Gulabkothari's Blog

अगस्त 17, 2015

स्वतन्त्रता स्वच्छन्दता नहीं है

समाज एवं राष्ट्र भी तन्त्र से ही चलते हैं। तन्त्र तो जंगल में भी काम करता है। केवल शिक्षित मानव स्वच्छन्द जीना चाहता है।

सभी प्राणियों की आत्मा “स्व” ही है। तब इसके साथ अर्थ जोड़ा जाए अथवा तन्त्र, एक ही बात है। स्वार्थ का अर्थ है स्वच्छन्दता अर्थात् अमर्यादित स्वतन्त्रता। किसी तन्त्र या व्यवस्था की मर्यादा में रहने वाला आत्मा ही “स्व” कहलाएगा। तभी शब्द की उत्पत्ति सम्भव है। तन्त्र मर्यादा से वह स्वतन्त्र तथा स्वच्छन्दता से जब आत्म रूप विकृत हो तब वह तन्त्रहीन अथवा परतन्त्र कहलाएगा।

“स्वन्” धातु से “स्व” शब्द बना है। “स्वनाति इति, स्वनयते वा” ही स्व शब्द का निर्वचन है। “स्वनति” से आत्मा को ही शब्द कहा जाता है। जिसका आत्मा शब्दोत्पत्ति में असमर्थ है, उसे “स्व” न कहकर “पर” कहा जाता है। इसकी विस्तृत एवं शास्त्रीय व्याख्या पं. मोतीलाल शास्त्री ने की है-शतपथ ब्राह्मण भाष्य में। आत्मा से शब्द निकलता है-इसका क्या अर्थ है? क्या कोई आत्मा शब्द करने में असमर्थ रहता है? आत्मा षोडशकल है। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र इनमें ह्वदय प्राण है। अव्यय पुरूष का मन आत्मा का प्रतिनिधि है। मन में कामना उठती है, अर्थ प्राप्ति की, तब मन का आत्मा से योग होता है। शरीर की वैश्वानर अग्नि में क्षोभ उत्पन्न होता है। तब प्राण वायु पर आघात होता है। यह वायु ही उर-कण्ठ-सिर से टकराकर वर्ण बनता है। अत: शब्द आत्मा से ही निकलता है। पं. मधुसूदन ओझा की “पथ्यास्वस्ति” में इसका विस्तार मिलता है। शब्द का मूल हुआ आत्मा में उत्पन्न कामना। सभी प्राणियों की आत्मा “स्व” ही है। तब इसके साथ अर्थ जोड़ा जाए अथवा तन्त्र, एक ही बात है। स्वार्थ का अर्थ है स्वच्छन्दता अर्थात् अमर्यादित स्वतन्त्रता। किसी तन्त्र या व्यवस्था की मर्यादा में रहने वाला आत्मा ही “स्व” कहलाएगा। तभी शब्द की उत्पत्ति सम्भव है। तन्त्र मर्यादा से वह स्वतन्त्र तथा स्वच्छन्दता से जब आत्म रूप विकृत हो तब वह तन्त्रहीन अथवा परतन्त्र कहलाएगा। समाज एवं राष्ट्र भी तन्त्र से ही चलते हैं। तन्त्र तो जंगल में भी काम करता है। केवल शिक्षित मानव स्वच्छन्द जीना चाहता है।

श्रेय तथा प्रेय

“स्वतन्त्र” और “परतन्त्र” दोनों ही शब्द आत्मा के वाचक नहीं हैं। स्व-तन्त्र में रहने वाला आत्मा ही “स्व” भाव सुरक्षित रख सकेगा। पर-तन्त्र में रहने वाला आत्मा “स्व” को खो बैठेगा। स्वतन्त्र में प्रतिष्ठित आत्मा की कामना मन का संचालन करेगी। पर-तन्त्र में आत्म-कामना पर मानस-कामना का अधिकार होगा। इन्द्रियों के विषय हावी होंगे। व्यक्ति बाहर की ओर अटका रहता है। अत: पर कहलाएगा। आत्मा का नियन्त्रण नहीं रह पाएगा। मन आत्मा पर हावी होगा। ज्ञाता और ज्ञेय दोनों में ज्ञाता यदि आत्मा का स्व-भाव है, तो ज्ञेय पर-भाव कहा जाएगा। ज्ञेय विषय जड होता है। अनात्मरूप होने से पर-भाव है। आत्मा का श्रेय भाव “स्व” तथा प्रेय भाव पर कहलाता है। श्रेय भाव ही नि:श्रेयस का मार्ग है। प्रेय भाव अभ्युदय से जुड़ा है।

प्रकृति को प्रधान कहते हैं। इसी को तन्त्र कहते हैं। इसका बाहरी भाग पंचमहाभूत स्वरूप है तथा भीतरी भाग आत्मा (विश्व संचालन) रूप है। अत: स्व-पर तन्त्र का अर्थ हुआ आत्मा-अनात्मा। आत्म भाव पुरूष है, अनात्म भाव विश्व है। स्वयंभू-परमेष्ठी अमृतरूप पुरूष है। चन्द्रमा-पृथिवी रूप मृत्युरूप विकृति है। मध्य में अमृत-मृत्यु रूप सूर्य प्रकृति है। पुरूष में अव्यय का, विकृति में क्षर का तथा सूर्य में प्रकृति का विकास होता है। इन्हीं को क्रमश: स्व, पर तथा अक्षर तन्त्र कहते हैं। अव्यय का तन्त्र अक्षर है। यदि यही अक्षर क्षर का अनुगामी बन जाता है, तो परतन्त्र बन जाता है। अव्यय आत्मा का अक्षर के माध्यम से क्षर में जुड़ जाना “स्वतन्त्र” है। अक्षर (सूर्य) का तन्त्र अव्यय ही है। इसके स्थान पर क्षर के तन्त्र को स्वीकार कर लेना परतन्त्रता है।

स्वतन्त्रता

तीन लोक हैं-भू:, भुव:, स्व:। तीनों एक तन्त्र से जुड़े हैं। पृथ्वी कभी सीधी सूर्य से नहीं जुड़ती। अन्तरिक्ष के माध्यम से जुड़ती है। सीधी जुड़ी तो जल जाएगी। शनै: शनै: पृथ्वी सूर्य के 12 आदित्य मण्डलों से गुजरती रहती है। इसके अनुरूप ही ऋतु-चक्र (वर्षा-शरद्-ग्रीष्म) बनते हैं। इसी प्रकार तीनों शरीर-कारण-सूक्ष्म-स्थूल भी एक समन्वय के साथ कार्य करते हैं। तीनों लोकों को प्रकृति-पुरूष (अव्यय, अक्षर, क्षर) एक तन्त्र रूप में चलाते हैं। प्रकृति (सत-रज-तम) रूप में आकृतियों-प्रकृतियों का संयोजन करती है। आत्मा अहंकृति रूप केन्द्रस्थ होता है। देखने में सब कुछ परतन्त्र दिखाई पड़ता है। सब एक-दूसरे पर आश्रित जान पड़ते हैं। तभी सृष्टि व्यवस्था चलती है। व्यवस्थित रूप में, निर्बाध चलती है। यथार्थ में यही स्वतन्त्रता है।

तन्त्र से मुक्त रहना तो अपने केन्द्र से च्युत हो जाना है। अपने स्वरूप के बोध को ही मिटा देना है। आत्मा का नियन्त्रण जब बाहरी विश्व के हाथ में चला जाए, उनके साथ ही जब सुख-दु:ख का भाव जुड़ जाए, अर्थात् सुख-दु:ख के लिए भीतर नहीं, बाहर के विषयों पर आश्रित हो जाएं, तब यही परतन्त्रता कहलाती है। परतन्त्रता भौतिकवाद, उपभोक्तावाद, विकासवाद की एकमात्र उपलब्घि है। व्यक्ति का अस्तित्व गौण हो गया, पदार्थ प्रधान हो गया। धर्म, जो आत्म सुख का आधार था, लुप्त हो गया। धर्म ही तन्त्र का केन्द्रीभूत आधार है। स्वतन्त्रता की प्रतिष्ठा है। अव्यय पुरूष का मन, आत्मा ही इसका आधार होता है।

