Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 11, 2015

बोए पेड़ बबूल…

दिल्ली को कांग्रेस मुक्त करने के लिए भाजपा को बधाई! भाजपा के अहंकार को चूर-चूर करने के लिए “आप” को साधुवाद! छह माह की छोटी सी अवधि में ही भाजपा ने लोकतंत्र को समेटना शुरू कर दिया था। अपने चुनावी घोषणा-पत्र को तो मानो नकारना ही था। हिन्दुत्व, धारा 370, समान नागरिक संहिता, अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को विशेष कवच, भूमि अधिग्रहण कानून, घर वापसी, लव जिहाद, लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना जैसे वादों पर भी पूरी तरह मुकर गई। दिल्ली चुनावों में हिन्दुत्व का कार्ड नहीं चल पाया क्योंकि कश्मीर का उदाहरण सामने बना रहा। जिस संघ के आग्रह पर नृपेन्द्र मिश्रा को कानून बदलकर लाए, उसी संघ को दिल्ली मुख्यमंत्री के नाम पर नाराज क रना अनुचित नहीं लगा। राज्यपालों को हटाने के लिए भाजपा ने जो तेवर दिखाए, अभी देशवासियों की स्मृति में ताजा है।

पेट्रोल के भावों में कमी का पूरा फायदा जनता को नहीं देना भाजपा के लिए हानिकारक सिद्घ हुआ। काले धन की वापसी, परमाणु बिल और बीमा बिल पर भाजपा का पलट जाना, चुनावी चंदे का हिसाब, मीडिया की खरीद-फरोख्त तथा लोकसभा में विपक्ष का दर्जा न देने का हठ, देश को कांग्रेस मुक्त करने का नारा, प्रशासनिक हलकों में भय की व्याप्ति, ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ में केन्द्र सरकार की अनुपस्थिति के मुद्दों की परतें भी इस चुनाव में उधड़ी, मानों यह राष्ट्रीय स्तर का चुनाव हो।

भाजपा ने इस चुनाव को “दीये और तूफान” की लड़ाई का रूप दे दिया, जिसने मतदाताओं के मानस को सर्वाधिक आहत किया। लगभग 125 सांसद, दो सौ के करीब संघ प्रचारक और बड़ी संख्या में संघ के कार्यकर्ताओं के अलावा स्वयं प्रधानमंत्री का चुनाव प्रचार का वृहद् स्वरूप (जहां उन्होंने कहा कि दिल्ली के विकास का उत्तरदायित्व सीधा मेरे ऊपर रहेगा)। साथ ही अन्य पदाधिकारियों का पिछले दिनों यह कहना कि हार का अर्थ नरेन्द्र मोदी के काम-काज का प्रमाण-पत्र नहीं माना जाए। यह भी अपने कि ए से मुकरने का उदाहरण ही माना जाएगा। मोदी को हार मानना स्वीकार नहीं होता तथा वे गांठें बांधकर हिसाब करने के लिए भी जाने जाते हैं। दिल्ली की हार को उन्हें स्वयं की हार ही माननी पड़ेगी। अमित शाह तथा अरूण जेटली कोई सफाई न दें तो अच्छा होगा। भाजपा को धमकाने वाली, सत्ता के अहंकार वाली राजनीति भी छोड़ देनी चाहिए। जैसा कि राहुल बजाज ने कहा है, भाजपा नेताओं को घोड़े से उतरकर जमीन पर चलने का अभ्यास भी बनाए रखना चाहिए। वरना, आने वाले समय में और भी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कोई भी पद स्थायी नहीं होता, यही सचाई है। सत्ता के भोग को योग सम्मत रखा जाए तो देश को भी लाभ मिलेगा।

भाजपा को पिछले छह माह में किए गए निर्णयों का भी आकलन करना चाहिए। विकास का रथ चल भी रहा है या केवल शब्द-जाल में अटका पड़ा है। राजस्थान में आठ माह में भाजपा का जनाधार सात प्रतिशत टूट गया, क्या इसमें केन्द्र की कोई भूमिका नहीं? मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को देखने का चश्मा भी बदलना पड़ेगा। ये कि तनी बड़ी त्रासदी है कि अधिकांश नियुक्तियां भी मैरिट के बजाय संघ की पर्ची से हो रही हैं। अभी कांग्रेस की नीतियां भाजपा के निर्णयों में जीवित दिखाई पड़ रही है। लोक प्रियता के कम होने का एक कारण यह भी है।

यह देश दिल्ली के मतदाता का आभारी रहेगा। किरण बेदी को जिस अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में उठाया, उसी को मारने भस्मासुर की तरह निकल पड़ीं। धत्! दिल्ली विधानसभा परिणाम देश को नई दिशा देंगे, सरकारी नजरिया लोकहित से जुड़ेगा, राजनेता देशहित में संकल्पवान बनेंगे, ऎसी उम्मीद की जानी चाहिए। कहते हैं कि ठोकर खाकर ही आम आदमी ठाकुर बनता है। पूछ लो अरविंद केजरीवाल से। हम देश की बगिया के माली बनें, मालिक नहीं! क्यों हम कांग्रेस मक्त होना चाहते हैं। वे देश पर अपना मालिकाना हक जमाने लगे थे। उनका अपना स्वार्थ (टू-जी, राष्ट्रमण्डल खेल, कोयला खनन आदि) देशहित से ऊपर दिखाई देने लगा था। भाजपा को इस तथ्य को दृष्टि से ओझल नहीं होने देना चाहिए। भाजपा का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि समय रहते उन्हें आंखें खोलकर चलने की नसीहत मिल गई। अपने आप को 125 करोड़ लोगों के सिर पर बैठने लायक साबित करेंगे, तो आने वाला कल भी उनका ही होगा।

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