Gulabkothari's Blog

मार्च 3, 2015

नीतिविहीन राजनीति

आखिर जम्मू और कश्मीर में भाजपा-पीडीपी की संयुक्त सरकार बन गई। दोनों ही दलों ने अपने-अपने मतदाता के सामने जो शपथ ली थी, उसे तोड़कर जनमानस-विरोधी शपथ ले ली। जनता मुंह बाएं अपने लुटते विश्वास को देखती रही। जिस हिन्दुत्व के नारे पर संघ ने भाजपा को केन्द्र में प्रतिष्ठित किया, जो वादे चुनाव घोषणा-पत्र में भाजपा ने जनता से किए, वे अगले चुनाव तक ठण्डे बस्ते में बंद कर दिए गए। छह साल पहले जनता भी उनको हटा सकती नहीं। विश्वपटल पर धर्मनिरपेक्ष दिखाई देना भी जरूरी है। “हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई” का नारा मुस्लिम देशों में पूरे दम से सुनाई देना चाहिए।

उधर, घाटी के मुसलमानों ने भाजपा को एक सीट भी नहीं दी, शत-प्रतिशत अविश्वास जताया, वहां पीडीपी ने भी मतदाता के साथ दगा किया। पूर्व गृह मंत्री (केन्द्रीय) मुफ्ती मोहम्मद सईद को भाजपा ने भी मुख्यमंत्री स्वीकार कर लिया, जिन्होंने अपनी बेटी को छुड़ाने के बदले में खूंखार अपराधियों को रिहा करवाकर देशभक्ति का परिचय दिया था। गत 26 फरवरी को सईद ने अनुच्छेद 370 के सवाल पर कहा था कि इन मुद्दों को छोड़ दीजिए। हमें यह सब करना पड़ता है।

चुनाव प्रचार के वीडियोे निकालकर देखे जाने चाहिएं। भाजपा के किस नेता ने अनुच्छेद 370 का विरोध नहीं किया। स्वयं प्रधानमंत्री ने भी नवंबर में जम्मू किचवाड़ रैली में अपने मत को दोहराया था। घाटी के मतदाताओं के इतने बड़े भाजपा-विरोध का कारण भी यही 370 का अभियान बन गया।

उधर, दिल्ली विधानसभा चुनावों में हिन्दुत्व का नारा यही रंग लाया। कहना मुश्किल है कि इन दोनों परिस्थितियों में संघ भीतर ही भीतर क्या सोचता होगा। मुद्दा केवल 370 हटाने का ही नहीं था। सेना की विशेष शक्तियों को यथावत बनाए रखने, आजादी के बाद आए हिन्दू शरणार्थियों की नागरिकता, अलगाववादियों से बातचीत हो, न हो, जैसे अन्य अहम मुद्दे भी थे। इस दृष्टि से भाजपा तथा पीडीपी विरोधी विचारधारा के रहे हैं।

हमने देखा कि अचानक, न्यूनतम साझा कार्यक्रम की घोषणा से पहले ही, भाजपा ने पीडीपी को मार्ग देना शुरू कर दिया। भाजपा की केन्द्र सरकार ने विश्वकप के नाम पर पाकिस्तान से बात शुरू की, विदेश सचिव इसी माह पाकिस्तान जा रहे हैं, अलगाववादियों से स्वयं प्रधानमंत्री चुनाव पूर्व ही मिल लिए तथा अनुच्छेद 370 को बनाए रखने की घोषणा लोकसभा में हो गई। सैन्य बल विशेष कानून पर भी भाजपा झुकने को तैयार है। सत्ता पाने के लिए भले ही भाजपा अपने चुनाव घोषणा पत्र की अर्थी निकाल दे। देश के साथ खेला गया हिन्दुत्व का कार्ड भी छलावा साबित हो जाए तो कोई बात नहीं। तब यह भी हम सुन लेंगे कि “संघ अलग होता है तो भले ही हो जाए।”

चुनाव परिणामों के करीब दो महीने बाद बनी इस सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम से यह स्पष्ट है कि दोनों ही पार्टियों ने सत्ता के लिए अपने-अपने मत को ताक पर रख दिया है। जनता जानती है कि दोनों ही पार्टियों का अब तक का इतिहास अपने-अपने मत पर अडिग रहने का है। भाजपा के नेताओं-श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मुरली मनोहर जोशी- ने तो कश्मीर समस्या पर आंदोलन किए/यात्राएं निकाली हैं। मुखर्जी ने जो, पण्डित नेहरू के नेतृत्व वाली पहली केन्द्र सरकार में मंत्री थे, मंत्री पद से इस्तीफा ही नेहरू से पाकिस्तान और कश्मीर पर विरोध की वजह से दिया। बाद में मुखर्जी ने तब के संघ प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर की सहमति से भारतीय जनसंघ बनाई। इसके बाद 1953 में वे “एक देश, एक निशान, एक प्रधान और एक विधान” की मांग करते हुए कश्मीर गए। उन्होंने कश्मीर के विशेष दर्जे का भी विरोध किया। वहीं उन्हें गिरफ्तार किया गया और वहीं रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। जनसंघ और फिर भाजपा हमेशा उन्हें उद्धृत करते हुए उनकी मांगों को दोहराती रही। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष जोशी ने इन्हीं मुद्दों पर 1991 में कन्याकुमारी से श्रीनगर तक “एकता यात्रा” निकाली और संगीनों के साये में तिरंगा फहराया।

दोनों पार्टियां भले सहमत नहीं हों और इसे जनादेश का एकमात्र विकल्प बताएं, लेकिन जनता इसे सत्ता के लिए समर्पण से ज्यादा कुछ नहीं मानती। दोनों पार्टियों के नेतृत्व को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि जिस भी दिन उनमें से किसी एक के हितों पर आंच आई, सरकार गिर जाएगी।

जहां तक कश्मीर घाटी की जनता का सवाल है वह गठबंधन को मन से स्वीकार करने को तैयार नहीं है। स्थानीय लोगों पर पत्रिका द्वारा किए साक्षात्कारों के अनुसार (1) दोनों दलों ने कुर्सी के लिए अपनी विचारधारा से समझौता किया है (2) उन्हें विकास के लिए काम करना चाहिए (3) सुरक्षा बलों के विशेष अधिकारों का कानून समाप्त कराने का प्रयास करना चाहिए (4) भाजपा के मंत्रियों को समारोह में बुलाना उनकी हैसियत की वजह से होगा, दिल से नहीं (5) यह गठबंधन जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों की जनता को संतुष्ट करेगा!

जहां तक राजनेताओं का सवाल है भाजपा और पीडीपी के नेताओं को छोड़कर कोई भी इसके पक्ष में नहीं है। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर से जुडे चिंतक-विचारक भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। सभी इसे दोनों दलों का सत्ता के लिए समझौता ही मान रहे हैं। साथ ही यह भी कि इस गठबंधन से पीडीपी को हो ना हो भारतीय जनता पार्टी को अगले चुनाव में नुकसान होगा।

अब भी बड़े सवाल देश और जनता के सामने हैं-

(1) क्या कश्मीर देश की मुख्य धारा में शामिल हो सकेगा?
(2) क्या देश के अन्य हिस्सों में रह रहे भारतीयों को जम्मू-कश्मीर में बसने की छूट मिलेगी?
(3) क्या कश्मीरी पण्डितों को न्याय मिलेगा?
(4) क्या कश्मीर से आतंकवाद समाप्त हो सकेगा?
(5) 1947 के शरणार्थियों को भारत की पूर्ण नागरिकता मिलेगी?

शपथ ग्रहण के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सईद ने जो भाषा काम में ली, वह कहीं से भारतीयता का समर्थन करती तो दिखाई नहीं दे रही, बल्कि पाकिस्तान की ओर झुकाव ही नजर आ रहा है। न्यूनतम साझा कार्यक्रम, विशेष रूप से पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों का बिन्दू भी कुछ ऎसा ही है। ऎसे मुद्दों पर सहमति प्रकट करना क्या भाजपा के लिए तर्कसंगत है? सत्ता पर काबिज होने के लिए कुछ भी मान लो! पीडीपी की शर्तो पर भाजपा इतने समझौते कर सकती है-यह आश्चर्य की बात है। जिन लोगों ने नरेन्द्र मोदी को सत्ता में बैठाया, यह बात उनके गले कैसे उतरेगी?

यह देश धर्म के नाम पर कभी नहीं बंटा, किन्तु राजनीति के नाम पर जातिवाद की भेंट चढ़ गया। कांग्रेस ने मुस्लिम कार्ड खेला, आरक्षण से हिन्दुत्व की अवधारणा के टुकड़े कर दिए। अब भाजपा की सत्तालोलुपता देश में बाहरी शक्तियों को निमंत्रण दे रही है। हिन्दू-मुसलमान दोनों का ही विश्वास आहत हुआ है। कहीं महर्षि वेदव्यास की बात, जो उन्होंने भागवत महापुराण (एक टीका के अनुसार) में लिख दी थी, सच न हो जाए कि भारत में एक काल आएगा, जब यहां कोई राजा नहीं होगा। यानी कि लोकतंत्र रहेगा। किन्तु उसकी अवधि 99 वर्ष ही रहेगी। इसमें से 67 वर्ष गुजर चुके हैं।

नवाधिकां च नवतिं मौना एकादश क्षितिम्।

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