स्वतन्त्र का अर्थ हुआ-आत्मा अक्षर से जुड़कर प्रकृति भाव में रहा और विकृति से सम्बन्ध नहीं बनाया। क्षर भाव से आसक्त नहीं हुआ। तब वह आत्मा “स्वतन्त्र” कहलाया। जब आत्मा विषयों पर आसक्त होकर अक्षर से च्युत हो जाता है, अपने तन्त्र से छूट जाता है। क्षर तन्त्र उस पर प्रतिष्ठित हो जाता है। इसके लिए अब अक्षर तन्त्र ही “पर” हो गया। आत्मा अब क्षर के नश्वर भाव से जुड़ गया। जो स्व (अक्षर) था, उसे पर (क्षर) बना दिया एवं तन्त्र को परतन्त्र बना दिया। आत्मा का स्वरूप “स्वगर्भित-पर” हो गया। गीता में कहा गया-“आत्मैवात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।” अनुकूल तन्त्रात्मक आत्मा हमारा मित्र बना रहता है एवं प्रतिकूल तन्त्रागत वही आत्मा हमारा शत्रु बन जाता है। स्वार्थी व्यक्ति सदा परतन्त्र होकर ही जी सकता है। वह तो केवल बाहरी विषयों के जुड़ाव से एक पक्षीय हो जाएगा। क्षर तन्त्र आत्म विरोधी होने से परतन्त्र ही होता है।

स्व और पर

जिससे स्वरूप रक्षा हो वही “स्व” तथा जिससे स्वरूप की हानि हो, वह “पर” (शत्रु) कहलाता है। दोनों के मध्य में तन्त्र (अक्षर) शाश्वत रूप से स्थित है। अक्षर के आगे अव्यय है, आलम्बन है। क्षर सदा अक्षर के नीचे तथा मरणधर्मा है। प्रकृत अवस्था में अक्षर सदा अव्यय और क्षर के मध्य समभाव रहता है। जब अक्षर नीचे क्षर भाव की ओर झुकता है तो तन्त्रभाव को छोड़कर परभाव में बदल जाता है। स्व-भाव तो केवल अव्यय में ही सुरक्षित रहता है। तभी अक्षर भी स्वतन्त्र रह सकता है। क्षर के साथ मिलकर तो अक्षर भी परतन्त्र हो जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि स्व और पर का स्वरूप तन्त्र अर्थात् अक्षर पर ही प्रतिष्ठित है। अक्षर “स्व” है, तब ही आत्मा भी स्वतन्त्र है। अक्षर के लिए भी अव्यय “स्व” तथा क्षर “पर” कहा जाता है। “स्व: (अव्यय) तन्त्रो यस्य स अक्षर: स्वतन्त्र:। पर: (क्षर) तन्त्रो यस्य स: अक्षर: परतन्त्र।”

यहां हमें पुरूष के स्वरूप को भी जान लेना चाहिए। जब ब्रह्म-निर्विशेष-की माया जाग्रत हो जाती है, तब वह सृष्टि की ओर उन्मुख होता है। यही परात्पर है तथा इसी से आगे की सृष्टि का निर्माण आगे बढ़ता है। परात्पर ऋत (निराकार) रूप है। इसी का माया के द्वारा सत्य (साकार) रूप-पुर-का निर्माण होता है। यह पुरूष सृष्टि का प्रथम निर्माण है। इस निर्माण में देश-काल, परात्पर ब्रह्म-माया, प्राण-आप की भूमिका रहती है। हालांकि, ब्रह्म और माया न तो कोई पदार्थ रूप है, न ही ऊर्जा रूप। यह मात्र प्राणन व्यापार है। वहां न वायु है, न गति है। स्वयंभू लोक ऋषि प्राणों का लोक है। यह जो प्रथम पुर बनता है, इसके केन्द्र में प्रतिष्ठित ब्रह्म के अंश को अव्यय पुरूष कहते हैं। गीता में कृष्ण कहते हैं कि मैं अव्यय पुरूष हूं। यही अंश रूप ब्रह्म सृष्टि के हर रूप में प्रतिष्ठित रहता है। यही है-“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।”

