Gulabkothari's Blog

अगस्त 20, 2015

संथारा/सल्लेखना

जैन धर्म मूल में त्याग और तपस्या के मार्ग पर चलकर जीने का मार्ग है। शरीर को साधन मानकर आत्मकल्याण इसकी प्राथमिकता है। हर वर्ष भाद्रपद माह में हजारों जैन मासखमण (एक माह के निर्जल उपवास) करते हैं। वेद भी शरीर को साधन मात्र ही मानता है। कालिदास ने “कुमारसंभव” में लिखा है-“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।” पुरूषार्थ का लक्ष्य भी मोक्ष प्राप्ति (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) ही है। यह भी सच है कि भौतिक सुख की अवधारणा के बीच आत्मा मर चुकी है, मात्र शरीर जीवन का प्रतीक रह गया है। शिक्षा ने हमारे कर्म, कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्घांतों को ताले में बंद ही कर दिया। सारे धर्म और दर्शनों के अर्थ ही बदल गए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने दस अगस्त 2015 को दिए अपने एक निर्णय में जैन धर्म की संथारा/सल्लेखना की पद्घति को आत्महत्या की परिभाषा में सम्मिलित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “जैन धर्म के शास्त्रों में, अभ्यास अथवा प्रवचनों में कहीं भी संथारा/सल्लेखना का उल्लेख नहीं पाया गया। न ही यह पाया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए संथारा एक अनिवार्यता है। न ही किसी ऋषि-मुनि ने यह लिखा कि संथारे के अभाव में मोक्ष प्राप्ति नहीं हो सकती। न ही इसके प्रमाण ही सामने आए कि जैन धर्म के अनुयायियों में यह सिद्घान्त प्रचुरता में पालन किया जाता है। संथारा को स्वैच्छिक कृत्य कहकर आत्महत्या न मानना एक बात है तथा संविधान की धारा 25 और 26 में स्वीकृत करना दूसरी बात है। न ही धारा 21 में जीवन समाप्त करने का अधिकार दिया जा सकता है। “धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार” में भी स्वयं मृत्यु मार्ग के चयन की स्वीकृति नहीं दी जा सकती। अत्यंत विकट परिस्थितियों में भी नहीं। अत: सरकार इस परम्परा को बंद करावे तथा इसे धारा 309 के अन्तर्गत आत्महत्या का दर्जा दिया जाए। जैन धर्म में अब किसी भी रूप में संथारा परम्परा को प्रश्रय न दिया जाए।”

आज जैन धर्म विश्व के धर्मो के बीच अपनी पहचान रखता है। लगभग 2500 वर्ष पुराना तथा अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के नाम से पहचाना जाने वाला धर्म है। जीवन भर तप-त्याग के साथ जी कर, अन्तिम काल में निवृत्ति का अभ्यास और “संथारा” का योगमार्ग दिया गया। संथारा का सामान्य अर्थ है बिछौना। यह श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित है। दिगम्बर परम्परा में इसे सल्लेखना कहते हैं। सल्लेखना का अर्थ है-कृश कर देना। किसको? क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों को, जो मोक्ष मार्ग के मुख्य बाधक हैं। इसको ही धर्माचरण कहा गया है। जब तक शरीर धर्माचरण में सहायक रहता है, उसका पोषण किया जाता है।

जब शरीर इस कार्य में असमर्थ हो जाए तब उसका पोषण बंद कर दें। जीवन खाना खाने के लिए नहीं है। भोजन छोड़ देना “भक्त प्रत्याख्यान” कहलाता है। दिगम्बर मुनि तो भिक्षा के लिए स्वयं जाते हैं। खड़े-खड़े आहार ग्रहण करते हैं। इसमें असमर्थ होने पर स्वयं ही आहार का त्याग हो जाता है।

प्रश्न यह है कि क्या संथारा/सल्लेखना को आत्महत्या माना जा सकता है? पांचवीं शताब्दी ईस्वी में जैनाचार्य पूज्यपाद के सामने भी यही प्रश्न आया था। उस उत्तर को सर्वार्थसिद्घ अध्याय (संग्रह) भा.ज्ञानपीठ-1955 में उद्घृत किया गया है । जैनेन्द्र सिद्घान्त कोश (4) में सवार्थसिद्धि उद्घृत करते हुए कहा गया है कि- “सल्लेखना आत्महत्या नहीं है। क्योंकि इसमें प्रमाद का अभाव है । प्रमाद योग (क्रोध-मान-माया-लोभ) सेे प्राण का वध करना हिंसा है। राग-द्वेष, मोह से युक्त होकर जो विष और शस्त्रादि से अपना घात करता है, वह आत्महत्या है। सल्लेखना प्राप्त जीव को रागादिक तो होता नहीं है। यह तो अहिंसा (रागादिक न होना) है।”

