Gulabkothari's Blog

नवम्बर 17, 2014

क्यों सही है मीडिया ट्रायल

हाल ही में उदयपुर में आयोजित लॉयर्स सेमिनार में “मीडिया ट्रायल एंड इट्स इम्पेक्ट ऑन सोसायटी एंड ज्यूडिशियल सिस्टम” विषय पर पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के व्याख्यान के सम्पादित अंश…

अगर मैं पुराने काल के वेद-पुराण को देखता हूं तो मुझे नारदजी नजर आते हैं। जो सारी खबरों को इधर से उधर, ऊपर से नीचे पहुंचाने का काम करते रहे। उसके बाद द्वापर में, त्रेता में, कहीं मीडिया दिखाई नहीं पड़ता। मीडिया की अवधारणा इस देश की संस्कृति में छोटी-छोटी नृत्य-नाटिकाओं से आई। एक नृत्य नाटिका हमारे सांस्कृतिक संदेश पूरे क्षेत्र में पहुंचाती है। आधुनिक मीडिया की अवधारणा, मास मीडिया की अवधारणा पश्चिम की देन है। मास मीडिया की भूमिका अगर अलग-अलग देशों में एक जैसी नहीं है। क्यों? क्योंकि वहां पूरा देश सांस्कृतिक दृष्टि से एक जैसा नजर आता है। आप अमरीका और यूरोप के किसी भी कोने में चले जाएं सांस्कृतिक दृष्टि से पूरा देश एक जैसा नजर आता है। भारत में ऎसा नहीं है क्योंकि भारत का जो मीडिया है वो कई टुकड़ों में बंटा हुआ है। अंग्रेजी का मीडिया, उसकी अपनी चाल अलग है। अंगे्र्रजी मीडिया में तो शायद आपको भारतीय संस्कृति के दर्शन भी नहीं होंगे। हिन्दी का मीडिया अपनी अलग चाल लेकर काम करता है और बाकी जो भारतीय भाषाएं हैं उनके मीडिया की पहुंच, उनके मीडिया की पकड़ अपने-अपने क्षेत्र में बहुत बड़ी है, लेकिन उनकी बात बाकी देश में पहुंच ही नहीं पाती। इसके साथ-साथ समय तो खबरों में बदलता ही रहता है। बीच में एक समय ऎसा भी आया था जब न्यायपालिका ने समाज के बहुत सारे मुद्दों को स्वप्रसंज्ञान से उठाना शुरू कर दिया था। अगर मैंने एक चिटी भी मुख्य न्यायाधीश महोदय को लिख दी कि हमारे शहर में इस इस तरह की दो बड़ी समस्याएं हैं सरकार इधर नहीं देख रही है तो उस चिटी से न्यायाधिपति महोदय खुद सरकार को नोटिस जारी कर देते हैं। यह सिलसिला इतना अच्छा चला कि उसको हम न्यायिक सक्रियता कहने लग गए। यानी न्यायालय समाज की समस्याओं के प्रति इतना सक्रिय हो गया है। उस बात को ध्यान में रखते हुए मीडिया ने भी उसी तर्ज पर उन समस्याओं को उठाने का काम शुरू किया। मुझे ऎसा लगता है कि हम जिसको आज मीडिया ट्रायल कह रहे हैं यह वही मुद्दे या मुद्दों को उठाने का ही तरीका है। इसे हम विदेशी भाषा में मीडिया ट्रायल कर रहे है।

