवश्यकता है। तभी हम अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह जैसे आधार भूत व्रतों को यथार्थ में समझ सकेंगे। भोगोपभोग परिमाण व्रत की सीमा बांध सकेंगे। इसके अभाव में हमारी शक्ति भी क्षीण होगी तथा पराधीनता बढ़ेगी। मन तथा शरीर कमजोर होते चले जाएंगे। बल तो शान्ति की साधना से मिलता है। आत्मा तो शाश्वत है। तप के द्वारा नश्वर का त्याग करना होता है। यही से अपरिग्रह शुरू हो जाता है। हमारे दु:ख का कारण भी हमारी दु:खों से भागने की मानसिकता ही है। हम सदा सुखों के बारे में एक अभावग्रस्त मानसिकता रखते हैं। जड़ पदार्थो में सुख कहां मिल सकता है। शरीर के बाहर सुख कैसे प्राप्त कैसे होगा। पदार्थो के पीछे भागना बन्द हो तो जन्म-जन्म का भागना भी बंद हो जाएगा। यही मोक्ष है।

क्रमश:

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