Gulabkothari's Blog

अगस्त 18, 2015

आधुनिकता बनाम परंपरा और विरासत

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
राजस्थान उच्च न्यायालय।

विषय:-जयपुर के परकोटा में मेट्रो रेल परियोजना में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की अनदेखी ।

माननीय महोदय,

जैसा कि आप जानते हैं कि जयपुर सांस्कृतिक और ऎतिहासिक विरासतों की दृष्टि से एक सम्पन्न शहर है। करीब पौने तीन सौ साल पहले राजा जयसिंह ने इस शहर को बसाया था। चौड़े बाजार, बरामदे, कंगूरेदार परकोटे और एक जैसी चौपड़ें परकोटा क्षेत्र की खास पहचान है। बेजोड़ पुरामहत्व के जंतर-मंतर, हवामहल, सरगासूली के अलावा प्राचीन धार्मिक स्थल गोविन्द देवजी व ताड़केश्वर मंदिर भी इसी क्षेत्र में आता है। प्रतिवर्ष लाखों देसी-विदेशी पर्यटक इनको देखने जयपुर आते हैं। दु:ख की बात यह है कि जिन प्राचीन धरोहरों और विरासत को देखने के लिए दुनिया भर के पर्यटक गुलाबी नगर की ओर खिंचे चले आते हैं उसी की पहचान परकोटे में मेट्रो रेल के अविवेकपूर्ण संचालन से समाप्त करने की तैयारी की जा रही है।

पिछले साल भर के दौरान मेट्रो रेल के लिए यहां भूमिगत रेललाइन बिछाने के लिए खुदाई के काम में पुरामहत्व की चौपड़ों, मंदिरों व परकोटे को नुकसान पहुंचाने का काम खूब हुआ। चौपड़ों पर खुदाई के दौरान निकले कुंडों का अस्तित्व खत्म कर दिया गया। कुंडों में बने फव्वारे, गोमुख आदि सब क्षतिग्रस्त हो गए। जयपुर की जनता के विरोध के बावजूद गुलाबी नगर के परकोटा क्षेत्र में महज 2.3 किलोमीटर मार्ग पर मेट्रो चलाने के लिए 1100 करोड़ रूपए से ज्यादा की योजना पर काम हो रहा है।

जयपुर मेट्रो के नाम पर पुरातत्व संरक्षण कानून की धज्जियां उड़ाते हुए जो काम हो रहा है, उसे देखकर संविधान की धाराएं उसी तरह कराह रही हैं जैसे जयपुर की जनता। सरकार और उसके अधिकारी जनता द्वारा दिए प्रचण्ड बहुमत के नशे में संविधान की फुटबाल खेल रहे हैं। शहर और उसकी सदियों पुरानी विरासत उजड़ रही है। चारों तरफ सन्नाटा है। बीच-बीच में कोई बुदबुदा उठता है और फू ट जाता है। सब अपनी-अपनी कीमत वसूल कर मौन हैं। शहर के सभी जन प्रतिनिधि हाथ बांधकर सिर झुकाए खड़े हैं। उम्मीद सिर्फ न्यायपालिका से है। कुछ वर्ष पूर्व राज्य के मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ने से बचाने के लिए तब राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा गया। न्यायालय ने उसे ही याचिका मान सुनवाई करीब-करीब पूरी कर ली है। अब उन्हीं परिस्थितियों में जयपुर मेट्रो पर राजस्थान पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी का यह पत्र माननीय मुख्य न्यायाधीश की सेवा में प्रस्तुत है।

माननीय, आपका ध्यान इस बिन्दु की ओर दिलाना चाहता हूं कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (जियालोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों तथा पुरावशेषों के संरक्षण के लिए जिममेदार है लेकिन ऎसा लगता है कि धरोहरों के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर उसने भी आज तक चुप्पी साध रखी है।

परकोटे में मेट्रो के नाम पर चौपड़ों को क्षतिग्रस्त करने से लेकर आज तक जितना भी काम हुआ उसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुभवी अधिकारियों की राय ली होती तो इतना नुकसान नहीं होता। पिछले अप्रेल में ही 75 टन की बीस मीटर लम्बी क्रेन एक हवेली और मंदिर पर गिर गई।