हमें इसे मीडिया ट्रायल कहनेे की कोई जरूरत नहीं है। हम चाहें इसको पत्रकारिता कहें, पत्रकारिता का धर्म कहें, खोजी पत्रकारिता कहें या विषय की तह में जाकर तथ्यों को लाने का कार्य कहें। लेकिन ये जो मीडिया ट्रायल शब्द है, ये शब्द भी मुझे लगता है कि थोपा हुआ शब्द है। और इसके अर्थ दूसरे देशों में क्या होंगे। वो हम पर लागू नहीं हो पाते, क्योंकि अब केवल प्रिंट मीडिया नहीं है। अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बीच में ऎसा है, जो शुरू में हमारी पकड़ में था ही नहीं। उसको कोई हांगकांग से तो कोई सिंगापुर से ऑपरेट कर रहा था। तब हमारे यहां आई इस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को हमारे देश की समस्याओं से, दुख-दर्द से, संवेदनाओं से कोई वास्ता ही नहीं था। अगर आप उस समय के देश के बड़े-बड़े कांड को देखें तो आपको लगेगा कि मीडिया ने उन तस्वीरों को किस तरह से भुनाया। किस तरह से भावनाओं को भड़काने की कोशिश की और देश में किस तरह का वातावरण फैलाया, लेकिन बाद मेे हमारा डोमेस्टिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया। उसकी छवि भी वही रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया दोनों के धरातल अलग-अलग नजर आते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जुड़ाव जनता के साथ उतना नहीं दिखता। जबकि प्रिंट मीडिया आज भी जनता की संस्कृति से जुड़ा है, शायद यही एक कारण है कि हम देश में न्याय को प्रतिष्ठित करने में बहुत कारगर सिद्ध हुए हैं और आगे भी होंगे। भले ही हम इसको नाम कुछ भी दें। मीडिया ट्रायल दें तो भी। मुझे लगता है कि जो परिवर्तन देश में आ रहे हैं। जिस तरह से राजनीति, विधायिका बदली है, सांसदों का स्वरूप बदला है, ब्यूरोक्रेसी बदली है, पुलिस के बारे में भी अभी हमने सुना। इतने बदलाव के कारण और शिक्षा के अंदर जो संवेदनहीनता बहुत बढ़ी है। हमारी पीढ़ी में हमारी किताबों में कहीं मानव की बात ही नहीं है, संवेदना ही नहीं है। तब हम जो बातें समाज की उठा रहे हैं उनका अर्थ कहां है। आज महिला अत्याचार की बात हमने की। कोई महिला अपनी बच्ची को कोई शिक्षा देती है? अपने बच्चे को कोई शिक्षा देती है कि बड़े होकर तुम्हें किसी महिला को हाथ नहीं लगाना है। उसे बुरी नजर सेे नहीं देखना है। आखिर आदमी क्या है। वह भी तो उसी महिला का तैयार किया हुआ है।

दूसरी तरफ हम बात करते है कि हमें महिलाओं पर अत्याचारों को कम करना है, उन पर रोक लगानी है। पर हमारी पिछली सरकार मे क्या-क्या कानून बने थे। हमारी तकदीर अच्छी थी कि लिव इन रिलेशनशिप, जैसे कानून बनने से रूक गए। लड़कियों को सोलह साल की उम्र में आप आजादी दीजिए। शादी अठारह साल से पहले नहीं करेंगे। आप इस समाज को कहां ले जाना चाह रहे हैं? मीडिया अगर इन मुद्दों को नहीं उठाता तो ये कानून हमारी छाती पर अब तक बन गए होते। हम उम्मीद यह करते है कि हमें यहां न्यायपालिका वालों का सपोर्ट मिलना चाहिए। जनता समझ नहीं पाती। हमें तो खुशी है कि हमने तो अपना धर्म निभाया। अगर न्यायपालिका भी उसी तरह उन मुद्दों पर कुछ न कुछ संदेश इस देश को देती तो मुझे लगता है कि हम विधायिका को भी कटघरे में खड़ा करते कि वो कोई भी नए कानून लाए तो देश के अन्दर पहले बहस की जाए। हमारी सांस्कृतिक धरोहर के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। मैं आपको ऎसे बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूं जहां पर्टिकुलर राजस्थान पत्रिका ने इसी मीडिया ट्रायल के नाम से लिखा।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इतने सारे गलत काम होने से रूकवाए या लोगों को सामने लाकर सजा दिलवाई। जब हम मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ गए तब तक कोई भी मीडिया सरकार के खिलाफ खबरें ही नहीं छापता था। तब आप वहां कौन से मीडिया ट्रायल के सपने देख रहे हैं। पर जब हम गए इन पांच सालों में तब दिखा कि आज कितने बड़े-बड़े आदमी जेलों में बैठे हैं। ये आपके सामने है। आज जिस तरह से विधायिका का दबदबा है, जिस तरह दबंगई हो रही है, आम आदमी के हितों का ध्यान बहुत कम लोगों को है। अगर इस दृष्टि से न्यायपालिका की कोई मदद करता है तो केवल मीडिया करता है। उसके पास तथ्य नहीं होते। यहां तक की तथ्य दबाए जाते है। लेकिन मीडिया ने कम से कम प्रिंट मीडिया ने न्याय को प्रतिष्ठित रखा तो केवल इस मीडिया ट्रायल के कारण से रखा। मुझे नहीं मालूम आप कितने लोगों को इस बात का पता है कि छत्तीसगढ़ के अन्दर राज्य सरकार ने सलवा-जुडूम अभियान चला रखा था। आदिवासियों के गांव खाली कराए जाते थे। और इन जमीनों को उद्योगपतियों को बेचने के प्रयास करते थे। जरूरत पड़ती थी तो माओवादियों के साथ भिडंत के नाम पर आदिवासी मारे दिखाए जाते थे।

