Gulabkothari's Blog

जून 21, 2015

योगक्षेमं वहाम्यहम्ः “भोग” के दौर में जरूरी है “योग”

शायद तुम आशा बनाते हो कि अब योग के द्वारा तुम कुछ पा लोगे। योग का अर्थ है कि अब कोई आशा न बची, अब कोई भविष्य न रहा, अब कोई इच्छा न बची।

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सितम्बर, 2014 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में कहा था -“योग मस्तिष्क तथा शरीर, विचारों और क्रिया, संयम तथा पूर्णता, मानव एवं प्रकृति के बीच सद्भाव का समागम है। यह स्वास्थ्य और कल्याण के लिए समग्र पहल प्रदान करता है। इसके लिए खास दिन, 21 जून वह तारीख है जब उत्तरी ध्रुव में दिन की अवधि सबसे लम्बी होती है। दुनिया के कई हिस्सों में यह दिन महत्वपूर्ण माना जाता है।” संयुक्त राष्ट्र महासभा में 11 दिसम्बर 2014 को योग दिवस (21 जून) की घोषणा कर दी गई। भारत के इस प्रस्ताव को 177 देशों का समर्थन मिला, जिनमें 47 मुस्लिम देश शामिल हैं।

ईसाई और मुस्लिम देशों का मानना है कि योग का धर्म से नहीं फिटनेस से सम्बन्ध है। इस्लाम में सूर्य के सामने झुकना स्वीकार्य नहीं है और न ही वे कोई श्लोक ही बोलेंगे।

योग को लेकर देश के विभिन्न राजनीतिक दल भी भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं दिखा रहे हैं। हर पक्षी की अपनी बोली होती है। तभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक ही ललित प्रकरण में सुषमा स्वराज को बचाना चाह रहे हैं। उनकी ही छुट भैय्या वसुन्धरा राजे को निपटाने की सोचते जान पड़ रहे हैं। सुषमा को ही रेड्डी बन्धुओं के जाल से भी बचाया गया था। खुले आम “खाने की छूट”, मगर राजनीति के दांव-पेच के साथ। उन्होंने ही कहा था-“न खाऊंगा, न खाने दूंगा।” योग दिवस लम्बी दूरी का घोड़ा है। राजनीति इसमें भी है किन्तु संयुक्तराष्ट्र की भागीदारी ने इस योग को व्यायाम की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख “बान की मून” ने योग को सबके लिए जरूरी बताया है। वह कहते हैं-“योग का ताल्लुक धर्म से नहीं है। यह निष्पक्ष है। धर्मो के बीच भेदभाव नहीं करता। जो योग करेगा, उसे इसका फायदा होगा।” स्वामी विवेकानन्द तो यहां तक कह गए थे कि जाति, धर्म, राष्ट्र, भाषा, परम्परा आदि सब देश-काल के साथ बदल जाते हैं। इनमें समन्वय के लिए परिपूरकता लानी पड़ेगी। “शरीर इस्लाम का हो, आत्मा वेदान्त की।”

पतंजलि ने योगसूत्र में कहा है-योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:। अर्थात् योग सांसारिक जीवन का मार्ग नहीं है। जहां मन एवं इन्द्रियां स्थिर हो जाएं, बुद्धि निश्चेष्ट हो उस अवस्था को योग कहते हैं। जबकि गीता में कह रहे है कि योग में स्थिर रहकर कर्म करो।

योगस्थ: कुरू कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

हे धनंजय! तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित होकर कर्तव्य कर्मो को कर। समत्व ही येाग कहलाता है।

तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय:।
उपविश्यासने यु†ज्यद्योगमात्मविशुद्धये।।

उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्त:करण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास कर।

तपस्विभ्योअधिको योगी ज्ञानिभ्योपि मतोधिक:।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।

योग करने वाला योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है। वह शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकामकर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ होता है, इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।

उपर्युक्त श्लोकों से प्रमाणित हो जाता है कि योग कोई धर्म नही है और न ही कोई चिकित्सा पद्धति। योग का अर्थ जोड़ना है। जीव जहां से निकला है, वहीं से उसे जोड़ना है। शरीर नश्वर है, माता-पिता प्रदान करते हैं, मानव का है। आत्मा शाश्वत है, ईश्वर अंश है। जहां आत्मा केन्द्रस्थ रहती है, वहीं मन इन्द्रियों के माध्यम से भटकता रहता है। कृष्ण कहते हैं-“ईश्वर अंश जीव अविनाशी…” “ममैवांशो जीवलोके…” स्वामी रामानुजाचार्य ने भी योग-क्षेम की जो परिभाषा दी है उसमें परमात्मा की प्राप्ति को ही “योग” माना है। यदि परमात्मा की प्राप्ति हो जाए तो मोक्ष हो ही गया। पुनर्जीवन का चक्र ठहर जाएगा। इस अपुनरावृत्ति को ही “क्षेम” कहा गया है। जबकि व्यवहार में योग के अनेक विवरण देखने को मिलते है। “योग: कर्मसु कौशलम्” तो अनेक शिक्षण संस्थानों का ध्येय वाक्य बना हुआ है।

इसी प्रकार गीता को देखें कि कौनसी जीवनचर्या योग से बाहर रह सकती है। आप कुछ भी क्रिया करें, वह कर्मयोग का ही रूप होगा। कुछ ज्ञानयोग एवं भक्तियोग हो जाएगा। तब यदि महर्षि अरविन्द कहते हैं कि सम्पूर्ण जीवन ही योग है, तो गलत क्या है? गीता को तो योगशास्त्र ही कहा गया है और कृष्ण को योगेश्वर। बड़ा रहस्य है इस योग शब्द में। कृष्ण ने यह कहकर और भी रहस्यपूर्ण बना दिया कि -“नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:।”

कृष्ण ने गीता में तीन योग दिए-कर्म, ज्ञान और भक्ति। पं. मधुसूदन ओझा ने तीनों ही योगों को बुद्धियोग से आवृत्त कर दिया। कृष्ण कहते हैं कि अपनी बुद्धि मुझ में लगा दे। स्वयं का कतृüभाव छोड़ दे। तभी योग में प्रवेश करने का द्वार खुल पाएगा। योगी-भोगी-रोगी की समाधि, आधि और व्याधि अवस्था मानी गई है। इनमें भी श्रेष्ठ योगमार्ग ही बताया गया है। यही कारण है कृष्ण अर्जुन को भी योगी हो जाने की सलाह देते हैं। शायद विश्व को गीता की यह देन (गीता और योग) अद्भुत है। आज पांच हजार साल बाद भी गीता विश्व में छाई हुई है।

मन आत्म-रूप भी है और त्रिगुणात्मक रूप भी। सृष्टि रूप में वह प्राण और वाक् से जुड़कर बाहर की ओर, आत्मा से दूर भागता है। जैसे जल धारा बनकर उद्गम से दूर जाता रहता है। आत्मविहीन होकर भटकता रहता है। रूग्ण नहीं है मन। योग इस मन को अन्तर्मुखी बनाकर विज्ञान तथा आनन्द की ओर मोड़ता है। आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् हमारे पांच कोश हैं (आत्मा के)। यह स्वयंभू की, अव्यय पुरूष की पांच कलाएं हैं। ब्रह्मा ही स्वयंभू लोक के अधिपति हैं। तभी मैं कहता हूं-“अहं ब्रह्मास्मि”। इस “स्वयं” अथवा “स्व” को पाना ही योग का लक्ष्य कहा है। व्यवहार जगत् का “योग:-क्षेम” सूक्ष्म जगत् में यही अर्थ रखता है। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने लिखा है-

धर्म ते विरति जोग ते ज्ञाना।
ज्ञान मोच्छप्रद वेद बखाना।।

आत्मा के उपर्युक्त पांचों आवरण हटाना ही आत्म साक्षात्कार है। तब इसमें धर्म कहां है? संकीर्णता कहां है? क्या व्यक्ति अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश से मुक्त होकर शान्ति में स्थिति नहीं चाहता? हमारे संविधान के शुरू में जो चार अनिवार्य लक्ष्य तय किए गए हैं- न्याय, स्वतन्त्रता, समानता और विश्व-बन्धुत्व, वे देश-काल के अनुरूप योग का व्यावहारिक स्वरूप ही हैं। ओशो ने लिखा है-

“जैसा मनुष्य है, वह सत्य के साथ नहीं जी सकता। इस बात को बहुत गहरे में समझने की जरूरत है क्योंकि इसे समझे बिना उस अन्वेषण में नहीं उतरा जा सकता जिसे योग कहते हैं। मन लगातार सपने, रूप और कल्पनाएं बनाता जा रहा है। नींद की जरूरत है ताकि तुम सपने देख सको। रात में कुछ समय होता है गहरी नींद का और कुछ समय होता है सपनों का। नींद यदि उस समय टूटे जब तुम सपने देख रहे हो तब सुबह तुम स्वयं को बिलकुल थका हुआ और निढाल-सा पाओगे।

योग सत्य को उद्घाटित करने की एक पद्धति है। योग तो एक विधि है स्वप्नविहीन मन तक पहुंचने की। योग विज्ञान है-अभी और यहां होने का। योग का अर्थ है कि अब तुम तैयार हो कि भविष्य की कल्पना न करोगे। तुम्हारी वह अवस्था है कि अब तुम न आशाएं बांधोगे और न स्वयं की सत्ता से, वर्तमान क्षण से आगे छलांग लगाओगे। योग का अर्थ है-सत्य का साक्षात्कार-जैसा वह है।

योग के मार्ग में वही प्रवेश कर सकता है जो अपने मन से जैसा वह है, बिलकुल थक गया हो, निराश हो गया हो। यदि तुम अब भी आशा किए चले जा रहे हो कि तुम मन द्वारा कुछ न कुछ पा लोगे, तो योग का यह पक्ष तुम्हारे लिए नहीं है। समग्र पराजय का भाव चाहिए, इस सत्य का रहस्योद्घाटन कि यह मन जो आशाओं को पकड़े रखता है, यह मन जो प्रक्षेपण करता है, यह व्यर्थ है, यह निरर्थक है और यह कहीं नहीं ले जाता। यह मन तुम्हारी आंख बंद कर देता है, तुम्हें मूर्च्छित करता है और कभी भी सत्य तुम्हें प्रगट हो सके इसका कोई मौका नहीं देता। यह मन तुम्हें सत्य से बचाता है।

क्योंकि तुम्हारी रूचि भी मन के कारण ही बनती है। शायद तुम आशा बनाते हो कि अब योग के द्वारा तुम कुछ पा लोगे। योग का अर्थ है कि अब कोई आशा न बची, अब कोई भविष्य न रहा, अब कोई इच्छा न बची। अब व्यक्ति तैयार है उसे जानने के लिए, जो है। केवल वास्तविकता ही मुक्ति बन सकती है। योग कोई धर्म नहीं है, योग तो एक विशुद्ध विज्ञान है।

योग मृत्यु तथा नवजीवन दोनों ही है। तुम जैसे हो, उसे तो मरना होगा। और जब तक पुराना मरेगा नहीं, नए का जन्म नहीं हो सकता। नया तुममें ही तो छिपा है। तुम केवल उसके बीज हो। और बीज को गिरना ही होगा, धरती में पिघलने के लिए। बीज को तो मिटना ही होगा, केवल तभी तुममें से नया प्रकट होगा। योग दोनों है- मृत्यु भी और जन्म भी।

योग दर्शन-शास्त्र नहीं है। योग कोई शास्त्र नहीं है, योग अनुशासन है। यह कुछ ऎसा है जिसे तुम्हें करना है। तुम तभी सुन सकते हो, यदि वह “क्षण” तुम में उपस्थित हो चुका है। अनुशासन का अर्थ है अपने भीतर एक व्यवस्था निर्मित करना। तुम एक नहीं हो, तुम भीड़ हो। जब तुम कहते हो “मैं” तो कोई मैं होता नहीं। तुम्हारे भीतर अनेक “मैं” अनेक अहं हैं। सुबह कोई एक “मैं” है, दोपहर कोई और “मैं” है और शाम कोई तीसरा ही “मैं” होता है। कोई अंतस केन्द्र ही नहीं है, जिसे इसका बोध हो पाए। योग तुम्हारे भीतर एक एकजुट केन्द्र का निर्माण करना चाहता है। जब तक तुम केन्द्र नहीं पा लेते, जो कुछ भी तुम करते हो वह व्यर्थ है।

आनन्द का अर्थ है, एक परम मौन। जब भीतर लयबद्धता हो, जब सारे बेमेल टुकड़ों का मेल हो जाए, वे एक बन जाएं, जब भीड़ न रहे बल्कि केवल एक ही हो। जब तक तुम स्व-केन्द्रित न हो जाओ।

तुम संसार की सेवा करना चाहते हो, लेकिन तुम हो कहां? मैं तुम्हारे भीतर किसी को नहीं देख रहा। मैं देखता हूं और वहां कोई नहीं है। अनुशासन का मतलब है होने की क्षमता, जानने की क्षमता, सीखने की क्षमता। यदि तुम अपना शरीर हिलाए बिना मौन रहकर कुछ घण्टे बैठ सकते हो, तब तुम्हारे भीतर होने की क्षमता बढ़ रही है। तुम आत्मस्थ नहीं हो। तुम एक सतत कंपित ज्वरग्रस्त हलचल हो। यह ठहरना अंतस के केन्द्रीयकरण में सहायक होगा। यदि शरीर अगतिमान है और मन भी अगतिमान है।

रोगियों के लिए योग नहीं है। यह उनके लिए है जो चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से तो पूरी तरह स्वस्थ हैं।

योग समन्वय है अस्तित्व के साथ, दिव्य सत्ता के साथ।

योग मन की समाप्ति है। योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।

योग अ-मन होने की अवस्था है।

मन की समाप्ति का अर्थ है जो जाना है, उसकी समाप्ति, जो जानना है उसकी समाप्ति। यह एक छलांग है अज्ञात में।

मन एक वृत्ति है, क्रियाशीलता है।

मन एक क्रिया मात्र है।

यदि यह क्रिया है तो फिर उस क्रिया को क्रियान्वित मत करो, बस, हो गई बात।

“पातंजल योग दर्शन” तो गीता के बाद का है। “योगवाशिष्ट” गीता से पूर्व काल का है किन्तु स्वयंभू सृष्टि आरम्भ है। धारणा-ध्यान-समाधि भी योग नहीं है। सर्वप्राचीन ऋग्वेद ने योग की सर्वप्रथम दृष्टि दी है, जो मूलत: योग का ऎसा स्वरूप है जो इह को पर से जोड़ता है, बाह्य से अन्तस् की यात्रा का सृजन करता है।

ऋषभं मा समानानां सपत्नानां विषासहिम्।
हन्तारं शत्रूणां कृधि विराजं गोपितं गवाम्।।

हे शत्रुनाशनाभिमानी इन्द्र! मुझे मरे कुलवालों में समकक्ष व्यक्तियों के मध्य में वृषभ के समान श्रेष्ठ बनाओ तथा शत्रुओं को विशेष रूप से हराने वाला बनाओ। जो हमारे कुल में ही उत्पन्न होकर हमारा ही अनिष्ट करते हैं, वे शत्रु हैं। उनको तथा दूसरे शत्रुओं को भी मारने वाला (मुझे) बनाओ और विशेषरूप से शोभायमान गोस्वामी मुझे बनाओ। न केवल एक ही गाय का स्वामी अपितु समस्त गायों का स्वामी बनाओ। यहां वृषभ मन का और गौ इन्द्रियों का प्रतीक हैं। शत्रु पंचक्लेश हैं। इन्द्रियों का शासक इन्द्र है।

सूक्त के पांच मंत्रों का सार यही है कि हम पंचक्लेश रूपी सभी शत्रुओं को पराजित कर योगी की भांति विद्या भाव में प्रतिष्ठित हो जाएं। व्यायाम को योग कहना तो ज्ञान का अपमान है। हमारी अज्ञानता भी प्रकट होती है। योग की व्याख्या सभी धर्मो और मान्यताओं एवं राजनीति से ऊपर होनी चाहिए। ताकि उसे सभी लिप्सित (इच्छित) मानकर प्राप्ति के लिए एकजुट एवं एकमत हो सकें।

4 टिप्पणियाँ »

  1. respected sir
    namshkar – sir aap ki jo bate hai sir wo kaphi
    prbhavshali hai .maine aap ke dwara likhe patrika ke kaphi article read
    kiye hai. or wo bhut sundar hai sir, or hamari society ko or khash kar ham
    jaise youngsters ko iski bhut jarurat hai, taki hum is materiallystic
    duniya se bahar nikal apne innerself ko pehchan sake. mera ek sawal aap se
    ye hai sir ye jo knowledge aap spread kar rhe hain kya wo sirf aapne vedo
    or purano se adopt ki hai ya aap ka khudka ( innerself ) bhi anubhav (
    experience ) hai. kya aap daily life me feel karte hai . kya aapko bhi ye
    sari chije realize hoti hai or hoti hai to aap kis awastha me pahuche hain
    in chijo ko lekar.
    ( sir sorry for any mistakes )

    टिप्पणी द्वारा Vivekprakash Sahu — जुलाई 17, 2015 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • शास्त्र आपको दिशा देते हैं, मार्ग चुनने और उस पर चलने का उपक्रम तो स्वयं ही करना होता है। उपलब्धि आपके प्रयास पर निर्भर करती है। स्वयं चले बिना लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता। अनुभव व्यक्तिगत होता है।
      धन्यवाद!

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 10, 2015 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. हमारे प्राचीन ज्ञान को इस दिवस मनाने से मान्यता मिल गई है .श्री मन गुलाब जी इस लेख से योग के रहस्यों की जो अब तक अज्ञात थे उनकी जा नकारी प्राप्ती हुई है .

    टिप्पणी द्वारा Dr.P.C.Jain — जून 23, 2015 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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