Gulabkothari's Blog

मई 12, 2014

कैसे-कैसे देशद्रोही!

प्रत्येक राष्ट्र अपनी अखण्डता और सम्प्रभुता के लिए कटिबद्ध होता है। अपने नागरिकों की पवित्रता और सुरक्षा के लिए संकल्पित होता है। जब-जब भी इस अखण्डता पर आक्रमण होता है, सम्पूर्ण देश एक हो जाता है। नागरिकता से जुड़े सभी कानूनों को भी इसी संदर्भ में देखा जाता है। इतिहास के सभी युद्ध इसी संप्रभुता की रक्षा के लिए लड़े गए थे।

आज हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। हमारी अखण्डता की रक्षा का भार उठाने के लिए हम जन प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। उन्हें केन्द्र और प्रादेशिक स्तर पर सत्ता सौंपते हैं। आजकल नई सरकार के चयन का दौर चल रहा है। दुर्भाग्य की बात है कि इस दौड़ में शामिल अधिकांश प्रत्याशी राष्ट्र एवं विकास की बात करने के बजाए व्यक्तिगत, गरिमाहीन, निकृष्ट शब्दों में प्रहार करने में व्यस्त हैं। क्या उन्हें धिक्कारना गलत होगा? इसके भी आगे जो राष्ट्रहित के विरोध में बोल रहे हैं, उन्हें क्या कहेंगे-देशद्रोही? ऎसे वक्तव्य क्या चुनाव आयोग, देश के प्रधानमंत्री या उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश नहीं सुन रहे? सुन तो माननीय राष्ट्रपति जी भी रहे होंगे।

यदि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि पश्चिम बंगाल से बांग्लादेशियों को निकालने का मोदी को कोई अधिकार नहीं है, वे कौन होते हैं?

ऎसा ही एक उदाहरण केन्द्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला का है। स्वयं कई बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे अब्दुल्ला कहते हैं कि मोदी को वोट देने वालों को समुद्र में डूब जाना चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि कश्मीर की जनता साम्प्रादायिक नहीं है। यदि भारत साम्प्रदायिक होता है तो वह कश्मीर की जनता को मंजूर नहीं है। क्या अब्दुल्ला का यह बयान संविधान का खुला उल्लंघन नहीं है? क्या कश्मीरी पण्डितों को वहां से निकालना साम्प्रदायिकता का प्रमाण नहीं है?

दूसरी ओर संघ परिवार के वरिष्ठ सदस्य प्रवीण तोगडिया तो और भी आगे निकल गए। गुजरात में उन्होंने कह दिया कि, बहुसंख्यक बहुल क्षेत्रों में कोई अल्पसंख्यक सम्पत्ति खरीदे तो उस पर कब्जा कर लो! इससे भी ज्यादा हद संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत की ओर से है जो ऎसे अमर्यादित वक्तव्यों पर मौन साधे हैं। क्या यह मान लें कि तोगडिया जैसों पर उन्हीं का वरदहस्त है?

प्रश्न यह है कि क्या ममता बनर्जी यह नहीं जानती कि सभी बांग्लादेशी मुसलमान इस देश में अनधिकृत रूप से रह रहे हैं, जिन्हें फिर से अपने देश लौटा देना हमारा धर्म है। कांग्रेस तथा कम्युनिस्ट पार्टी ने भी मुक्तहस्त देश को बांग्लादेशियों के खेल का मैदान बना डाला। क्या ममता भी उन्हीं का अनुसरण नहीं कर रही हैं? क्या इन्होंने इतनी बड़ी घुसपैठ देखकर भी आंखें नहीं मूंद लीं? सरकारें भी इन्हीं की थीं। क्या इन्होंने देश के साथ धोखा नहीं किया? यदि इन्हें आज कोई वापस भेजने की बात करता है तो क्या यह गलत है क्योंकि ये किसी युद्घ के शरणार्थी तो नहीं हैं। यह तो हमारी इज्जत पर हमला है! क्या हमलावरों को बचाना देशद्रोह नहीं है? आज पश्चिम बंगाल का क्षेत्र देश का तीन प्रतिशत है और आबादी छह प्रतिशत से अधिक। क्या अनधिकृत रूप से आए घुसपैठियों को शरण देना देशद्रोह नहीं है? समस्या उन लोगों से नहीं है जो 1947 में विभाजन के समय और 1971 में युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में उधर से इधर आए। समस्या उन लोगों से है जो हर रोज हजारों की संख्या में भारतीय सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। हालात यह हैं कि सरकार के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि देश में अब तक कितने बंाग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं और वे कहां कहां जाकर बस गए हैं। 1993 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री ने लोकसभा में स्वीकार किया था कि 1981 से लेकर 1991 तक यानी 10 सालों में ही बंगाल में हिन्दुओं की आबादी बीस प्रतिशत की दर से बढ़ी, तो मुसलमानों की आबादी में 38.8 फीसदी का इजाफा हुआ। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या 1.5 करोड़ थी।

