Gulabkothari's Blog

सितम्बर 5, 2015

पढ़े सो पढ़ावे

शिक्षक और अध्यापक का अर्थ पढ़ने वाला भी होता है और पढ़ाने वाला भी। इसका एक ही अर्थ है कि जो पढ़ नहीं सकता, वह पढ़ा भी नहीं सकता। किन्तु कुर्सी का अहंकार ही ऎसा होता है कि उस पर बैठते ही व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। एक तो आज डिग्रियां प्राप्त करने के लिए पसीना ही नहीं बहाना पड़ता, कुछ छात्रों को शायद पढ़ना भी नहीं पड़ता। कुछ कॉलेजों में तो कक्षाएं लगती ही नहीं। एक विश्वविद्यालय ने 25,000 फर्जी डिग्रियां दे डालीं, उनकी खेप को नौकरियां भी मिल गई। शिक्षा विभाग ने कार्रवाई न करके अपने असली स्वरूप की सार्वजनिक अभिव्यक्ति भी कर दी। नौकरी से सरकार के आका भी निकाल नहीं सकते। तब पढ़े कौन और क्यों?

मेरे गुरू स्व. देवीदत्त चतुर्वेदी नित्य रात को तीन-चार घण्टे तैयारी करते थे। मेरे संभावित प्रश्नों का चिंतन-मनन करते थे। अपने गुरू से विषय को पढ़ाने की आज्ञा लेते थे। आचार्य महाप्रज्ञ को बहुत पास से देखने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। उनके बारे में मेरा मत था कि वे स्वयं अपने लिए नहीं जीया करते थे। उनके आधे दाएं भाग में आचार्य तुलसी का स्थान था और बाएं आधे भाग में महाश्रमण का। अपने गुरू से लेते जाते और शिष्य को देते जाते। पितृ सिद्धांत की तरह ही गुरू परम्परा में भी सात पीढ़ी तक ज्ञान का प्रवाह बना रहता है। ऎसा मनीषियों का कहना है। उनका कहना था कि शिष्य ही गुरू को तैयार करता है। शिष्य नई पीढ़ी का होने से उसके अनुभव और उसकी जीवन-शैली भिन्न होती है। आवश्यकताएं भी बहुत कुछ नई होती हैं। ज्ञान की सार्थकता इसी में है कि वह हर देश-काल में उपयोगी हो सके। शिक्षक को इसी के नवीनीकरण का प्रयास करना पड़ता है, जो एक दुरूह कार्य है। इसके लिए समाज में होते रहने वाले परिवर्तनों का आकलन आवश्यक है। आज बिना कुछ किए ही शिक्षा इतना बड़ा व्यापार बन गई है, कि शिक्षा में ज्ञान की आवश्यकता ही समाप्त हो गई। पिछले साठ सालों में ज्ञान का स्थान लगभग अज्ञान ने ले लिया है। साहित्य बस रटाया जा रहा है। अनुवाद भी रटाया जा रहा है। वेद भी कंठस्थ कराए जा रहे हैं। इनमें ज्ञान क्या है, कैसे व्यक्ति के जीवन में उपयोगी हो सकता है, कोई नहीं जानता। सायण, उवर-महिधर ने भी अनुवाद ही किए हैं। उन्हीं को हम भी रटा रहे हैं। शोध, नयापन, विज्ञान से आगे उठने जैसी इच्छा किसी के मन में पैदा ही नहीं होती।

इसका एक कारण यह भी है मूल्य परक शिक्षा का लोप हो गया। कम से कम शिक्षक तो पढ़ता। उसको ही अपने आचरण और उत्तरदायित्वों का बोध तो होता। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि धर्म-निरपेक्षता की अवधारणा नेे प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से धर्म को बाहर निकाल फेंका। स्वयं शिक्षक छात्र-छात्राओं से मर्यादाहीन व्यवहार करने लग गए। ऎसे शिक्षक ही ज्ञान में “घुण” का कार्य कर रहे हैं। अज्ञान के गर्त में समाज को ले जा रहे हैं।

प्राणवान् शिक्षा के लिए पहले शिक्षक को ही राष्ट्र चिंतन के साथ संकल्पित होना पड़ेगा। त्याग के मार्ग पर चलकर आदर्श प्रस्तुत करना पड़ेगा। तब प्रत्येक नागरिक (अभिभावक हो या नेता-अभिनेता) कर्म को धर्म मानकर व्यवहार करेंगे। शिक्षा विभाग, शिक्षण संस्थान तथा शिक्षक आज जिस तरह का व्यापार कर रहे हैं, वे अपनी ही भावी सात पीढियों को “ज्ञान-मुक्त” कर रहे हैं।

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: