Gulabkothari's Blog

जून 2, 2015

अब भी समय है…

कश्मीर में सत्ता का मोह छोड़ना भी हो तो छोड़ दें। जनता का भरोसा न तोड़ें। नारों के पर्दे में छद्म युद्ध को प्रश्रय कदापि न दें।

मन की तीन अवस्थाएं होती हैं- जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। आजादी के समय जो जागृति इस देश में दिखाई पड़ रही थी, वह विकास के सपने देखते-देखते सरकारों की सुषुप्ति का शिकार हो गई। आज जिनके साथ बंटवारा किया था, वे फिर से देश में खुलेआम घुस रहे हैं, पड़ोसी देश का झण्डा फहरा भी रहे हैं और यह भी धौंस दे रहे हैं कि आगे भी फहराएंगे। और हम? बहानों पर बहाने बनाते रहते हैं, जन भावना को दर-किनार करके सत्ता सुख के साथ चिपके रहते हैं। परिणाम कुछ और ही निकल रहे हैं। अफसरों और नेताओं को जनता के दर्द से कोई वास्ता ही नहीं। उस दर्द को तो चुनावों में भुना लिया और फाइल भी कर दिया। हुर्रियत कांफ्रेंस के अध्यक्ष सैयद अली शाह गिलानी के आज के बयान में एक ठोस सच्चाई है, जिसे सरकार को स्वीकार करके उचित कदम उठाने चाहिए। कश्मीर में सत्ता का मोह छोड़ना भी हो तो छोड़ दें। जनता का भरोसा न तोड़ें। नारों के पर्दे में छद्म युद्ध को प्रश्रय कदापि न दें। सरकार को आज भी यदि यह नहीं सूझे कि उसे क्या क रना चाहिए, तो उसे जनता के पास राय लेने जाना चाहिए। संकल्प के साथ कि जो कुछ जनता कहेगी उसे लागू किया जाएगा। भले सत्ता छूट जाए। जनता फिर ले आएगी सत्ता में। यदि जनभावनाएं आहत होती रहीं, सरकारें वादों से मुकरती रहीं तो जनता भी मुकर सकती है।

जब भारत आजाद हुआ तब नागरिकों की आंखों में कितनी आशाओं के दीप जल रहे थे। हम स्वतंत्र होंगे। “किसके भरोसे होंगे?” शायद इस प्रश्न पर “सत्ताधिकृत मनोवृत्ति” के आधार पर चिन्तन नहीं किया गया। सब कुछ चयनित प्रतिनिधियों के विवेकाधिकार पर ही छोड़ दिया गया। परिणाम देश के आगे है। क्या खोया क्या पाया इसका आक लन ह्वदय विदीर्ण करने वाला है। पहला परिणाम तो यह है कि गरीबी साल-दर-साल बढ़ रही है, पीने का पानी रीत सा गया है। दूसरा परिणाम आया कि आरक्षण के नाम पर देश के आधे-आधे दो धड़े कर दिए गए। हर गांव-मोहल्ले में राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता का खण्डन-विखण्डन होता दिखाई पड़ने लगा है। वृहद् स्तर पर जम्मू और क श्मीर प्रान्त इसका ज्वलंत उदाहरण है। बाकी देश भी विकास के चोले में इसी मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।

तीसरा अप्रत्याशित वीभत्स दृश्य यह है कि सरकारें देश को (जमीन को, उद्योग को) बेचने में व्यस्त हैं। डॉलर मिल जाए तो कहने ही क्या! क्या बचेगा अगली पीढियों के लिए? लोकतंत्र का केन्द्रीकरण ही भावी गुलामी का संकेत है। प्रतिनिधि अब जनता का काम नहीं करता। वह भी छोटा-मोटा राजा ही बन जाता है। उसके परिजन तो सामन्तों को भी पीछे छोड़ने लगे। इसीलिए लोकतंत्र के नाम पर वंशवाद- जातिवाद-क्षेत्रवाद गहराता चला गया। तंत्र का “स्व” स्वरूप बदल गया।

जम्मू एवं कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, किंतु केन्द्र की अर्द्ध-मानसिकता, क्षुद्र राजनीति इसे शंकित बनाए हुए है। देश का सिर विक्षिप्त अवस्था में है। संघ और भाजपा के हिन्दुत्व के नारे, संकल्प और वादे भी थोथे साबित हुए। सत्ता में आते ही ये भी अन्य दलों की तर्ज पर बदलते चले गए। सन् 1947 के हिन्दू शरणार्थी आज तक भारतीय नागरिक नहीं बन सके। जम्मू और कश्मीर में आज भी भारत का संविधान एवं ध्वज स्वीकार नहीं किया गया। न ही उनको समान रूप से देश का नागरिक ही माना गया। हमारे लिए वहां बसना संभव ही नहीं है। जब कश्मीरी पंडित सन् 1947 की तर्ज पर मार- काटकर कश्मीर से निकाले गए, सरकार और सभी संगठनों को सांप सूंघ गया था। यही स्वतंत्रता का चरम नजारा है।

वर्तमान भाजपा सरकार ने जिस प्रकार मुखौटा ओढ़कर कश्मीर के अलगाववादियों से समझौता किया है, इसमें देशहित का संदेश ढक गया और येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना ही साबित हुआ है। तब यह भी स्पष्ट है कि यह सरकार भी पिछली सरकारों से हटकर कुछ करने वाली नहीं है। न तो आरक्षण के हटने की संभावना ही है और न बांग्लादेशी वापस जाएंगे। वो समय दूर नहीं जब सम्पूर्ण देश ही कश्मीर जैसा नजर आएगा। इस दृष्टि से कश्मीर के हालात का आकलन महत्वपूर्ण भी है और अनिवार्य भी। शेख, फारूख और उमर अब्दुल्ला को केन्द्र ने सिर पर बैठाया, मुफ्ती मोहम्मद जैसों को केन्द्रीय गृह मंत्री तक बनाया। उन्होंने देश को क्या दिया? गुलाम नबी आजाद भी मुख्यमंत्री रहे, क्या करके दिखाया? अब भाजपा भी सपने बुन रही है, बहती गंगा में हाथ धोने का। इसमें गलत क्या है? जिसकी लाठी, उसकी भैंस।

कश्मीर जाकर ही समझा जा सकता है, वहां के जनमानस को। लोकतंत्र के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया को और भारत सरकार के प्रति उनके दृष्टिकोण को। मैं जब जम्मू-कश्मीर गया तब वहां के तीनों क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर-लेह) में अलग-अलग तबके से बातचीत की। पाकिस्तान से आए हिन्दू (शरणार्थी) शिविरों का भी दौरा किया। लोगों से लम्बी-चर्चाएं करके उनकी आप-बीती सुनी। ऎसा लग रहा था मानो कलेजा फट जाएगा। आज तक वहां सरकार में किसी का कलेजा नहीं फटा, तब स्पष्ट हो जाता है कि किसी ने कुछ नहीं सुना। इसके ठीक विपरीत पंडितों के लिए सन् 1947 को दोहराया गया, और उनको खदेड़कर शरणार्थी शिविरों में बसा दिया गया। उनके लिए यही स्वतंत्रता का प्रसाद बन गया। जो पंडित भारत में बस गए, उन्होंने भी मुड़कर नहीं देखा। सच ही कहा है कि सत्ता में संवेदना नहीं होती।

इस दौरे के कुछ समय बाद चुनावी सरगर्मी परवान चढ़ गई। दौरे में लोगों की जो मानसिकता सामने आई, वही चुनाव में भी प्रकट हुई। हां, लोगों को उम्मीद थी कि भाजपा सत्ता में आने के बजाय विपक्ष में बैठकर लोगों के लिए संघर्ष करेगी। भाजपा दिलों को जीतने का यह अवसर चूक गई। सच की भी नहीं चली। अब तो समय ही तय करेगा। यह तो तय है कि हमारी पकड़ वहां कमजोर होती जा रही है। इसका एक कारण हमारे विदेश विभाग का संकल्पहीन होना भी रहा है। मानो वह इस समस्या को सुलझाना ही नहीं चाह रहा। एक बार तो ठण्डा कर देते, तो कश्मीर नासूर नहीं बनता। अब पूरा देश त्रस्त है।

जम्मू-कश्मीर में सत्ता की तानाशाही भी है और फिरकापरस्ती की मुंह बोलती तस्वीरें भी। वहां लोकतंत्र की डूबती हुई आशा का चीत्कार भी है। एकमात्र केन्द्र सरकार से ही आशा है कि वह पुरानी सरकारों की तरह अपने वादों को भुलाएगी नहीं। आने वाले दस वर्ष को ध्यान में रखकर जो तैयारियां वहां की सरकार ने जाजम पर रखी हैं, उनको समझकर, उखाड़कर लोकतंत्र में आस्था पैदा करना आज हमारी आवश्यकता है। अन्यथा दस वर्ष बाद किसी भी भारतीय राजनीतिक दल को वहां सत्ता में स्थान नहीं मिलेगा। तब स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने में कितना वक्त लग सकता है? हमारे देश में भी हालात उस ओर बढ़ रहे हैं। सच्चाई बहुत कड़वी है। सत्ता के डण्डे से नकारा भी जा सकता है और सुधार भी स्वीकृत हो सकते हैं। आवश्यकता इस नारे को फिर से बुलन्द करने की है-

“हिन्दी हैं हम, वतन है, हिन्दोस्तां हमारा।
सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा।।”

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