राजस्थान पत्रिका ने इस मुद्दे को इतना उठाया कि सुप्रीम कोर्ट को ये जजमेंट देना पड़ा कि यह गैरसंवैधानिक कार्य है। उसके बाद आज तक फिर कोई बड़ा आदिवासी नरसंहार नहीं हुआ। पुलिस के महानिदेशक को भी वहां से हटना पड़ा। पर ये असर उसके बिना सम्भव नहीं था। वहां के गृहमंत्री ने एक एचएम सेल बना रखा था। जब मर्जी आए किसी भी गांव में गए। कुछ भी करके आ गए। किसी को मार दिया, किसी को उठाकर जेल में डाल दिया। ये हमारे मुद्दे थे। इसको हम कह सकते हैं कि ये मीडिया ट्रायल के नाम से किए हुए है। लेकिन हमने उसे डिसमेंटल करवाया। आज भी मध्यप्रदेश के बेलागांव हत्याकांड के आरोपी जेल में बैठे हैं। एक वरिष्ठ मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। व्यापमं घोटाले में भी मध्यप्रदेश में मंत्री रहे एक ताकतवर नेता जेल में बैठे हैे। वहां की व्यापमं संस्था के हाल तो कोई जाकर देखे। वहां लड़कियों के नम्बर बढ़ाने के लिए, मेडिकल में पास करने के लिए अस्मत मांगी जाती है। हमने केस छापे हैं। सोचकर तो देखें हम जा कहां रहे है। व्यापमं के घोटालों को तो हम पिछले तीन साल से चलाए जा रहे हैं। मैं समझता हूं अभी तक बीसों आदमी जेल में पहुंच चुके। पर ये नहीं करेंगे तो काम होगा कैसे इसका मुझे उत्तर चाहिए? क्या हम उसको बंद कर दें। राजस्थान में भंवरी देवी काण्ड आज किसके सामने नहीं है। एक तत्कालीन मंत्री और विधायक जेल में हैं। लेकिन जब से मीडिया ने बोलना बंद किया तब से आज तक इंदिरा विश्नोई को पकड़ नहीं पाई। पुलिस का हाल ये है कि वो किसी विधायक को हाथ नहीं लगाती, किसी अफसर के हाथ नहीं लगाती। मीडिया क्या फिर नहीं बोलेगा। हमने पीछे पड़-पड़ के अनेक विधायकों को जेल में भिजवाया। जिसकी जमानत नहीं हुई। जो पुलिस रिकॉर्ड में फरार हैं, वो सब के सामने है उसे कोई कुछ नहीं कहता। हम रोज फोटोग्राफ लगा रहे हैं। विधानसभा का चुनाव लड़कर विधायक बन गए। पुलिस को परवाह ही नहीं है। आप समझें इस बात को मैं मीडिया ट्रायल की बात वो कह रहा हूं जो मेरे इस खून के अन्दर बह रही है। उस दर्द की बात कह रहा हूं। उस दर्द से हम लड़ते है। कितनी सरकारों से लड़ना पड़ता है लेकिन हम लड़ने को तैयार हैं, हार मानने को बाध्य नहीं है। क्योंकि हमारे पास जनता का समर्थन है। और जनता उसी को सपोर्ट करती है जो जनता के लिए काम करता है। अपने लिए काम नहीं करता। मीडिया, पत्रकारिता ऎसा बीज है, संकल्प है जिसको जनता सींचती है और वो वट वृक्ष बनकर छाया भी जनता को देता है और फल भी जनता को देता है।

जो बीज होता है, जो पत्रकार होता है वो जमीन में गड़ जाता है। वो अपने लिए नहीं जीता। वो देश के लिए जीता है। इस सम्बंध में आज एक बात और चली कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा पाया बन गया और न्यायपालिका मौन है। संविधान में किस पेज पर लिखा है कि हमारे संविधान में चार स्तम्भ हैं? कहीं नहीं लिखा। मुख्य न्यायाधीश महोदय क्षमा करें। संविधान में तीन पाए ही हैं चौथा पाया नहीं है। मीडिया पाया नहीं है, अगर वो कहता है कि मैं पाया हूं तो वो सरकार का हिस्सा बन गया। यानी वो जनता के साथ नहीं है। फिर उसको मीडिया की फैसेलिटी और फ्रीडम ऑफ स्पीच की जरूरत क्यों होनी चाहिए? मीडिया जनता के और सरकार के बीच सेतु है, पुल है। वह जनता की बात सरकार तक पहंुचाता है और सरकार की नीतियों को जनता तक पहुंचाता है। अगर वो सेतु सिमटकर, जनता से कटकर या हटकर सरकार के पाले में चला जाए तब मेरे किस काम का? हमने सब ने गर्व से कहना शुरू कर दिया कि मीडिया चौथा पाया है। जनता क्या पांचवां पाया है? लोकतंत्र किसके लिए है और क्या यह संभव है कि मीडिया के बिना लोकतंत्र जिन्दा रह सकता है। दुनिया के उन देशों को देखिए जहां मीडिया स्वतंत्र नहीं है, ईरान की बच्ची का उदाहरण देखिए उसके साथ बलात्कार हुआ। उसने उस की हत्या की तो हत्या के जुर्म में फांसी भी हो गई। उसी ईरान के अन्दर मैच देखने के लिए एक महिला को तीन साल की सजा दी गई। क्या आज के युग में ये न्याय संगत है! पर कौन बोला? उत्तर कोरिया के अन्दर किम जोंग ने कई लोगों को गोलियों से उड़ा दिया। क्योंकि वो टीवी पर दक्षिण कोरिया के कार्यक्रम देख रहे थे। कहां है मीडिया? जनता का सपोर्ट कहां है? उनकी आवाज कहां गई? जनता के लिए बोलने वाला ही कोई नहीं। चीन के थियेनमान स्`ायर में क्या हुआ? हमें सचमुच इस लड़ने वाले मीडिया को जिन्दा रखना है। आपको उसके अंदर कहीं लगता है कि कोई खराब तस्वीर छाप रहे हैं तो उसको पढ़ना, सुनना बंद कर दो। आपको कौन रोकता है। पांच सौ पचास अखबार बाजार मेें बिक रहे हैं। आपको जो अच्छा लगे वो लें। बाकी छोड़ दो। इसमें कोई रोक-टोक नहीं है। आपके ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं है।