इसी अव्यय पुरूष के मन में इच्छा पैदा हुई-“एकोअहं बहुस्याम।” इसी की प्राण कला से अक्षर प्राण (देव) तथा वाक् कला से क्षर प्राण उत्पन्न हुए। ये दोनों ही प्रकृति कहलाए। पुरूष और प्रकृति मिलकर ही सृष्टि व्यापार संचालित करते हैं। क्षर-पुरूष सृष्टि का उपादान कारण है, अक्षर-पुरूष निमित्त कारण (सूक्ष्म) है। अव्यय सम्पूर्ण सृष्टि का आलम्बन है। अक्षर मध्य में समभाव में रहता है। परात्पर सहित तीनों पुरूष “षोडशी” कहलाते हैं। हमारा आत्मा बनते हैं। पति अपने पत्नी के शरीर में प्रवेश करके संतान बनकर बाहर आता है। दोनों की स्वतंत्रता का यही अर्थ है। क्या प्रकृति के इस तंत्र को बदला जा सकता है? इसी तंत्र में बंधकर जीने को स्वतंत्रता कहेंगे। तंत्र से टूटकर यदि व्यक्ति स्वच्छंद हो जाएगा तब उसके जीवन में स्वतंत्रता का कोई लाभ या सुख शेष नहीं रहेगा। प्रकृति भी यदि तंत्र से बाहर एक क्षण के लिए भी हो जाए तो नहीं कह सकते कि क्या अनर्थ घटित हो जाएगा वही प्रकृति हमसे भी अपेक्षा रखती है कि मैंने तुम्हे एक तंत्र विशेष के जरिए पैदा किया है तुम जब तक जीओ इस तंत्र के बाहर पांव रखने का प्रयास मत करना। तंत्र ही हर स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा है।

परतन्त्रता

अव्यय पुरूष का मन (आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण-वाक्) ही हम सबका मन बनता है। इस स्तर पर सम्पूर्ण सृष्टि समान रहती है। आगे प्रकृति के आवरण से यही मन भिन्न-भिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न रूप में प्रतिबिम्बित होता है। यही सृष्टि का व्यष्टि स्वरूप है। “स्व” और “पर” में “स्व” का आधार अव्यय मन रहता है तथा “पर” का आधार प्रतिबिम्बित मन हो जाता है।

जो नश्वर संसार किसी के लिए बन्धन का कारण बनता है, वही किसी उपासक के लिए मुक्ति का कारण भी बन जाता है। यदि क्षर का अक्षर के द्वारा अव्यय तन्त्र के साथ योग है, तब वही क्षर अक्षर बनता हुआ स्वतन्त्र है। स्वतन्त्र और परतन्त्र दोनों परिस्थितिगत हंै, नियत भाव नहीं हैं। चाहे पुरूष हो, प्रकृति हो अथवा विकृति। पुरूष प्रकृति के सहयोग से ही स्वतन्त्र है एवं विकृति के योग में परतन्त्र बन जाता है। प्रकृति भी पुरूष के योग से स्वतन्त्र रहती है तथा विकृति के संयोग से परतन्त्र हो जाती है। विकृति तो प्रकृति एवं पुरूष के मार्ग पर चलकर ही स्वतन्त्र रहती है। विकार रूप तो परतन्त्रता ही है।

सत्ता में बैठे राजनेता और अधिकारी ही नहीं बल्कि उनके कृपापात्र भी किसी तंत्र में बंधकर रहने को तैयार नहीं हैं। वे स्वच्छंद होकर जीना चाहते हैं। तंत्र को अपनी जेब में रखकर चलना चाहते हैं। इसीलिए कानून तथा लोक दोनों की मर्यादा उनके व्यक्तित्व में दिखाई नहीं पड़ती।

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