माननीय, शहर की ऎतिहासिक चौपड़ें पहले ही इस प्रोजेक्ट की भेंट चढ़ चुकीं हैं। परकोटे में हजारों इमारतें 250 से 300 साल पुरानी हैं। इनमें से बहुत सी मेट्रो के भूमिगत मार्ग के दोनों तरफ हैं। पुरानी इमारतों के बीच प्रतिदिन कई बार गुजरने वाली मेट्रो के कारण इन इमारतों को खतरा होगा इसको लेकर विशेषज्ञ कई बार चेता चुके हैं। पुरामहत्व से जुड़े कानूनों का सरासर उल्लंघन कर तोड़-फोड़ का काम आज भी हो रहा है। शहर की आबादी की आवश्यकता को लेकर मेट्रो चलनी चाहिए, इसके पक्ष में सब हैं। लेकिन विरासत की कीमत पर हो रहे ऎसे विकास का शायद ही कोई स्वागत करेगा। मेट्रो के प्रस्तावित बड़ी चौपड़ स्टेशन से महज 15 मीटर की दूरी पर जयपुर का शुभंकर हवामहल खड़ा है। वर्ष 1799 में बने हवामहल में सामने महराबदार छोटी खिड़कियों से जुड़ी दीवारें बहुत नाजुक और पतली हैं। हवामहल बिना नींव एक चट्टान पर बना हुआ है। हवामहल क्षेत्र में कई पुरानी इमारतें और तहखाने भी बने हुए हैं। ऎसे में मेट्रो सुरंग के लिए खुदाई के दौरान कम्पन हुआ तो इस ऎतिहाासिक इमारत को हमेशा खतरा बना रहेगा।

माननीय, आपका ध्यान इस ओर भी दिलाना चाहता हूं कि यहां की पुराधरोहर जंतर-मंतर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दे रखा है। नियमानुसार विश्व धरोहर के बफर जोन में किसी भी तरह के निर्माण कार्य के लिए यूनेस्को की अनुमति लेनी होती है। बफर जोन को लेकर राज्य सरकार के स्तर पर कोई नियम नहीं बने हों तो केन्द्र के पुरातत्व विभाग के कानून ही मान्य होते हैं। ऎसे में मेट्रो का निर्माणा कार्य जंतर-मंतर के बफर जोन में आ रहा है। इसके अलावा करीब ढाई सदी से भी ज्यादा पुरानी 60 फीट ऊंची सरगासूली इमारत के तो बिल्कुल सटाकर ही मेट्रो का काम हो रहा है। ऎसा प्रतीत हो रहा है कि नियोजित नगरीय विकास और पुरामहत्व के लिए विश्व विख्यात गुलाबी नगर की विरासत को मेट्रो की आड़ में विनाश की ओर धकेला जा रहा है। चिंता की बात यह है कि जब से मेट्रो का काम शहर के परकोटा क्षेत्र में शुरू हुआ तब से ही पर्यटकों ने भी गुलाबी नगर से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। यही हाल रहा तो पर्यटक किसी हादसे की चपेट में आने की आशंका से गुलाबी नगर से मुंह मोड़ते दिखेंगे।

माननीय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की जिम्मेदारी बनती थी कि वह पुरामहत्व की धरोहरों को नुकसान पहुंचने से रोके। हैरत की बात यह है कि पुरातत्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने राज्य सरकार और जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन से कभी यह तक नहीं पूछा कि आखिर किसकी अनुमति से धरोहरों को नुकसान पहुंचाने का काम हो रहा है? विश्व धरोहर में शामिल जंतर-मंतर संभवतया अकेली वैधशाला है जिसके यंत्रों की गणना आज भी सटीक बैठती है।

माननीय, ऎतिहासिक हवेलियां, वास्तुशिल्प, कलात्मक जाली-झरोखे, बड़ी-बड़ी चौपडें व चौड़ी सड़कों से पहचान बनाने वाले गुलाबी नगर में खास तौर से परकोटे का पुराना स्वरूप बना रहे ऎसा शहर का हर कोई बाशिंदा चाहता है। क्योंकि ये उजड़ गए तो जयपुर में फिर भावी पीढ़ी को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं बचने वाला। जयपुर से जुड़े कई अहम मसलों पर अदालतों ने ही लोगों को राहत पहुंचाने का काम किया है। पुराधरोहरों को नष्ट होते देखकर भी मूकदर्शक बने महकमों को चेताने का काम कोई नहीं करे तो फिर आखिरी उम्मीद न्यायपालिका ही है।माननीय, अब आपसे ही उम्मीद बची है। गुलाबी नगर की पुराधरोहरों के साथ हो रहे खिलवाड़ के लिए जिम्मेदार अफसरों व महकमों के खिलाफ जब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं होगी, इनके हौंसले यूं ही बुलंद होते रहेंगे। उम्मीद है कि आप स्वयं इस मामले में प्रसंज्ञान लेकर मेट्रो रेल के नाम पर गुलाबी नगर की धरोहर से हो रहे खिलवाड़ को रोकेेगे।

(गुलाब कोठारी)
प्रधान संपादक

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