Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 24, 2015

ओ छुट्टी जाने वाले!

संसद के बजट सत्र की शुरूआत और राहुल गांधी गए छुट्टी। कैसे जिम्मेदार नेता हैं। मां बीमार हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद नहीं है। संगठित होकर पद के लिए संघर्ष करना चाहिए था-संयुक्त विपक्षी दल। मेरी बला से। कांग्रेस नहीं तो कोई भी नहीं। मध्यप्रदेश के कांग्रेस-नियुक्त राज्यपाल पर इस्तीफे का दबाव। क्या उनको बचाने के प्रयास नहीं करने चाहिए? मानो जब पूरी कांग्रेस मृत प्राय: दिखाई पड़ रही है, तब एक को बचाकर कर भी क्या लेंगे! चल दिए छुट्टी पर! वो भी तीन-चार हफ्ते की। लोग क्या भगोड़ा नहीं कहेंगे। सच्चाई का सामना करने के डर से भाग खड़े हुए। जहां-जहां कांग्रेस हारी है, वहां के कार्यकर्ता क्या सोचेंगे। राहुल जी, जहां अभी चुनाव होंगे, वहां के कार्यकर्ता आपकी समझ पर कितना भरोसा कर पाएंगे! आपका निर्णय बहुत ही बचकाना है। आप किसी छात्रसंघ के नेता नहीं हैं। आपका विस्तार 125 करोड़ लोगों तक है। उन सबके प्रति आपका एक उत्तरदायित्व बोध स्पष्ट बना रहना चाहिए। आपका छुट्टी पर जाना जनसेवक के बजाय जनता के जैसा नजर आता है। जैसे आप केवल अपनी मर्जी के ही मालिक हैं। विपक्ष की भूमिका निभाने के प्रति आप जरा भी गंभीर दिखाई नहीं दिए।

आश्चर्य यह भी है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इस छुट्टी प्रकरण को आपके मन की टीस की अभिव्यक्ति बताया। एक अंग्रेजी चैनल तो बार-बार यही दिखा रहा था कि आप रूष्ट होकर जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2014 के बाद आप कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहते थे। आपकी माता जी के इर्द-गिर्द जो लोग हैं, उनसे आप खिन्न हैं। आप कई राज्यों के कांग्रेस अध्यक्षों तथा राष्ट्रीय महामंत्रियों को हटाना चाहते हैं। यह तो तभी संभव है, जब आप कांग्रेस के उपाध्यक्ष नहीं मालिक हों। उस हालात में भी आप मां-बेटे के बीच पीढ़ी का वैचारिक अन्तर तो रहेगा ही। इस दृष्टि से आपका छुट्टी पर जाना “घर से या कांग्रेस से जाना” जैसा ही अर्थ रखता है।

वैसे कांग्रेस की दशा और दिशा पर चिंतन-मनन राहुल गांधी पिछले 9-10 महिनों से कर रहे हैं। मई 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक हार के बाद उन्होंने हार की जिम्मेदारी लेते हुए चिंतन-मनन की बात कही थी। हुआ कुछ नहीं। फिर अक्टूबर 2014 में महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। तब भी उन्होंने जनादेश को विनम्रता से स्वीकारा और जनता का विश्वास हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करने की बात कही। हुआ तब भी कुछ नहीं और कांग्रेस जम्म्मू-कश्मीर हार गई। भाजपा भले न कर पाई लेकिन “आप” ने तो दिल्ली को कांग्रेस मुक्त तक कर दिया।

राहुल गांधी का लोकसभा के बजट सत्र में न आना उनका जिम्मेदारी से पलायन ही है। क्या इसी को नेतृत्व कहते हैं? अगर लोकसभा को वाक युद्ध का कुरूक्षेत्र मानें तो क्या यह मुकाबले से भागने का प्रयास नहीं है। आखिर राहुल लोकसभा से क्यों बचना चाहते हैं? यदि बचना ही है तो फिर उन्हें पार्टी की देशभर में लगातार हो रही हार की जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। जब पार्टी और उसके कार्यकर्ता हार की निराशा से उबरने के लिए अपने नेतृत्व की तरफ देख रहे हों और नेता भागता हुआ नजर आए तब वे संकट से बचाने के लिए किसे पुकारेंगे? बेशक हार कांटे जैसी चुभती है लेकिन भागना उसका समाधान नहीं है। यदि ऎसा होता तो 1984 के लोकसभा चुनाव में देश में केवल 2 सीटें पाने वाली भाजपा 2014 में पूर्ण बहुमत नहीं पाती।

राहुल के इस निर्णय में न तो परिपक्वता लगती है और न ही भारत जैसे देश को देख पाने की क्षमता उनमें नजर आती है। यदि नेतृत्व क्षमता होती तो क्या करना है यह वे 10 महीने में तय कर चुके होते। यदि ताकत होती तो सारे विपक्ष को साथ लेकर विपक्ष के नेता का पद कांग्रेस को मिले, इसके लिए लड़ते। वैसे ही जैसे बिहार में नीतीश कु मार को वापस लाने के लिए सब इकटा हुए। राष्ट्रहित में विपक्ष को एकजुट करने के लिए देशभर में अभियान चलाते। सरकार ने पिछले 10 महीने में जो कमी-खामी छोड़ी उसे लेकर आवाज उठाते। देश की जनता को यह दिखाते की गठबंधन से सरकार ही नहीं मजबूत विपक्ष भी बन सकता है। यह संसदीय लोकतंत्र का करिश्मा ही है कि लोक सभा हारकर भी विपक्ष राज्यसभा में तो आज भी बहुमत में है। उसके पास ताकत है। टांग अड़ाने की नहीं, जनता के हित में सरकार को झुकाने की।

राहुल की यह छुियां जितना उनकी खुद की छवि को नुकसान पहुंचाएगी, उससे कहीं ज्यादा इसका खमियाजा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ेगा। जीत में राजा, हार में भागा। आपको ऎसे वक्त पर तो इन्दिरा जी को याद रखना चाहिए था, जो आपातकाल के बाद 1977 में हारकर भी 1980 में पूरी शक्ति के साथ फिर सत्ता पर काबिज हो गई थीं। याद रहे नेतृत्व के लिए छुट्टी एक अभिशाप है।

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