Gulabkothari's Blog

अप्रैल 16, 2014

जैन एकता… (4)

महावीर का अनेकान्त एक अनूठी देन है। इसका अर्थ है दिमाग में खुलापन, सबको स्वीकार करने का भाव, विश्वमैत्री का भाव। यही अहिंसा का मार्ग भी है। दूसरे की स्थिति को समझकर कार्य करना ताकि किसी का अहित न हो। हो सके तो दूसरे के हित या विकास में सहायक बनें। यही अहंकार मुक्ति का मार्ग है। इसी से क्रोध, मान, माया, लोभ बढ़ते हैं। इन्हीं के शमन के लिए चार महाव्रत क्रमश: अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य और अचौर्य की प्रतिष्ठा हुई। वेद, बौद्ध तथा जैन मतों में इन चारों का महत्व बराबर है। अपरिग्रह समय के साथ बदलने वाला व्रत है। बौद्ध इसे नशा मुक्ति कहते हैं। वेद में इसका स्थान दान ने ले रखा है।

अहंकार मुक्ति या अनेकान्त दृष्टि में व्यक्ति स्वयं को केन्द्र में नहीं रखता। गुठली की तरह जड़ बनकर जमीन में रहता है। उसे चिन्ता नहीं कि उसके फल कौन खाएगा। वह अपने भौतिक अस्तिžव के लिए जीता ही नहीं है। जिन्दगी इतनी जटिल है कि जब भी हम उसे एक कोने से पकड़कर आग्रह करने लगते हैं, तभी हमारा आग्रह झूठा हो जाता है, इसी आग्रह को एकान्त कहा है। जीवन के एक पहलू को पकड़कर उसे पूरे जीवन होने का दावा करे, वह एकान्तवादी है। महावीर कहते हैं कि सब कोने अगर देख लोगे तो यह दावा छूट जाएगा क्योंकि इसमें ऎसे कोने भी मिलेंगे जो विपरीत हैं। और वे भी इतने ही सही हैं जितना एक कोना सही है और तब यह दावा नहीं रहेगा।

अनेकान्त का अर्थ है जीवन के सब पहलुओं की एक साथ स्वीकृति, विरोधी दृष्टि ही नहीं है, सारे विचार जहां एक-दूसरे के परिपूरक हैं। हमारी सीमित दृष्टि के कारण विरोधी दिखाई पड़ते हैं।

इसी बात को हम दूसरी तरह देखते हैं। महावीर ने ईश्वर की सत्ता को नकारा। क्योंकि व्यक्ति इसमें परतंत्र हो जाता है। जीवन की नियंता ईश्वर हो जाता है। वेद भी “अहं ब्रह्मास्मि” का उद्घोष करता है। महावीर भी प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को परमात्म मानते हैं। वह सब कुछ करने में समर्थ एवं स्वतंत्र है। गीता में कृष्ण भी कहते हैं-“ममैवांशो जीवलोके…” जब मैं स्वयं ईश्वर का अंश हूं तो मेरा कार्य स्वयं अपने स्वरूप को समझना है। मैं यहां ओशो के उद्धृत करना चाहता हूं-“महावीर के परमात्मा की धारणा अस्तिžव की गहराइयों से निकलती है, बाहर से नहीं आती। इसी अस्तिžव में जो सार भूत विकसित होते-होते अन्तिम क्षणों तक विकास को उपलब्ध हो जाता है, वही परमात्मा है।” आज की पीढ़ी बुद्धिमान है अपने भविष्य के प्रति चिंतनशील भी है और किसी भी बात को बिना वैज्ञानिक विश्लेषण के स्वीकार नहीं करती। हम केवल अपने शास्त्रों के सहारे उसके मन में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे, यह एक सच्चाई है। न हम दूसरे धर्मो के हवाले से उसके तर्को का समाधान दे पा रहे हैं। उसके लिए आवश्यक है कि हमारे महाव्रत सकारात्मक तथा जीवनोपयोगी रूप में उसके सामने रखे जाएं। उसकी आज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले दिखाई पड़े, ताकि धर्म का जो निषेधात्मक ढांचा आज खड़ा है, जो आज बच्चों को हमारी ओर आने में बाधक बनता है, इस ढांचे को देशकाल के अनुरूप बदला जाए। बच्चों की भाषा के नए साहित्य की सर्जना करनी होगी। छोटी उम्र से उनको संस्कारवान बनाने के प्रयास करने पडेंगे और इसके लिए हमें माताओं को भी इस दृष्टि से शिक्षित करना पड़ेगा । यह कार्य हमारे साधु-संत बहुत प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। मीडिया भी इसमें अपनी पूर्ण भागीदारी निभा सकता है। वरना जिस तेजी से जैन धर्म संकुचित होता जा रहा है, विश्व की धार्मिक चर्चाओं से बाहर होता जा रहा है, तब इसके भविष्य के प्रति सदा ही आशंका बनी रहेगी। और इसके लिए आवश्यकता हो तो साधु-संतों के विदेश गमन का मार्ग खोलना होगा ताकि वे अपने सिद्धान्त पक्ष को वैश्विक स्तर पर रख सकें। विभिन्न धार्मिक आचार्यो के प्रश्नों का समाधान कर सकें। तब जाकर हम महावीर के सिद्धान्तों को विश्व के पटल पर प्रतिष्ठित कर पाएंगे। तब हमारी पीढ़ी महावीर को भगवान मानेगी। उनके आगे सिर झुकाकर गर्व कर सकेगी।

परमात्मा को पाने का, आत्म-साक्षात्कार करने का जो उपक्रम है, वही अपरिग्रह का मार्ग है। जो अनावश्यक है, उसे छोड़ते जाओ। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के लिए जो व्यर्थ है, छोड़ दो। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय कोषों का परिष्कार करते जाएं। ये मन-वचन-काया के ही नाम हैं। इन तीनों संस्थाओं से करना, कराना और अनुमोदन करना बधकारक कहा है। इसी प्रकार जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की लालसा भी हमारे मन में रहती है। पकड़ने की इच्छा हमारे असुरक्षा के भाव के कारण रहती है। जब चेतना को पता लग जाए कि चेतना के स्तर पर कोई असुरक्षा है ही नहीं, न भय, न पीड़ा, तब क्यों पकड़ेगा? कर्म के साथ यह पकड़ने का भाव ही बन्ध का कारण होता है। इस भाव को ही अंहकार कहा है। छोड़ने को त्याग नहीं कहते, छोड़ने के बोध को त्याग कहते हैं। जब हम कुछ छोड़ते हैं तब उसके पीछे छोड़ने की पकड़ रह जाती है। “मैंने यह छोड़ दिया।” इसे भी छोड़ देना है।

तवार्थ सूत्र में परिग्रह को मूच्र्छा कहा गया है। परिग्रह का अर्थ है वस्तु के प्रति ममत्व या आसक्ति का भाव रखना। मूच्र्छा का यह भाव केवल जड़-चेतन वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रहता किन्तु अपने विचारों, भावनाओं और सिद्धान्तों के प्रति भी इतना सघन होता है कि अपने से भिन्न विचारों या सिद्धान्तों को सुनने के लिए तैयार नहीं होता। इसी कारण तो विश्व भी पूंजीवाद और साम्यवाद के समूहों में बंट गया। जब हम मूच्र्छा की व्याख्या करते हैं तो उसके व्यापक अर्थ में धन अर्जित करना, उसकी रक्षा करना, पशु, सम्पत्ति आदि तो इसकी परिधि में आते ही हैं लेकिन वासनाओं और कषायों को मन में पोषित करना भी एक तरह से भावनात्मक मूच्र्छा है। मूच्र्छा का अभाव ही अपरिग्रह है। कामना मुक्त होना ही मोक्ष है।

आत्मा के आन्तरिक गुण जैसे “ज्ञान एवं अन्तर्दृष्टि” परिग्रह भाव से मुक्त हैं। अपरिग्रह समत्व है, परिग्रह भोग की संस्कृति है। भगवान महावीर ने कहा था-“प्रमत्त मनुष्य इस लोक में अथवा परलोक में धन से त्राण नहीं पाता।” अंधेरी गुफा में जिसका दीपक बुझ गया हो, उसकी भांति अनन्त मोह वाला प्राणी पार ले जाने वाले मार्ग को देखकर भी नहीं देखता। जो मनुष्य कुमति को स्वीकार कर पापकारी प्रवृत्तियों से धन का उपार्जन करता है, ऎसे लोग धन को छोड़कर मौत के मंुह में जाने को तैयार रहते हैं। वे कर्म से बधे हुए मरकर नरक में जाते हैं। अज्ञानी मनुष्य ऎश्वर्यपूर्ण जीवन जीने की कामना करता है। वह अपने द्वारा कृत कामना की व्यथा से मूढ़ होकर विपर्याय को प्राप्त होता है। दु:ख को प्राप्त करता है।

महावीर के अनुसार हिंसा एवं परिग्रह को समझे बिना व्यक्ति धर्म को नहीं जान सकता। न संयम का विकास कर सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में अपरिग्रह महत्वपूर्ण है। अहिसा तो इसी से निकलता है। विलासितापूर्ण जीवन तथा विकास के नाम पर होने वाले विनाश से बचने का एकमात्र उपाय है अपरिग्रह मूलक जीवन शैली। इसी से वहनीय विकास (सस्टेनेबल लिविंग) की संस्कृति का वैश्विक अभियान प्रारंभ हो सकेगा।

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