जैन धर्म का प्राचीनतम ग्रन्थ है “आयारो”। इसे महावीर की वाणी ही माना जाता है। इसका आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा किया गया अनुवाद तथा विवेचन भी उपलब्ध है। जिस प्रकार प्रथम ब्रह्मसूत्र है-“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”, वैसे ही जैन दर्शन का भी मूल मंत्र है-“अथातो आत्मजिज्ञासा”। यही कर्ता और भोक्ता है, बंध और मोक्ष का कारक है। ज्ञान और आचार मिलकर मोक्ष का हेतु बनते हैं। भगवान महावीर ने आचार के पांच भेद किए-ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप और वीर्य। आचार सबके साथ जुड़ा है, अत: मोक्ष का सम्यक् उपाय है। अर्थात् शरीर और कर्म का अनिवार्य योग है।

“न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:”-गीता 18/11

“राग-द्वेष से कर्म करना और फलाशंसा रखना, ये दोनों असंयम हैं।”

आचारांग और गीता एक ही तथ्य प्रकट कर रहे हैं।

भगवान महावीर का दर्शन समता का है। उन्होंने समता के द्वारा जीवन के रूपांतरण की दिशा प्रदर्शित की। आचारांग के मूल प्राकृत सूत्र 125 के हिन्दी अनुवाद में प्रायोपगमन अनशन पर लिखा है-जिस भिक्षु को ऎसा संकल्प होता है-

“मैं इस समय (समयोचित क्रिया करने में) इस शरीर को वहन करने में ग्लान (असमर्थ) महसूस कर रहा हूं ।” वह भिक्षु क्रमश: आहार का संक्षेप करे, कषायों को कृश करे। कषायों को कृश कर समाधिपूर्ण भाव वाला, फलक की भांति शरीर और कषाय-दोनों ओर से कृश बना हुआ भिक्षु समाधि-मरण के लिए उत्थित होकर शरीर को स्थिर-शांत करे।”

सूत्र-126 (वह संथारा करने वाला भिक्षु शारीरिक शक्ति होने पर) गांव, नगर, आश्रम, निगम, राजधानी आदि में जाकर घास की याचना करे। एकान्त में शुद्घ स्थान देखकर घास का बिछौना करे । बिछौना कर उस समय प्रायोपगमन (उत्तर ज्झयणाणि भाग-2) अनशन कर शरीर, उसकी प्रवृत्ति (उन्मेष-निमेष आदि) और गमनागमन का प्रत्याख्यान (अस्वीकार) करे।

सूत्र 127-वह अनशन सत्य है। उसे सत्यवादी वीतराग, संसार-सागर का पार पाने वाला, “अनशन का निर्वाह होगा या नहीं” इस संशय से मुक्त, सर्वथा कृतार्थ, परिस्थिति से अप्रभावित, शरीर को क्षणभंगुर जानकर, नाना प्रकार के परिषहों और उपसर्गों को मथकर, “जीव पृथक् है, शरीर पृथक् है” इस भेद विज्ञान की भावना तथा भैरव अनशन का अनुपालन करता हुआ क्षुब्ध न हो।

128-ऎसा करते हुए भी उसकी वह काल मृत्यु होती है।

129-उस मृत्यु से वह अन्त:क्रिया (पूर्ण कर्म-क्षय) करने वाला भी हो सकता है।

130-यह मरण प्राण-मोह से मुक्त भिक्षुओं का आयतन, हितकर, सुखकर, कालोचित, कल्याणकारी और भविष्य में साथ देने वाला होता है। ऎसा मैं महावीर कहता हूं।

“दिव्य और मानुषी-सब प्रकार के विषयों में अमूर्छित और आयुकाल के पार तक पहुंचने वाला भिक्षु तितिक्षा को परम जानकर, हितकर विमोक्ष-भक्त प्रत्याख्यान, इंगित मरण और प्रायोपगमन-में से किसी एक का आलम्बन ले।-ऎसा मैं कहता हूं।”

आचारांग सूत्र में बहुत विस्तार दिया गया है। संथारा-सल्लेखना को काल-मृत्यु और अहिंसा का दर्जा दिया गया है। इसी प्रकार सल्लेखना का महत्व व फल, प्रधानता, आवश्यकता, निषेध, यो ग्य अवसर अन्त समय की प्रधानता का कारण आदि विषयों पर शास्त्रों में प्रचुर सामग्री उपलब्ध है।

ऎसे धार्मिक विषयों पर न्यायालयों में चर्चा करते समय मात्र कानूनी दलीलों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। धर्म का विषय आत्मा से जुड़ा होता है। आत्मा कभी मरता नहीं है। जड शरीर नश्वर है, अचेतन है। उसमें विचार करने की चेतना होती ही नहीं। तब आत्महत्या का विषय शरीर के नियंत्रण में भी नहीं रह सकता। अच्छा होता यदि इस फैसले से पूर्व कुछ धर्माचार्यों से चर्चा की जाती। क्योंकि ये प्रज्ञा के विषय हैं। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को सामाजिक नहीं, आत्मा के धरातल पर ही तय करना उचित होगा।

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