Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 19, 2015

विकास के यमदूत

जब व्यक्ति समष्टि का चिंतन छोड़कर व्यष्टि भाव से बंध जाता है, तब जीवन में अनर्थ की शुरूआत हो जाती है। आज भारत में शिक्षा भी व्यक्ति प्रधान हो गई। समाज और देश के लिए कॅरियर का शिक्षा में कोई स्थान नहीं है। आज राजनीति भी व्यक्ति प्रधान हो गई है, कहने को भले ही जनप्रतिनिधि कहलाते हों। अत: सरकारी नीतियां भी अर्थ प्रधान होने लग गईं। व्यक्ति खो गया। यानी कि लोकतंत्र भी खो गया। यदि व्यक्ति की कहीं चर्चा है तो द्वेष भाव में ही रह गई है।

राजनीति में भी विकास का पहिया धन के इर्द-गिर्द ही घूमता है। अत: सरकारी तंत्र भी जनता को त्रस्त करके ही मस्त है। न पीने को स्वच्छ पानी, न इलाज के लिए दवाइयां। ऊपर से विकास का जहर। मानो पूरा तंत्र ही यमदूतों का कार्य कर रहा है। जयपुर में मेट्रो के नाम पर शहर टूटने लगा है । लोग भी मरेंगे। वैसे भी कौन से नहीं मरते। समय के साथ विकास तो चाहिए। पंजाब-हरियाणा से प्रतिदिन एक ट्रेन बीकानेर आती है जिसको “कैन्सर ट्रेन” कहते हैं। देश में विकास का ऎसा यमदूत अन्यत्र कहां मिलेगा। परन्तु सच है कि अगली पीढ़ी में प्रत्येक राज्य में ऎसी ट्रेनें होंगी। दवा निर्माताओं के नए कारखाने खड़े होंगे। राजस्थान के श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ के साथ फैलते नहरी क्षेत्र को विकास का यह जहर तो पीना ही पड़ेगा।

हमारी योजनाएं न हमारी संस्कृति से मेल खाती हैं, न हमारी भौगोलिक परिस्थितियों से। नकल करने के लिए समझने की जरूरत भी नहीं पड़ती। नीति बनाने वाले और लागू करने वाले एक-दूसरे को समझते तक नहीं हैं। जैसे डॉक्टर हर मरीज को एक पैमाने पर ही फिट मानते हैं, वैसे ही अधिकारी भी पूरे देश में एक सी नीति लागू करके विकास के आंकड़े तैयार करते हैं। खजाना कहीं और खाली होता जाता है, लोग कहीं मरते जाते हैं। गले पड़ जाए तो सरकारें मुआवजा देकर पिंड छुड़ा लेती हैं। आज प्रधानमंत्री उत्तरी राजस्थान के कृषि क्षेत्र में विकास का एक नया आयाम स्थापित करेंगे। किसानों के लिए “मृदा स्वास्थ्य कार्ड” योजना शुरू करेंगे। यह योजना भी रासायनिक खाद पर ही आधारित है। इसका लाभ खाद उत्पादकों को ही मिलने वाला है। अत्यधिक जल, रासायनिक खाद और कीटनाशकों की अनिवार्यता ही तो मिट्टी के यमदूत बने हुए हैं। हमने देखा है कि क्षेत्र की मिट्टी का हर कण कीटनाशकों से जूझ रहा है। मां के दूध में भी यह कीटनाशक घुल चुके हैं। पत्रिका में यह श्रृंखला छप चुकी है। कैंसर की नई ट्रेनें चालू होने वाली है। सरकारों को मरने वालों की चिंता नहीं है। खाद के आंकड़ों का लक्ष्य पूरा करना उनकी प्राथमिकता रह गई है। कारखानों का विकास ही क्या देश का विकास माना जाए?

गोपालक देश में कोई सरकार देशी खाद-बीज की बात नहीं करती। आज विश्व “ऑर्गेनिक” की ओर भाग रहा है जिसकी संभावनाएं भारत में सर्वाधिक है। हमारा नेतृत्व देश को अस्पतालों में भर्ती देखना चाहता है। पूरे श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ में शुद्घ मिट्टी बची ही नहीं है जिसकी जानकारी मृदा संरक्षण कार्ड में भरी जा सके। हां, सेम की समस्या ने गांवों को उजाड़ना शुरू अवश्य कर दिया है।

सरकारों को जनहितेषी योजनाएं लागू करनी चाहिए। अर्थ प्रधान आबकारी नीतियों की तर्ज पर जन स्वास्थ्य विरोधी योजनाएं तो लागू नहीं करनी चाहिए। वैसे भी सरकारों की अर्थसिद्धि जनता के काम तो आती नहीं है। कम से कम देश को विकास के यमदूतों से तो मुक्त रखना ही चाहिए। देशी जीवन में विदेशी जहर के प्रवेश पर प्रधानमंत्री अवश्य ध्यान देंगे। जो कुछ मृदा शुद्घ बची है, विधवा होने से बच सकेगी।

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: