Gulabkothari's Blog

सितम्बर 8, 2015

वादे हैं वादों का क्या!

हमारे देश का लोकतंत्र आज रहस्यमय चौराहे पर खड़ा है। सांस्कृतिक रूपान्तरण हो रहा है हमारे लोकतंत्र का। बेटा घर के संस्कारों को स्वीकार करने को राजी नहीं है। हर अपने संकल्प को तोड़ देना चाहता है जो उसने ईश्वर के सामने किया हो। राजनीतिक दलों का भी यही हाल है। वे भी सवा सौ करोड़ जनता के सामने किए हर वादे को भूल जाना चाहते हैं। पहले कांग्रेस ने हमेशा यही किया और अब भारतीय जनता पार्टी का चुनावी घोषणा-पत्र भी राजनीतिक मुखौटा बनकर रह गया। संविधान मौन है, कानून लाचार है, चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त शून्य में चले जाते हैं परिणाम घोषित करके। रह जाते हैं एकमात्र शीर्ष पुरूष-महामहिम राष्ट्रपति। वे केवल सलाह दे सकते हैं सरकार को। मानें न मानें!

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भाजपा की हाल ही दिल्ली में हुई समन्वय बैठक में यह तो स्पष्ट हो गया कि केन्द्र सरकार के एजेण्डे में धारा 370 तथा अयोध्या के राम मंदिर निर्माण का मुद्दा शामिल नहीं है। समान नागरिक संहिता की अब कहीं बात भी नहीं होती और काले धन को वापस लाने की बात को तो सरकार ने राजनीतिक झुनझुना कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया है। रही बात “न खाऊंगा, न खाने दूंगा” की, तो खुलेआम अपने भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे नेताओं को बचाते रहना स्वत: प्रमाण है। यह भी आश्चर्यजनक तथ्य है कि घोषणा-पत्र के मुद्दों से मुकर कर सरकार फिर से चुनाव जीतने के सपने देख रही है। हम को तो साल भर में ही लोकप्रियता का ग्राफ गिरता जान पड़ रहा है। उनको यह लग रहा है कि सरकार जो कुछ कर रही है, वह ही एक मात्र सही मार्ग है विकास का। इतने सारे मंत्री, अफसर, न्यायाधीश भी कुछ बोझ दिखाई पड़ रहे हैं। इनकी भी छंटनी हो जाने की चर्चा है।

प्रश्न मूल में यह रह गया है कि जिन वादों को जन-जन के सामने रखकर भाजपा ने वोट मांगे थे, चाहे घोषणा-पत्र में लिखकर अथवा फिर चुनाव सभाओं में बोलकर, क्या वे सब ही मात्र “लॉलीपॉप” थे? मान भी लें तो जनता यह तो अवश्य जानना चाहेगी कि अपने काल में भाजपा सरकार देश और देशवासियों के लिए क्या करना चाहती है, जो इन वादों से भी मूल्यावान हों। जिस संघ से भाजपा की उत्पत्ति हुई, उसके प्रमुख मोहन भागवत को जेड सुरक्षा की बेडियों में बांध दिया। उनकी स्वतंत्रता छिन गई। जनता से लोकतंत्र छिन गया। तब अपने को इतिहास में दर्ज कराने के लिए सरकार ऎसा क्या करना चाहती है? उसे अपना यह मानचित्र या रोड मैप जनता के सामने रखना चाहिए। वरना तो यही माना जाएगा कि कांग्रेस के नकारापन एवं अल्पमत में होने के कारण भाजपा एक पक्षीय निर्णय करने लगी है। भले ही लोकतंत्र खतरे में पड़ जाए। वैसे भी अब तक विपक्ष को समानता का दर्जा दिया ही कहां है? केवल कोसा ही है, आलोचना क रके ही अपना बड़प्पन देश को दिखाया है। कैसे मानें कि कमल पानी से ऊपर रहता है।

प्रश्न यह भी है कि संघ प्रमुख को कैसा लग रहा है। संघ के पदाधिकारी सत्ता भोग में डूब चुके या अभी योग का प्रभाव शेष है। भाजपा को सरकार में लाने के पीछे मुख्य भूमिका (स्वीकृति सहित) संघ की ही थी। चुनावी घोषणा-पत्र के जिन मुद्दों से भाजपा ने किनारा कर दिखाया, वास्तव में वे संघ के ही मुद्दे थे। भाजपा संघ की पकड़ से बाहर हो गई। हां, संघ के कुछ लोगों को सरकारी नियुक्तियां भले ही दे दे। क्या मोहन भागवत इस परिस्थिति को सिद्धांतत: स्वीकार करेंगे? तब क्या यह देश संघ पर अपना विश्वास बना पाएगा? अथवा, संघ और भाजपा बीच की दीवार हटाकर एक हो जाएंगे?

कांग्रेस मौन है। मानो केवल एक परिवार की पार्टी रह गई हो। किंकर्तव्यविमूढ़ है। नीचे के छुटभैया नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सबके पेट भरे हुए हैं। उनकी चेतना भी लोकतंत्र के मुद्दे पर सुप्त है। मां-बेटे जानें और उनकी कांग्रेस जाने। वे मानकर बैठे हैं कि अगले चुनावों में जनता फिर भाजपा के विरोध में मतदान करेगी और कांग्रेस का राज लौट आएगा यह तो लोक तंत्र नहीं हुआ। आज देश को विपक्ष की अत्यन्त आवश्यकता लग रही है। विपक्ष मौन क्यों है? जिस प्रकार संसद में भूमि अधिग्रहण पर एकजुट होकर प्रहार किया था, आज क्या घोषणा-पत्र से मुंह फेरने का मुद्दा छोटा है?

सच तो यह है कि आज सत्ता और विपक्ष दोनों ही लोकतंत्र को अपमानित कर रहे हैं। जनता विकल्पहीन है। शून्य में ताक रही है। अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार चारों ओर अभिवृद्धि पा रहे हैं। तीसरे मोर्चे के दलों का इतिहास भी देखते ही बनता है। ऎसे में पहली आशा तो सदा सत्ता पक्ष से रहेगी। उसने हाथ झाड़ने शुरू कर दिए हैं, तब विपक्ष की बारी आई। अब देश के युवा को ही उठना पड़ेगा। वह आधे से ज्यादा हिस्सा है देश का। उसके सामने तीन साल से कुछ अधिक समय है। भविष्य की नई रूपरेखा बनानी ही पड़ेगी। आज का लोकतंत्र भी किसी गुलामी से कम नहीं। युवाओं के लिए भविष्य नहीं है इसमें। जनता के प्रति वचनबद्धता नहीं है इसमें। भारतीय संस्कृति की आत्मा कहीं गहरे में सिमट गई है। भारतीय शरीरों में बैठा “इण्डिया” ही राज कर रहा है । इससे बड़ा अपमान इस सोने की चिडिया का क्या हो सकता है। जरूरत है इसे अपने पंखों को फड़फड़ाने की। देश के तमाम राजनीतिक दलों पर यह कानूनी बंदिश तो लगनी ही चाहिए कि वे जनता से जो वादे करके सरकार बनाएं वे सौ प्रतिशत पूरे हों। फिर ये वादे चाहे लिखे हों या बोले। तभी जनता जीत पाएगी। नहीं तो जैसे पिछले 68 सालों से हार रही है, आगे भी हारती रहेगी।

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