हमारे सबके पास आरटीआई है। कौन कह सकता है कि नहीं है। हममें से कोई एक ऎसा है जो हाथ खड़े करके कहे कि मैं साल में दो बार देश के लिए आरटीआई का उपयोग करता हूं। एक नहीं मिलेगा। हम सब झूठ बोलते हैं कि मैं देश के लिए यह करता हूं, वो करता हूं। सवाल यह है कि मेरे खून में नहीं है। मां-बाप आजकल मुझे पढ़ाते नहीं हैं। उनको भी आजादी चाहिए। वो चाहते हैं कि दो पैसे आएं तो बच्चे को हॉस्टल में भेज दो। हम फ्री रहना चाहते हैं। स्कूलों के अंदर आदमी की मानवीयता की बात नहीं है। सिलेबस में कुछ नहीं केवल सब्जेक्ट हैं। हम पत्थर की मूर्तियां घड़ रहे हैं। इनमें मन की बात नहीं है, संवेदना नहीं है, आत्मा की बात नहीं है, ईश्वर की बात नहीं है। कोरा सब्जेक्ट पढ़कर मैं केवल पेट भरूंगा और उससे कुछ नहीं कर सकता। अगर मुझे बीस साल मां-बाप का पैसा खर्च करके पेट भरना सीखना पडे तो मैं समझता हूं कि मेरी इंसानियत की इससे बड़ी कोई तौहीन नहीं हो सकती। दुनिया के बहुत सारे प्राणी हैं जिनकी उम्र ही बीस साल नहीं है। वे सब पेट भरके और बच्चे पैदा करके मर जाते हैं। हमें पेट भरना सीखने के लिए बीस साल लगाने पड़ते हैं। हम एक अच्छा इंसान बनने के लिए कोशिश ही नहीं कर रहे। कोई मां अपनी बच्ची को अच्छे संस्कार देकर अच्छी मां बनने के लिए तैयार ही नहीं करती कि मेरी बच्ची इस घर से समाज को रास्ता दिखाएगी। किसी मां के पास बच्चे के पास बैठकर बात करने के लिए पन्द्रह मिनट का समय ही नहीं है तब वो बच्चा भी क्या करे। यह विषय इतना बड़ा है कि हम जिंदगी के सारे आयाम इसके साथ जोड़कर देख सकते हैं लेकिन हमें सबसे पहले यह देखना पडेगा कि हम अपना दायित्व पूरा कर रहे हैं या नहीं।

आज हमारे बच्चे जब मां-बाप और टीचर्स के साथ नहीं जुड़ पाए, धर्म के साथ भी नहीं जुड़ पाए तो जुड़े किससे। टीवी से, इंटरनेट से, मोबाइल से। और अब ले देकर दो-तीन मीडिया और आ गए। यहां कहीं किसी की कोई जिम्मेदारी ही नहीं है जो जिसके मर्जी आए कोई उठा-पटक कर डाले। बात को बतंगड़ बनाने के लिए समाज के अंदर कांटे बोए जा रहे हैं। इसको भी हमें गंभीरता से समझना पडेगा। छोटे-छोटे बच्चे इंटरनेट और इसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से अकेले जीना सीख रहे हैं । इसकी चिंता किसी को नहीं है। मैं अगर इंटरनेट पर बैठा हूं तो मुझे मेरे भाई की या बहन की चिंता नहीं है क्योंकि मुझे मालूम है कि उनको खुद अपनी चिंता है वो इंटरनेट पर बैठकर खुद कर लेंगे। मुझे समझना इतना ही है कि हम कौन से समाज का निर्माण कर रहे हैं। आज हमारे चारों तरफ देखते हैं तो हमको समाज के बैनर देखने-पढ़ने को मिलते हैं। समाजों के लिए पदाधिकारी काम भी करते हैं लेकिन दो पीढ़ी बाद कोई समाज नहीं रहेगा। मां-बाप को भी चिंता नहीं और ये गैर जिम्मेदार मीडिया आपको अकेला बना कर छोडेगा। चाहे वो मोबाइल हो, इंटरनेट हो या टीवी हो। इसलिए हम सब अंदर से एक मीडिया बन कर काम करें। जिम्मेदार साफ सुथरे मीडिया के अलावा किसी अखबार को, किसी टीवी चैनल को यह काम मत सौंपो। हम सब मिलकर मीडिया बनें, हम एक-दूसरे के साथ जुड़ें, एक-दूसरे के साथ राष्ट्र हित में संवाद करना सीखें हम सब मीडिया बन जाएंगे। हम शरीर से, बुद्धि से बात नहीं करें। हम मन से बात करेंगे तब हम एक-दूसरे के दिल को छू पाएंगे। जो बुद्धि से काम करने वाले हैं ये सब इगो वाले लोग हैं, अहंकार वाले लोग हैं इनके अंदर मिठास नहीं होती। हमें मिठास पैदा करनी चाहिए। मन में, आवाज में मिठास होनी चाहिए, दर्द होना चाहिए। मैं समझता हूं कि हम सब मिलकर बहुत अच्छा काम करेंगे क्योंकि युवा पीढ़ी में इतना जोश है, उनके बड़े सपने हैं। हमें उनके सपने को पूरा करना है। यही सपना इस देश का निर्माण करेगा।

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: