Gulabkothari's Blog

अगस्त 5, 2015

त्राहिमाम् !

दर्जनों फैसले ऎसे हैं जिनको लागू करने की सरकार की कोई मंशा दिखाई नहीं देती। छोटी अदालतों के फैसले तो सरकार पान की तरह चबा जाती है।

राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ ने न्यायिक क्षेत्र में एक नया इतिहास बना दिया। न्यायालय ने विधायिका और कार्यपालिका के कामकाज को तथा उनकी मानसिकता को लेकर जो टिप्पणियां कीं, उन्हें सुनकर तो सरकार और अफसरों की जमात को डूब मरना चाहिए। कोर्ट ने यह कहा कि अमानीशाह नाले के सौन्दर्यकरण का कार्य कोर्ट की निषेधाज्ञा के बाद भी टाटा को ही दिया गया, तो क्या पैसे लिए गए? धिक्कार है निर्णय लेने वालों को, जो इस टिप्पणी के बाद भी चिकने घड़े बनकर बैठे हैं।

एक ही दिन के कामकाज में न्यायालय ने कितने मुद्दों पर टिप्पणियां कर डालीं। “संवाद” की आय 12 करोड़ किस बात की? जो विज्ञापन सरकार अथवा सरकारी संस्थाएं जारी करती हैं, उनकी दलाली (कमीशन) विभाग को ही मिलनी चाहिए। वाह! दरें कम करके जनता का धन बचाने के बजाय दलाली खाना चाहते हैं। यह धन सरकारी खाते में नहीं जाता। इसे कहते हैं “जिसकी लाठी उसकी भैंस”। कांग्रेस के 25 सांसदों का संसद से निलंबन भी बहुमत की भाषा ही है। दस दिन में मार्ग नहीं पा सकना सरकार की विफलता ही मानी जाएगी। मीडिया पर गुस्सा निकालने से भाजपा लम्बी रेस नहीं जीत पाएगी। आवश्यकता तो जनता का विश्वास जीतने की है। उधर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है। सबके मुंह में एक ही वाक्य है- “सरकार हमारी है। हमारी मर्जी।”

रामगढ़ बांध, दो सौ फीट का झालाना बाईपास, रेडिएशन मुद्दा, कालीन चोरी, मेट्रो निर्माण में पुरा संरक्षण कानूनों की हत्या, अवैध रूप से अतिरिक्तमंजिलें चढ़ाने, पेयजल आदि अनेक मामलों में न्यायालय के आदेश धूल चाट रहे हैं। दर्जनों फैसले ऎसे हैं जिनको लागू करने की सरकार की कोई मंशा दिखाई नहीं देती। छोटी अदालतों के फैसले तो सरकार पान की तरह चबा जाती है। इतना ही नहीं पिछली सरकार की जिन-जिन जांच रिपोर्टो के आधार पर मुकदमे दायर किए गए थे, उन्हीं रिपोर्टो को बदल कर या तो मामलों को रफा-दफा करवा दिया गया या लोग बरी हो गए। उच्च न्यायालय को चाहिए कि उन सब मामलों को फिर से खोल कर झूठी रिपोर्ट दायर करने वाले अफसरों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा चलाया जाए।

सरकार और अफसर बहरे हो गए हैं। उच्च न्यायालय की आवाज खो जाना प्रमाणित करता है कि तंत्र टूट चुका है। इसी संदर्भ में कोर्ट की यह टिप्पणी कि “सरकार को हाईकोर्ट की जरूरत भी है या नहीं”- प्रदेश की जनता को एवं लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली है। क्या इसको न्यायपालिका का क्रन्दन नहीं कहा जाएगा? क्या उच्चतम न्यायालय को न्यायपालिका की रक्षा के लिए आगे नहीं आना चाहिए? हालांकि उच्चतम न्यायालय के भी ढेरों फैसले हैं जिनकी क्रियान्विति बाकी है।

बेहतर तो यह हो कि उच्च न्यायालय एक मोनिटरिंग सेल खोल दे जो उन मामलों पर निगरानी रखे जिनमें आदेश के बावजूद सरकार पालना नहीं करती। यह सेल सुनिश्चित करे कि आदतन अवमानना करने वाले अफसरों को सजा मिले । कहावत भी है- “भय बिन प्रीत न होय ।” अफसरों के मन से अदालतों का भय समाप्त हो चुका है। सरकार तो बल्कि ऎसे अफसरों पर चल रहे मामले ही वापस ले लेती है। उससे उम्मीद नहीं है कि कोई कार्रवाई करेगी। उसे तो ऎसे ही अफसर चाहिएं। ऎसे में न्यायपालिका को ही दिल मजबूत करके कड़ी सजा सुनाने पर विचार करना चाहिए। वरना यह स्वच्छंदता का वातावरण पूरे प्रदेश को ले डूबेगा। अवैध इमारत को तोड़ने पर रोक लगाने, मोती डूंगरी रोड को बंद करने, बड़े अपराधियों को जमानत देने, अंकल जज जैसे मामले भी इसी सेल को भेज दिए जाएं। वह संबंधित न्यायाधीश के उत्तरदायित्व की जांच कर ले।

जब विधायिका जनता से मुंह मोड़ ले और कार्यपालिका सरकार के आगे घुटने टेक दे, न्यायपालिका असहाय हो जाए तब लोकतंत्र में क्या बचा रह गया? तब क्या हैसियत रह गई है मुख्य सचिव की भी? तीनों पाये जनता के काम नहीं आ पा रहे। तब हम किधर देखें? संसद में केन्द्र सरकार पहले ही राज्य सरकारों के चेहरों पर लगी कालिख को ढकने के लिए जूझ रही है। ऎसे में वो भी क्या कार्रवाई करेगी, संभव ही नहीं है। तब क्या कोर्ट की कराहट के साथ लोकतंत्र दम तोड़ देगा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी गोलियां चलनी शुरू हो चुकी हैं। कैसे माने कि अच्छे दिन आने वाले हैं। क्या अब एक ही विकल्प शेष है- राष्ट्रपति को भी विचार करना चाहिए? राष्ट्रपति भी मौन हैं तो कहीं जनता ही नेताओं के साथ अफसरों को भी कठघरे में खड़ा करना शुरू न कर दे। त्राहिमाम् ! त्राहिमाम् !!

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