सीमा प्रबंधन पर बने टास्क फोर्स की रिपोर्ट के मुताबिक हर महीने तीन लाख बांग्लादेशियों के भारत में घुसने का अनुमान है। केवल दिल्ली में 13 लाख बांग्लादेशियों के होने की बात कही जाती है, हालांकि अधिकृत आंकड़ा चार लाख से कम ही बताता है। कुछ लोगों का कहना है कि दंगे ज्यादा अवैध बांग्लादेशियों को असम में लाने के मकसद से किए जाते हैं ताकि उन्हें विभिन्न राहत कैंपों में दंगा पीडितों की आड़ में जगह दे दी जाए और बाद में उन्हें सरकार पुनर्वास के नाम पर “मूल भारतीय नागरिक” के तौर पर रहने की इजाजत दे दे। असम में 1971 में घुसपैठ के मुद्दे पर ही 6 वर्षो के लिए आन्दोलन शुरू हुआ था। तब ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने इस मुद्दे पर राज्यव्यापी आन्दोलन चलाया था। इसकी परिणति 1984 में असम समझौते के रूप में हुई। इस समझौते के तहत यह फैसला लिया गया कि मार्च 1971 के बाद जिसने भी बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ की है, उनकी पहचान कर उन्हें वापस भेज दिया जाएगा।

ममता बनर्जी ही क्यों देश के अन्य नेताओं में भी वोटों के लिए अलगाववादी बयान देने की होड़ लगी है। ऎसे नेता किस श्रेणी में आते हैं, यह देशवासी स्वयं विचार कर लें। साधारण बुद्धि से तो सबकी मंशा एक जैसी लगती है। ऎसे ही कुछ बयानों पर दृष्टि डाली जाए

1. फारूक अब्दुल्ला (केन्द्रीय मंत्री)- “मोदी को वोट देने वालों को समंदर में डूब जाना चाहिए। देश में साम्प्रदायिक ताकतें हावी हो गई तो कश्मीर कभी भारत के साथ नहीं रहेगा।”

2. रामदास कदम (महाराष्ट्र के भाजपा नेता)-“आजाद मैदान के दंगों में शामिल मुसलमानों को बख्शा नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान से बदला लेंगे।”

3. अबू आजमी (सपा नेता)-“जो मुसलमान मुलायम और सपा की मुखालफत कर दूसरे दलों को वोट करेगा उसका डीएनए टेस्ट कराया जाना चाहिए। ताकि पता चले कि वह सच्चा है या नहीं।”

4. लालू प्रसाद यादव (राजद)-“नरेन्द्र मोदी को पाक भेज दिया जाए। मोदी के लोग दूसरों को पाक भेजने की बात कहते हैं जबकि खुद मोदी को वहां भेजा जाए। यही उनके हर मर्ज की दवा है।”

5. इमरान मसूद (सहारनपुर के कांग्रेस नेता)-“यदि मोदी यूपी को गुजरात बनाने की कोशिश करेंगे तो मैं उनके टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।”

6. गिरिराज सिंह (बिहार के भाजपा नेता )- जो लोग मोदी को रोकना चाहते हैं, वे पाक की ओर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में उनके लिए भारत में कोई जगह नहीं होगी। उनके लिए बस पाक में जगह बचेगी।

कैसे इतने वरिष्ठ नेता देश की अस्मत के विरूद्ध बोलकर चल दिए। इन पर तो नामजद मुकदमे दर्ज होने चाहिए। ये देश को नेतृत्व देने लायक भी नहीं हैं और न ही जनप्रतिनिधि बनने लायक। इनका स्थान तो कहीं और होना चाहिए। हमें कम से कम मुख्य चुनाव आयुक्त और देश के मुख्य न्यायाधीश से तो यह अपेक्षा करनी ही चाहिए कि संविधान तथा देश की सम्प्रभुता की रक्षा के लिए वे किसी को भी क्षमा नहीं करेंगे, भले ही वो कितना ही बड़ा सत्ताधारी क्यों ना हो? यदि नागरिकों का विश्वास टूट गया तो देश के लिए अपने आप में बड़ा खतरा हो जाएगा। युवा सपनों के साकार होने की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी।

– गुलाब कोठारी

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